अगर बच्चा झूठ बोलता हो तो सावधान हो जाएं नहीं तो…

नई दिल्ली: बच्चा पूछता है, मॉम, क्या मैं बारिश में खेलने जाऊं? क्या मैं आइसक्रीम खा लूं? क्या मैं अपने दोस्तों के साथ ट्रैकिंग पर जाऊं? इन प्रश्नों के लिए मां का क्या जवाब होगा, हम सभी जानते हैं। मां कहेगी नहीं और बच्चा मायूस हो जाएगा। माताएं अपने बच्चों सुरक्षा के प्रति बहुत सावधान रहती हैं। उनका पूरा ध्यान इस बात पर रहता है कि उनके बच्चे सेहतमंद रहें, उचित खाना खाएं, समय पर सोएं, स्कूल में अच्छा परफॉर्म करें। उनकी सावधानियों की सूची अंतहीन है। जहां एक तरफ ज्यादातर माताएं बच्चों की शारीरिक सेहत के प्रति बहुत सावधान होती हैं, तो वहीं दूसरी तरफ वे बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान नहीं देतीं।

अपनी सावधानी में माताएं इस कदर मशगूल हो जाती हैं कि यह भूल जाती हैं कि उनके व्यवहार का बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। बार-बार ‘न’ सुनने का बच्चों के मनोविज्ञान पर बुरा असर पड़ता है। मनोवैज्ञानिक डॉ. सपना जरवाल कहती हैं, बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। वे अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व का विकास होता है।

अपने माता-पिता से बार-बार ‘न’ सुनकर बच्चे झूठ बोलने या फिर अपने माता-पिता से चीजें छिपाने लगते हैं। उन्होंने कहा, इन चीजों से मां और बच्चे के बीच संबंध खराब हो सकते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि मां को एहसास हो कि असली समस्या बच्चे की मांग नहीं, बल्कि उनका कमजोर प्रतिरोधी तंत्र है, जिस कारण वे बार-बार बीमार पड़ते हैं।

डॉ. सपना के मुताबिक, माताएं बच्चों को ‘न’ इसलिए कहती हैं कि वे उनके संपूर्ण विकास के लिए फिक्रमंद होती हैं। कामकाजी माताओं के बच्चे कई बार उनकी निगरानी के बिना खाते-पीते हैं, जिस कारण माताओं के लिए यह सुनिश्चित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि उनके बच्चे को सभी जरूरी पोषक तत्व प्राप्त हो रहे हैं या नहीं। जो बच्चे अपने माता-पिता से लगातार उपेक्षित रहते हैं, वे स्वभाव से बहुत ज्यादा अंतर्मुखी हो जाते हैं। कई बच्चे निर्णय लेने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि वे यह तय नहीं कर पाते कि वे जो कर रहे हैं, वह सही है या गलत।

उनका सामाजिक कौशल काफी खराब होता है और वयस्क होने पर अपने कार्यस्थल पर टीम के अच्छे सदस्य नहीं कहलाते। न्यूट्रिशनिस्ट डॉ. नीति देसाई ने बताया, अक्सर माताएं मेरे पास अपने बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित अवस्था में आती हैं, क्योंकि उनका बच्चा अनियमित आहार लेता है और अक्सर बीमार पड़ जाता है। उन्हें हर चीज के लिए अपने बच्चों के पीछे भागना पड़ता है और फिक्रमंद मां होने के कारण उन्हें कई सारी चीजों के लिए न कहना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि बार-बार ‘न’ कहने से बच्चों के व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अनियमित आहार लेने की आदत अधिकांश बच्चों में समय के साथ बदल जाती है और बाद में उनके आहार में आवश्यक पोषक तत्व शामिल हो जाते हैं। तब डाइनिंग टेबल पर आहार को लेकर डांट-डपट की संभावनाएं भी खत्म हो जाती हैं।

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