देवकी-यशोदा के अलावा ये भी हैं कृष्ण की माताएं, इस रहस्य को जान रह जाएंगे दंग

लखनऊ: होठों पर मुरली, गले पर पीला पटका और माथे पर मोरपंख लगाए श्रीकृष्ण का जीवन संपूर्ण कलाओं से भरा हुआ है। वह जब तक पृथ्वी पर थे केवल मानव कल्याण के लिए कार्य किए और हर किसी की इच्छा को पूरा किया। पुराणों में बताया जाता है कि भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण ने संसार के सभी दुखों को हरने वाली गीता के रूप में ज्ञान दिया। उन्होंने बाल्यावस्था के दौरान गोकुल में जो लीलाएं रचीं, वे हर किसी का मन मोह लेती थीं। जन्माष्टमी स्पेशल पर आज हम आपको कृष्ण की 5 माताओं के बारे में जानकारी देंगे। आप देवकी और यशोदा के बारे में तो जानते ही हैं लेकिन इसके अलावा भी कृष्ण की तीन और मां थीं, जिनको कृष्ण ने मां का दर्जा दिया था। आइए जानते हैं कृष्ण की 5 माताओं के बारे में…

देवकी
देवकी माता ने भगवान कृष्ण की सगी माता थीं। उन्होंने ही भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को मथुरा की जेल में जन्म दिया था। देवकी मथुरा के राजा कंस के पिता महाराज उग्रसेन के भाई देवक की कन्या थीं। कंस शादी से पहले तक अपने चचेरी बहन से बहुत स्नेह रखता था। बताया जाता है कि देवकी देवताओं की मां अदिति का अवतार थीं, इनका विवाह वसुदेव से हुआ था। इसलिए भगवान कृष्ण को देवकीनंदन और वासुदेव भी कहा जाता है। यशोदा माता यशोदा भगवान कृष्ण की सगी मां से भी बढ़कर थीं क्योंकि उन्होंने कृष्ण का लालन-पालन किया था। नंद की पत्नी यशोदा की जान कृष्ण में बसती थी। भगवान कृष्ण ने बाल रूप में ही माता यशोदा का ब्रह्मांड के दर्शन करा दिए थे। श्रीमद् भागवत में कहा गया है कि मुक्तिदाता भगवान से जो कृपा प्रशाद नंनदारी यशोदा को मिला, वैसा न ब्रह्मा, शंकर और उनकी पत्नी लक्ष्मीजी को प्राप्त हुआ।

रोहिणी

भगवान कृष्ण के पिता वसुदेव की पहली पत्नी रोहिणी उनकी सौतेली मां हैं। रोहिणी बलराम, सुभद्रा और एकांगा की माता भी थीं। देवकी की सातवीं संतान को रोहिणी के गर्भ में रख दिया था, जिससे बलराम की उत्पत्ति हुई थी। रोहिणी अपने पुत्र-पुत्रियों के साथ माता यशोदा के यहां रहती थीं। बताया जाता है कि भगवान कृष्ण की परदादी मारिषा और उनकी सौतेली माता रोहिणी नाग जनजाति से थीं और हस्तिनापुर के राजा शांतनु के बड़े भाई बहिलका की पुत्री थीं।गुरुमाता भगवान कृष्ण ने सांदीपनि मुनि की पत्नी सुमुखि देवी को माता का दर्जा दिया था। शास्त्रों में भी गुरु की पत्नी को मां का दर्जा दिया गया है। ऋषि संदीपनी भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे। गुरुमाता ने गुरु दक्षिणा के रूप में कृष्ण से अपने पुत्र को मांगा थो, जो शंखासुर राक्षस के कब्जे में था। भगवान ने उसे मुक्त कराकर गुरु भेंट दी थी। इसके एवज में गुरुमाता ने भगवान कृष्ण को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी माता तुमसे कभी दूर नहीं जाएगी। इसलिए भगवान कृष्ण के जीवित रहने तक उनकी माता देवकी भी जीवित रही थीं।

राक्षसी पूतना

भगवान कृष्ण अपने भक्तों की हर इच्छा को पूरा करते हैं और उनका हर हाल में कल्याण करते हैं। पूतना ने भगवान कृष्ण को मारने के लिए अपने स्तनों पर कालकूट जैसा भयंकर विष लगाया था ताकि दूध के साथ जहर भी उनके अंदर चला जाए और कृष्ण की मौत हो जाए। भगवान ने दूध के साथ उसका खून पी लिया और मार डाला। पूतना के मरने के बाद जब अंतिम संस्कार किया जा रहा था, तब उसके शरीर से चंदन जैसी से खुशबू आने लगी थी और वह पूरे वातावरण में फैल गई थी। इसका वर्णन भागवत पुराण में मिलता है। इसके बाद भगवान कृष्ण ने पूतना को मां का दर्जा देकर मुक्ति प्रदान की थी। पूतना पूर्व जन्म में राजा बलि की बहन थी। जब भगवान विष्णु वामन अवतार में राजा बलि के पास आए थे तब उन्होंने कामना की था कि काश यह मेरा बच्चे होता और मैं इनको दूध पिला पाती। जब भगवान ने राजा बलि सबकुछ मांग लिया तब उन्होंने कहा था कि अगर यह मेरा बेटा होता तो दूध में जहर मिलाकर इसको पिला देती। इसलिए उनका राक्षसी रूप में जन्म लिया और भगवान विष्णु ने एक ही जन्म में दोनों मनोकामनाएं को पूरा कर दिया था। इसलिए पूतना को भगवान कृष्ण की पांचवी माता बतया जाता है।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper