लौट आई खुशियां

दिवाली का त्योहार है खुशियां मनाने का। इस दिन भगवान श्रीराम, रावण का वध करके अयोध्या लौटे थे। तब अयोध्यावासियों ने घर-घर घी के दीपक जलाकर खुशियां मनाई थीं। यह सारी बातें राजू को मां ने बताई थीं। आज छोटी दिवाली का दिन था, लेकिन राजू सबेरे से ही उदास था। उसके घर में घी तो क्या, दीपक खरीदने के भी पैसे नहीं थे। इसी चिंता में राजू सोचता-सोचता घर से निकल पड़ा।

हालात हमेशा से ऐसे नहीं थे। पांच साल पहले उसके पिता का देहांत हो गया था। उस समय राजू करीब छह साल का था। तभी से उसके घर की स्थिति बिगड़ गई थी। उसके पिता जी, सेठ धनीराम के गोदाम में मजदूरी करते थे। एक दिन वह सड़क दुर्घटना में चल बसे। अब मां घर-घर बर्तन मांज कर उसका और अपना पेट भरती थी। मां को कुछ दिनों से बुखार आ रहा था, इसलिए वह काम पर नहीं जा पा रही थी। घर में रखे थोड़े से पैसे भी खत्म हो चुके थे। इसीलिए राजू सोच रहा था कि दीपावली इस बार नहीं मन पाएगी।

तभी गाड़ी के तेज हार्न से राजू का ध्यान टूटा। उसने देखा कि वह घर से काफी दूर निकल आया है। यह तो शहर का सबसे धनी इलाका था। शाम ढल चुकी थी। चारों तरफ रंग-बिरंगी रोशनी फैली थी। उसने देखा सभी घरों में खूब चहल-पहल है, पर एक आलीशान घर सजावट के बाद भी सुनसान पड़ा है। वह उधर ही चल दिया। घर के चौकीदार से पूछा सब तरफ सन्नाटा क्यों है। चौकीदार ने बताया, ‘घर की मालकिन को गुजरे एक साल हो गया है। तभी से उनकी नौ साल की बेटी बहुत उदास रहती है। साहब सदा काम में व्यस्त रहते हैं।’

राजू ने देखा उस घर की खिड़की में एक सुंदर लड़की बैठी रो रही है। वह खिड़की के नीचे गया और उससे रोने का कारण पूछा। लड़की कुछ नहीं बोली। तब राजू ने कहा तुम्हारे पास सब कुछ है, फिर भी तुम रो रही हो। मेरे पास न तो कपड़े हैं, न खाना और न दिवाली मनाने के लिए पैसे, फिर भी मैं कभी नहीं रोता। यह सुनकर लड़की चुप हो गई। उसने चौकीदार को आवाज देकर राजू को घर के अंदर लाने को कहा। लड़की ने उससे उसका नाम पूछा और अपना नाम रानी बताया। राजू और रानी बातें करने लगे। फिर वह खिलौनों से खेलने लगे। राजू की चुटकुलों व मजाक भरी बातों से रानी हंसने लगी।

घर के सभी नौकर रानी को हंसते-खेलते देखकर हैरान थे। राजू और रानी खेल में इतने मगन थे कि उन्हें पता ही न चला कब रानी के पिताजी कमरे में आए और चुपचाप खड़े होकर दोनों को ध्यान से देखने लगे। जैसे ही उन दोनों की नजर उन पर पड़ी, तो रानी खुशी से हंसती हुई पिता के गले लग गई, पर राजू सहम सा गया। वह डर रहा था कि रानी के पिता उसे घर के अंदर देखकर डांटेंगे, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जब रानी के पिता ने राजू की आपबीती सुनी, तब उन्होंने मन ही मन कुछ फैसला किया और अपने ड्राइवर के साथ गाड़ी में राजू को घर भेजकर उसकी बीमार मां को भी अपने घर बुला लिया।

फिर घर के आंगन में बना एक कमरा दोनों को रहने के लिए दिया और कहा आज से वह वहीं रहेंगे। राजू की मां, रानी व घर की देखभाल करेगी। उन्होंने राजू का दाखिला भी एक स्कूल में कराने का फैसला किया। दूसरे दिन राजू ने भी रानी के साथ मिलकर दिवाली खूब धूमधाम से मनाई। दिवाली का त्योहार सब के जीवन में फिर से खुशियां ले आया था।

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