अकेले हम…अकेले तुम

दिनेश दीनू

जनवरी, 2019 के पहले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव मायावती को बुआ-बुआ कहते रहे, लेकिन मायावती बुआ बनने को तैयार नहीं थीं। भतीजा बनने का स्वांग कर रहे अखिलेश के पापा मुलायम सिंह यादव द्वारा मायावती को दिए गए 35 साल पुराने ‘गेस्ट हाउस’ कांड की रार मायावती को चुभती थी। माना जाता था कि सपा और बसपा कभी भी अपनी दुश्मनी भुला कर एक मंच पर नहीं आएंगे। लेकिन जनवरी, 2019 में करिश्मा हो गया, जब सपा-बसपा 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए गलबहियां हो गए। बुआ ने भतीजे को गले ही नहीं लगाया, बल्कि भतीजे के पापा मुलायम सिंह के लिए मैनपुरी में वोट भी मांगा। एक मंच पर मुलायम और मायावती थे। मायावती ने मुलायम के लिए वोट मांगा, तो मुलायम ने जनसैलाब से कहा कि मायावती का सम्मान करना। सम्मान में ही कन्नौज की चुनावी सभा में डिंपल यादव ने मायावती के पैर तक छुए।

यह दृश्य लोगों की आंखों में बस गया था, लेकिन चुनावी नतीजों ने इसमें किरकिरी डाल दी। वही हुआ जिसका अंदेशा सपा-बसपा के साथ आने पर हुआ था। राजनीति में मायावती का साथ आना और रिश्ता तोड़ लेना शगल रहा है। वह फायदे की राजनीति 100 प्रतिशत करती हैं। और यही समझने में अखिलेश चूक गए। 142 दिनों की राजनीतिक रिश्तेदारी की चूलें हिल गईं। मोदी और योगी 2019 के लोकसभा चुनावों में कहते रहे कि 23 मई के बाद गठबंधन खत्म हो जाएगा, और यही हुआ भी। सपा-बसपा-रालोद सभी ने अपने रास्ते चुन लिए हैं। चुनाव परिणामों पर मायावती ने साफ-साफ कह दिया कि सपा के साथ उनका गठबंधन राजनीतिक मजबूरी थी। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का मलाल भी है कि लोकसभा चुनाव में यादव वोटर गठबंधन उम्मीदवारों के साथ नहीं खड़े रहे। सपा के बड़े नेताओं की हार से साफ है कि सपा का वोट एकजुट नहीं हुआ।

मुलायम सिंह यादव पहले तो बसपा के साथ अखिलेश यादव द्वारा किए गए गठबंधन से खुश नहीं थे। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि आधी बाजी तो हम हार चुके हैं। दरअसल, 37-38 सीटों के गठबंधन में मुलायम सिंह यादव को लगा था कि सपा के कदम पीछे हैं। अखिलेश गठबंधन को बनाए रखने के लिए दो कदम पीछे जाने को भी तैयार थे। यूपी से अगला प्रधानमंत्री होने की बात अखिलेश करते रहे। जब मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात होती, तो खुल कर सामने नहीं आते थे। एक तरह से राजनीतिक मजबूरी में उनकी मौन सहमति थी।

सपा अपने ही बनाए हालात में पीछे पहुंच गई। पारिवारिक विवाद ने संगठन को चौराहे पर ला दिया। मुलायम सिंह यादव भी कभी अखिलेश और कभी शिवपाल यादव के खेमे के चेहरे बनते रहे। यही कारण रहा कि यादव वोटर तय नहीं कर पाया कि किधर जाए। सपा को मुगालता रहा कि यादव वोट बसपा में ट्रांसफर होंगे, तो दलित वोट सपा में। सपा का मुसलमान वोटर भी समझ नहीं पा रहा था कि किधर जाएं। यादव, दलित और मुसलमान वोटों ने अंधेरे की बजाय रोशनी की ओर देखा। नतीजा रहा कि जहां यूपी से भाजपा की लुटिया डूबने की आशंका जताई जा रही थी, वहीं भाजपा दमखम के साथ ऊपर उठ गई। 10 सीटें पाकर बसपा ने मंगलगान किया, तो सपा वहीं पहुंच गई जहां 2014 में थी। एक तरह से गठबंधन का लाभ बसपा को कुछ हद तक मिला, लेकिन सपा खाली हाथ रही।

देखा जाए तो यूपी में गठबंधन की सियासत का इतिहास कभी अच्छा नहीं रहा। कोई भी गठबंधन यूपी में लंबे समय तक नहीं चला। सपा-बसपा, भाजपा-बसपा, कांग्रेस-बसपा, रालोद-कांग्रेस, सपा-कांग्रेस जैसे अनेक गठबंधन अब तक बने, लेकिन स्वार्थ की राजनीति सतह पर रही, जिससे हर बार गठबंधन लंबी उम्र पाने से पहले ही दम तोड़ता नजर आया।

यूपी में गठबंधन का दौर शुरू हुआ 1989 में, जब भाजपा और सपा गले मिले। इस साल मुलायम सिंह यादव भाजपा के समर्थन से संयुक्त मोर्चा के मुख्यमंत्री बने थे। 1990 में राममंदिर आंदोलन के समय जब भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोका गया, तब भाजपा ने राज्य सरकार के साथ ही केंद्र को दिए गए समर्थन को वापस ले लिया था। इसके बाद 1993 में जब यूपी में चुनाव हुए, तो सपा-बसपा का गठबंधन परवान चढ़ा। गठबंधन को विजय मिली, तो मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। मुलायम सिंह यादव कार्यकाल पूरा करते कि उससे पहले ही 2 जून 1995 को बसपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। 5 दिसम्बर, 1993 को मुलायम ने शपथ ली थी, 2 जून को, 1995 को बसपा ने जोर का झटका दिया। इस झटके का परिणाम यह हुआ कि लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती के साथ सपाइयों ने बदसलूकी की।

इस परिदृश्य का लाभ उठाते हुए भाजपा ने 3 जून, 1995 को बसपा को समर्थन देते हुए मायावती को मुख्यमंत्री मान लिया। 6 महीने ही हुए थे कि यह गठबंधन भी टूट गया। तारीख थी 18 अक्टूबर, 1995। इसके बाद मायावती कांग्रेस को साथ लेकर फिर मुख्यमंत्री बनीं। भाजपा घात लगाए बैठी थी। कांग्रेस के साथ से मायावती की सरकार बने 8-9 महीने ही हुए थे कि भाजपा नेता कल्याण सिंह ने सियासी बिसात बिछाकर बसपा के 22 विधायकों को अपने पाले में कर लिया। इन विधायकों के समर्थन से कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बन गए। राजनीतिक भितरघात जारी था। बसपा से अलग हुए कुछ विधायक कांग्रेस के करीब हो गए और तब के कांग्रेसी जगदंबिका पाल एक दिन के मुख्यमंत्री बन गए।

इस उठा-पटक की राजनीति में 2001 में राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे। तब हुए चुनाव में कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन हुआ था। पर इस गठबंधन का कोई लाभ बसपा को नहीं मिला। चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव को कांग्रेस ने समर्थन देकर उनकी सरकार बनवा दी। 2012 में रालोद और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ, जो चल नहीं पाया। सपा की सरकार बनते ही गठबंधन टूट गया। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन हुआ, लेकिन चुनावी नतीजों ने टूट पैदा कर दी। यूपी में गठबंधन राजनीति चौराहे पर रही। जिसे जो रास्ता दिखा उसी पर चल पड़ा। गठबंधन कभी उस ओर नहीं गया, जहां बंद गली का आखिरी राजनीतिक दर था।

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