शिवराज का यह फैसला…

मुख्यमंत्री सचिवालय में आईएएस मनीष रस्तोगी की नियुक्ति शिवराज सिंह चौहान का वाकई बहुत चौंकाने वाला फैसला है। मनीष रस्तोगी को लेकर कुछ बातें याद करें। शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल कलेक्टर के पद से मनीष रस्तोगी को शिकायतों के बाद हटाया था। शिकायतें थी कि वे अक्खड़ स्वभाव के हैं और सीनियर अफसरों तक के फोन नहीं उठाते। शिवराज सरकार के तीसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों में सामने आए ई-टेंडरिंग घोटाले को सामने लाने का श्रेय भी मनीष रस्तोगी के खाते में दर्ज है। वे इस मामले के एक महत्वपूर्ण गवाह हैं। इस घोटाले के उजागर होने के बाद उन्हें मध्यप्रदेश इलेक्ट्रानिक्स डेवलपमेंट कार्पोरेशन में सचिव और एमडी के पद से हटाया गया था। तीसरे कारण से मनीष रस्तोगी को याद करना चाहे तो कमलनाथ सरकार में राजस्व विभाग के प्रशासनिक मुखिया रहते ही मध्यप्रदेश के किसानों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कृषक सम्मान निधि का फायदा नहीं मिला। इसके तहत हर किसान को साल में तीन किश्तों में छह हजार रूपए केन्द्र सरकार से मिलने थे। मध्यप्रदेश के किसानों को यह नहीं मिले तो इसका जिम्मेदार कमलनाथ के साथ मनीष रस्तोगी को भी माना जा सकता है

फिर आखिर क्या कारण बना कि आम तौर पर कम से कम राजनेताओं को रास नहीं आ सकने वाले एक अफसर को मुख्यमंत्री सचिवालय में शिवराज ने प्राथमिकता से शामिल किया। कह सकते हैं, यह परिवर्तन का संकेत है। किसमें? सरकार में तो यह जारी है और अभी आगे बहुत से होंगे भी। यह तीन बार में तेरह साल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज सिंह चौहान में बदलाव का संकेत हैं। शिवराज सिंह चौहान हमेशा वो राजनेता रहे हैं, जिन्हें राजनीति में बहुत हद तक ‘सेल्फ कांशस’ माना जा सकता है। वे दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी रहे हैं और इस बात में उनका भरोसा हो सकता है कि ‘सफलता कभी अंतिम नहीं होती और विफलता कभी मारक नहीं।’ वो इस बात से भी सबक ले सकते हैं कि ‘नाकामी अक्सर एक प्रत्यक्ष वरदान की तरह होती है, बशर्ते यह हमें ऐसे उपयोगी सबक सिखा सके, जो हम इसके बगैर नहीं सीख सकते थे।’ 2018 में आखिर सत्ता के किनारे पर आकर अगर शिवराज के हाथ से डोर छूट गई थी तो मैं मान सकता हूं कि शिवराज ने आत्मावलोकन किया होगा।

शायद इसलिए अक्खड़ ही सही, लेकिन अपनी ईमानदारी के लिए जाने वाले और आम तौर पर लो प्रोफाइल काम करने वाले अफसर मनीष रस्तोगी को उन्होंने प्राथमिकता से अपनी टीम में शामिल किया। कमलनाथ सरकार के दौरान मुख्यमंत्री सचिवालय में रहे जिन अफसरों की अभी विदाई होनी है, उनमें अशोक वर्णवाल, फैज अहमद किदवई और सेलवेन्द्रम शामिल हो सकते हैं। वर्णवाल तो ऐसे अफसर साबित हुए जो शिवराज के पिछले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के सचिवालय में शामिल हुए थे तो कमलनाथ की सवा साल की सरकार तक बरकरार रह गए। लेकिन शायद इस बार बरकरार नहीं रह पाएं। चंद्रशेखर बोरकर और टी इलैया राजा के बारे में शिवराज सोच समझकर ही फैसला करेंगे। इन अफसरों की परफार्मेंस पर सवाल नहीं हैं। पिछले तेरह सालों में शिवराज के जो नजदीकी रहे थे, माना जा रहा है कि वे सब एक बार फिर शक्तिशाली होंगे। कुछ तो जाहिर है अपनी कार्यशैली से होंगे ही। जैसे इकबाल सिंह बैंस को तत्काल मुख्यसचिव के तौर पर टीम शिवराज में जगह दे दी गई। याद करेंगे तो याद आएगा कि इकबाल सिंह बैंस भी वो ही अफसर है जिन्हें मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव रहते हुए संघ के दबाव में हटाया गया था।

