बाहें पसारे खिलखिलाती प्रकृति

भले ही लॉकडाउन से किसी को लाभ नहीं हुआ हो, लेकिन पूरे विश्व की प्रकृति को इससे एक नर्ई जान मिली है। वह खिलखिला उठी है। पूरे देश में नदी, पहाड़, पर्वत, वृक्ष,आसमान,धरती सबकुछ पूरी तरह अपने सुंदरतम स्वरुप में हमारे सामने हैं। कहीं भी चले जाइए ताजी और स्वचछ हवा,गंगा-यमुना का निर्मल और मीठा जल,फलों का स्वाद और घर की बगिया में खिले फूल अपने मूल स्वरुप में नई कहानी कह रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानों प्रकृति के नए युग का आरम्भ हो रहा है। लॉकडाउन का आज 49 वां दिन है और कुछ घंटों के बाद हम इसके पचास दिनों की कहानी सुन रहे होंगे। जरा देख लें किस तरह प्रकृति के नए रंग हमारे मन को उल्लासित कर रहे हैं।

ओजोन की परत
ओजोन की परत धरातल से 10-50 किलोमीटर के बीच आसमान में पाई जाती है। यह नीले रंग की गैस की परत होती है। इससे हम हानिकारक यूवी किरणों से बचे रहते हैं। चूंकि इस समय रिफाइनरी,पेंट के कारखाने,एसी संयंत्र आदि बंद हैं इसलिए इनसे निकलने वाली हानिकारक गैसें नहीं निकल रही हैं। इस कारण ओजोन की परत गत दिनों में काफी हद तक सही हो गई है। वैज्ञानिक अनुमानों को मानें तो इसका लगभग एक मिलियन वर्ग किलोमीटर का चौड़ा छेद ठीक हो गया है।

वायु प्रदूषण

वायु प्रदूषण अपने निम्न स्तर पर है। चांदनी रात में नीले आसमान में तारे साफ और चमक के साथ टिमटिमाते हुए नजर आ रहे हैं। दूर से प्रात: सूरज की फैलनी वाली लालिमा भी नजर आने लगी है। वायु प्रदूषण के ना होने से जालंधर से 200 किलोमीटर दूर हिमाचल के पहाड़ों का नजारा मिल रहा है तो उत्तर प्रदेश के सहारपुर से गंगोत्री धाम के पहाड़ अपनी रौनक के साथ आपका मन मोह लेते हैं। नैनीताल में नंदा देवी की चोटियां ऐसी लग रही हैं जैसे अभी हाथ बढ़ाकर उन्हें हम छू लेंगे। यहां की नैनी झील का पानी एकदम निर्मल नजर आ रहा है। इसके पीछे बड़ा कारण यहां पर पर्यटकों की आवाजाही नहीं होना है। होटलों के सीवरेज का पानी इस समय 80 प्रतिशत कम हुआ है और यह झील की ओर नहीं जा रहा है। अमेरिकी एजेंसी नासा का कहना है कि 20 साल में प्रदूषण का यह निम्न स्तर है।

चंचल नदियां

देशभर की नदियां पतित पावनी होकर पूरे वेग से बह रही हैं। पहाड़ों पर बहते झरने एकदम साफ और पूरी निर्मलता से नदियों की ओर दौड़ रहे हैं। गंगा और यमुना की शुद्धता इतनी हो गई है कि इनमें अठखेलियां करती मछली और छोटे-छोटे पत्थर साफ नजर आ रहे हैं। गंगा के प्रदूषण स्तर में 55 प्रतिशत तक सुधार हुआ है। कोलकाता में गंगा के घाटों पर तीस साल के बाद डाल्फिन देखने को मिल रही हैं।

घर की बगिया में चहचाहट

होग गॉर्डन की रौनक तो कुछ और ही है। जो पक्षी बहुत मुश्किल से नजर आते थे वह भी आसानी से शहरों में दिख रहे हैं। हरियल तोता,कोयल और गौरया के अतिरिक्त फूलों पर तितली और भौरे भी मडराते हुए साफ देखे जा सकते हैं। फूलों के रंग भी पहले से काफी चटक हो गए हैं। सर्दियों के फूल,यथा गजेनिया,पेंजी,पिठूनियां अभी भी खिल रहे हैं।

मरीजों की संख्या में कमी
चूकि प्रदूषण का स्तर कम है और लोग घरों से कम ही निकल रहे हैं इसलिए खासी-जुखाम के साथ ही अस्थमा के मरीज भी कम नजर आ रहे हैं। खाने-पीने में बाजार का कम,घर का बना अधिक और तला-भुना कम ही प्रयोग हो रहा है इसलिए पेट की समस्या भी पहले से कम हो रही है। घरों रहते हुए व्यायाम,एरोविक्स,नृत्य आदि से शरीर को उसकी पुरानी लय और लोच देने के लिए समय ही समय है।

दूर तक सुंदर दृश्य

देश-विदेश में कहीं भी चले जाओ हर कहीं सुंदरता बिखरी पड़ी है। पहाड़ों,नदियों,गांवों के दृश्य देखकर फिल्मों के दृश्य नजर के सामने आ जाते हैं। इनके रंगों की ब्राइटनेस और सुंदरता को देखकर मन भरता ही नहीं है। वन्य जीव अभ्यारणों में वन्य जीव आजादी के साथ घूम रहे हैं। यहां पर्यटकों की आवाजाही जीरो होने से उनकी आजादी में कोई खलल नहीं है,लिहाजा इन्हें जहां-तहां विचरण,अठखेलियां करते हुए देखा जा सकता है।

मनोज वार्ष्णेय

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