अखिलेश, ममता और शरद पवार राहुल की राह के मुश्किल

दिल्ली ब्यूरो: एमजे अकबर का इस्तीफा को मामूली इस्तीफा नहीं है। पीएम मोदी के इस मंत्री के इस्तीफे से मोदी सरकार की नाक कटी है। सरकार का इकबाल धूल धूसरित हुआ है। विपक्ष के हौसले बढे हैं। लेकिन एमजे अकबर के इस्तीफे के बाद भी कांग्रेस मौन है। आखिर क्यों ? वह इसलिए कि राहुल गाँधी ने अपने लोगों को साफ़ साफ़ कह दिया है कि इस मामले को ज्यादा आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है। बता दें कि मी टू अभियान के बाद जैसे ही अकबर पर महिलाओं ने आरोप लगाए सबसे पहले राहुल गाँधी ने ही अकबर से इस्तीफे की मांग की। पीएम मोदी इस्तीफा नहीं चाहते थे लेकिन जैसे ही 20 से ज्यादा महिलाओं ने अकबर के खिलाफ सामने आयी राहुल गाँधी की अकबर के इस्तीफे की मांग को मजबूती मिल गयी। फिर वही हुआ जो होना था। अकबर ने इस्तीफा दे दिया। इतना सब होने के बाद भी कांग्रेस ने इस इस्तीफे को प्रचारित नहीं किया और ना ही इसका श्रेय लिया। भाजपा के कुछ नेता यह प्रचारित करने में जुटे कि यह मोदी का कड़ा फैसला था। लेकिन राहुल गांधी ने अपने प्रवक्ताओं को साफ हिदायत दी कि कोई भी नेता इसे कांग्रेस या राहुल की जीत नहीं बताएगा। इसे कांग्रेस महिला शक्ति की जीत ही दिखाएगी। जिस तरह से मोदी सरकार का पहला विकेट गिरा है इसके बाद राहुल कैंप में माहौल बदला-बदला सा है। एमजे अकबर के इस्तीफे को राहुल के करीबी नेता 2019 का ‘गेमचेंजर’ मान रहे हैं। लेकिन अंदर ही अंदर एक नहीं तीन ऐसे लोग हैं जो राहुल गांधी का खेल खराब कर सकते हैं। राहुल गांधी का खेल ख़राब करने वालों में अखिलेश यादव ,ममता बनर्जी और शरद पवार हैं।

यह बात और है कि अगले चुनाव में बीजेपी को मात देने के लिए महागठबंधन की बातें चल रही है लेकिन यूपी में अखिलेश और मायावती कांग्रेस को कोई भाव नहीं दे रहे हैं। ठीक इसी तरह से मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने सपा और बसपा को कोई भाव नहीं दिया। अब माना जा रहा है कि यूपी में कांग्रेस को मायावती और अखिलेश कोई भाव नहीं देंगे। अखिलेश यादव तो कब से गठबंधन करना चाहते हैं, मायावती ही इसके लिए अपना मन नहीं बना पा रहीं थीं। लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस द्वारा ‘सही’ भाव न दिये जाने के बाद स्थिति बदल गई। इसके बाद जिस अंदाज़ में वे चुनाव मैदान में उतरी हैं उससे यह तय है कि वे कुछ भी करके खुद को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहती हैं। एक अखिलेश ही हैं जो कम से कम इस एक कुर्सी को लेकर एकदम क्लीयर हैं। वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते हैं इसलिए मायावती को उनसे कोई खतरा नहीं हैं।

खबर है कि मायावती ने अखिलेश यादव के पास मैसेज भिजवाया है कि सपा, बसपा, अजीत सिंह की लोकदल और ओमप्रकाश राजभर की पार्टी को साथ मिलाकर महागठबंधन का सूत्र तैयार किया जाए। कांग्रेस के लिए दो-चार सीटें छोड़ी जाएं जिन्हें कबूल करना या न करना राहुल गांधी का फैसला होगा। लेकिन राहुल गांधी की टीम के एक सदस्य बताते हैं कि अब कोई पासा जल्दी नहीं फेंका जाएगा। जिस तरह से राहुल के कुछ फैसले सही हो रहे हैं, उनकी मांगें देर-सबेर मोदी सरकार सुन रही है, उसी तरह से वे अपने सहयोगियों को भी अपने पाले में ले आएंगे। कांग्रेस के एक नेता बताते हैं कि पहले नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी राहुल गांधी को कमजोर विरोधी समझते थे। लेकिन बीतते हर दिन के साथ राहुल सही साबित हो रहे हैं। वे बोलने में भले ही कमजोर हैं सोचते एकदम सटीक हैं।