कहा जा रहा है कि बैंस ने अपनी कार्यशैली में पिछली बार की तुलना में बदलाव किया है। मुख्यमंत्री सचिवालय में भी जिन अफसरों के नाम चल रहे हैं, उनमें विवेक अग्रवाल या संजय दुबे जैसे हाई प्रोफाइल अफसरों के नाम भी शुमार हैं। माना जाता है कि ये अफसर हर तरह से सरकार में अपनी स्थिति खुद तय करने में सक्षम माने जाते हैं। जितना मैंने एक पत्रकार के तौर पर पिछले तीस सालों में शिवराज सिंह चौहान को जाना है, उसके आधार पर कह सकता हूं कि इस बार शिवराज की नौकरशाही में वे चेहरे सामने आ सकते हैं जिनके पास उनके पिछले कार्यकाल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां नहीं थी। मुझे नहीं लगता कि इस बार वे खुद को किसी चौकड़ी के घेरे में फंसने देंगे। उनकी स्थिति खुद उनके पूर्ववर्ती कमलनाथ से जुदा कहां होंगी? अभी 24 विधानसभा सीटों के उपचुनाव तक तो बिल्कुल भी नहीं। उन्हें भी तलवार की धार पर चलकर ही सरकार चलाना है। ऐसे में कहा यह भी जा रहा है कि मनीष रस्तोगी को मुख्यमंत्री सचिवालय में नरोत्तम मिश्रा पर लगाम कसने के लिए लाया जा रहा है। नरोत्तम मिश्रा का कमलनाथ सरकार को गिराने में योगदान अहम है।

माना यह भी जा रहा है कि शिवराज सरकार में उनकी हैसियत नंबर दो से कम नहीं होगी। अब इससे कौन इंकार कर सकता है कि तेरह साल मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज ने कई अवसरों पर अपने को एक घाघ राजनीतिज्ञ भी साबित किया है। वे सारे दबाव जो कमलनाथ पर थे, वे या उनसे ज्यादा शिवराज सिंह चौहान पर भी होंगे। अगर उपचुनाव में शिवराज की सरकार ने बहुमत हासिल कर लिया तो शायद दबाव थोड़ा कम होगा लेकिन अभी तो जो कमिटमेंट किए हैं, वो उन्हें पूरे करना ही हैं। कमलनाथ सरकार में शामिल छह मंत्रियों का, जब भी शिवराज अपना मंत्रिमंडल गठन करते हैं, शामिल होना तय है। कांग्रेस के जिन विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दिया है, उनमें से लगभग आठ-दस मंत्री बनकर ही चुनाव मैदान में उतरेंगे। मजेदार यह भी होगा कि इनमें से एक मंत्री गोविंद राजपूत भी होंगे। राजपूत कमलनाथ सरकार में परिवहन के साथ राजस्व विभाग के मंत्री भी थे और राजस्व विभाग के प्रशासनिक मुखिया के तौर पर उनके साथ मनीष रस्तोगी ही थे। जाहिर है, दोनों की पटरी नहीं बैठती थी। तो ऐसा इस बार भी बहुत कुछ होगा। शिवराज को ईमानदार अफसरों के साथ व्यवहारिक अफसर भी निश्चित तौर पर चाहिए ही होंगे। आखिर उन्हें सरकार गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाल कांग्रेसियों से भी तालमेल बैठाना है। इस कारण से भाजपा में जिन लोगों का हक मारा जाएगा उनसे भी। मुझे लगता है आदमी गलतियां करता है और सीखता है। शिवराज में इसकी क्षमता गहरी है।

प्रकाश भटनागर/फर्स्ट कालम से साभार

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