अंबेडकर के नाम में ‘रामजी’ जोड़ना सिर्फ चुनावी पैंतरा

अखिलेश अखिल

गजब की राजनीति है देश की। इतिहास के पन्नो को खंगालकर बीजेपी के लोगों ने सिर्फ वोट की राजनीति के खातिर संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर के नाम के साथ उनके पिता रामजी को भी जोड़ दिया है। अब उनका नाम डा. भीमराव रामजी अंबेडकर हो गया। बीजेपी को अबतक अंबेडकर का उपयोग नहीं लग रहा था लेकिन आगामी चुनाव और अयोध्या में राम मंदिर के खातिर अब उसे भीमराव रामजी अंबेडकर की जरुरत महसूस हो रही है। लेकिन खेल देखिये कि एक तरफ उत्तर प्रदेश सरकार अंबेडकर को राममय कर रही है तो दूसरी तरफ उसी यूपी के कई इलाके में अंबेडकर की मूर्तियां तोडी जा रही है। इलाहाबाद के बाद अब सिद्धार्थनगर में भी अंबेडकर की मूर्ति तोड़ी गयी है। राजनीति का यह रूप बिरले ही देखने को मिलता है। बता दें कि यूपी के राज्यपाल नाइक ने बाबा साहेब के नाम में रामजी जुड़वाने के लिए 2017 से ही एक अभियान चलाया था। उन्होंने नाम में बदलाव के लिए उस दस्तावेज का भी हवाला दिया था, जिसमें भीमराव अंबेडकर के हस्ताक्षरों में रामजी नाम शामिल था।

बता दें कि डा.अंबेडकर महाराष्ट्र के रहने वाले थे। महाराष्ट्र में बेटे के नाम के साथ पिता के नाम को जोड़ने का रिवाज है। इसलिए भीमराव अंबेडकर के नाम के साथ रामजी जोड़ा गया। लेकिन सवाल उठाया जा सकता है कि अगर बाबा साहेब के पिता का नाम रामजी न होकर सुरेश, महेश,आकाश , रुदल ,गेना या कुछ भी होता, क्या तब भी उनके नाम में पिता का नाम जोड़नेे के लिए ऐसा अभियान चलाया जाता? क्या इससे लोगों को खासकर सवर्णों को भीमराव अंबेडकर की महत्ता, उनका जीवन दर्शन, उनका संघर्ष समझ में आएगा? क्या इससे उनकी मूर्तियों पर होने वाले हमले रुक जाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल, जिन दलितों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए, जिनके हक के लिए उन्होंने आजीवन संघर्ष किया, क्या इस नाम परिवर्तन से दलितों की स्थिति सुधर जाएगी? नाम बदलना तो सरकारी, प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन दलितों की स्थिति बदलना सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें काफी कठिनाई है। तो क्या यह मान लिया जाए कि योगी सरकार ने समाज को बदलने की जगह नाम बदलने का एक आसान रास्ता चुना है।

कानून के ज्ञाता और सामाजिक आंदोलन के प्रणेता रहने के बाद भी डा.अंबेडकर जीते जी अपनी हालत तक नहीं बदल पाए थे। आजिज आकर अंत में उन्होंने आखिरकार हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। 1956 में डा. अंबेडकर की मृत्यु हुई, तब से अब तक 62 बरस बीत गए, लेकिन देश में दलितों की स्थिति दयनीय ही बनी हुयी है। आज भी दलित सबसे ज्यादा ना सिर्फ छुआछूत के शिकार हैं वल्कि शोषण और अत्याचार के भी शिकार हैं। समाज में सबसे ज्यादा गरीबी और अशिक्षा इसी समाज में है। आजादी के 70 बाद भी जो नहीं बदल सका। और जहां तक धर्म -जाति की बात है सच तो यही है यह रोग पहले से भी ज्यादा उग्र हो गया है। राजनीति के जरिए समाज में आया यह रोग ख़त्म होने की बजाय कोढ़ की तरह फैलता जा रहा है या फैलाया जा रहा है। समाज में धर्म और जाति की बेड़ियां और मजबूत होती जा रही हैं। तिस पर चुनावों में धर्म का सिक्का चलता देख, राजनीतिक दल इन बेड़ियों को और मजबूत करने में लगे हैं। डा. अंबेडकर के नाम में रामजी शामिल करना भी चुनावी पैंतरा ही नजर आता है।

सच तो यही है कि भाजपा और दक्षिणपंथी संगठन किसी भी तरह से अयोध्या में राम मंदिर बनवाना चाहते हैं। अब जब तक उनकी यह महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो रही, तब तक वे राम के नाम को भुनाने में लगे हैं। संयोग से डा.अंबेडकर के नाम में रामजी जोड़ने का मौका उनके हाथ लग गया है। अब शायद वे दलितों को यह संदेश देना चाहते हों कि तुम्हारे मसीहा के नाम में भी हमने रामजी जोड़ दिया है, अब तुम भी राम की शरण में आओ, यानी भाजपा की शरण में आ जाओ। दलितों के बीच रामजी के नाम का यह सन्देश बीजेपी को कितना लाभप्रद हो पायेगा अभी कहना कठिन है लेकिन इतना तो तय है कि देश का दलित समाज बीजेपी के इस खेल को जान गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यूपी की योगी सरकार दलित समाज को आगे बढ़ाने का काम करे ताकि डा. अंबेडकर की आत्मा को शांति मिल सके।

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