उधर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ सीटों का मोलभाव करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अभी सिर्फ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव पर ध्यान देना चाहती है। लेकिन पवार ने कांग्रेस के बड़े नेताओं के पास संदेश भेजा है कि इसी साल महाराष्ट्र में भी सीटों का फॉर्मूला तय हो जाना चाहिए। पवार के एक करीबी बताते हैं कि एनसीपी इस बार जूनियर पार्टनर नहीं बराबर की हिस्सेदारी चाहती है। महाराष्ट्र की 48 में से 24-24 सीटों पर बंटवारा हो तभी शरद पवार राहुल गांधी को अपना नेता मानेंगे।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो एनसीपी और भाजपा का भी गठबंधन हो सकता है। अंदरखाने चल रही खींचतान का ही ऊपरी असर था जब पवार ने राफेल डील पर अपने अंदाज़ में मोदी सरकार की मदद की थी। महाराष्ट्र की खबर रखने वाले पत्रकार बताते हैं कि इस वक्त महाराष्ट्र में भाजपा बेहद चिंतित हैं। पार्टी का आतंरिक सर्वे बता रहा है कि अगर शिवसेना से गठबंधन नहीं हुआ तो 12 से 15 सांसद चुनाव हार सकते हैं। शिवसेना खुद भी हारेगी और भाजपा को भी हराएगी। महाराष्ट्र में इस वक्त भाजपा के दोनों बड़े नेता – मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी – नागपुर से आते हैं, लेकिन दोनों ही मराठी नहीं हैं। इसलिए भाजपा को जरूरत एक ऐसे मराठी नेता की है जो विदर्भ के अलावा बाकी इलाकों में भी मराठी वोट दिला सके। जानकारी मिल रही है कि जिस तरह 2014 में फड़णवीस सरकार को एनसीपी ने बाहर से कुछ दिनों के लिए समर्थन दिया था वैसा ही इस बार भी हो सकता है। अगर शिवसेना ने गच्चा दे दिया तो पवार की पार्टी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में भाजपा की मदद कर सकती है।

उधर पश्चिम बंगाल में स्थिति एकदम अलग है। ओपीनियन पोल के अनुमानों ने ममता बनर्जी की पार्टी को चौंका दिया है। एक ओपीनियन पोल में तो यहां तक दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल की पहली पसंद हैं और ममता उनसे बहुत पीछे हैं। तृणमूल कांग्रेस की रणनीति देखकर कुछ नेताओं से बात करें तो पता चलता है कि दीदी की पूरी प्लानिंग ही इस बात पर टिकी है कि देश में पहली बार बंगाली प्रधानमंत्री बन सकता है। ममता इस बार लोकसभा का चुनाव खुद को प्रधानमंत्री की कैंडिडेट प्रोजेक्ट कर लड़ना चाहती हैं। ऐसे में बंगाल से भी उल्टी खबर आ रही है। वामपंथ मोर्चे की खबर रखने वाले पत्रकार कुछ चौंकाने वाली खबरें सुना रहे हैं।

ममता बनर्जी और सीताराम येचुरी के बीच बातचीत शुरू हो गई है। लेफ्ट फ्रंट और ममता दोनों को ही लगता है कि अगर अलग-अलग चुनाव लड़े तो तिकोना मुकाबला होगा और फायदा भाजपा को हो सकता है। उत्तर बंगाल के कुछ जिलों को छोड़ दें तो बाकी प्रदेश में कांग्रेस मजबूत नहीं है। लेकिन लेफ्ट के कैडर अब भी पूरे बंगाल में है और हर सीट पर एक लाख से ज्यादा वोट लेफ्ट प्रत्याशियों को मिलना करीब-करीब तय है। इसलिए बहुत चौंकिएगा नहीं अगर लेफ्ट और ममता का गठबंधन बंगाल में हो जाए और राहुल गांधी को यहां और भी झुकना पड़े।

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