अगर यूपी उपचुनाव गठबंधन के पक्ष में गए तो बदल जाएगा सियासी जायका

अखिलेश अखिल

फूलपुर, गोरखपुर उपचुनाव परिणाम और 23 मार्च को प्रदेश से 10 राज्य सभा सीटों के चुनाव भविष्य की राजनीति तय करेंगे। बसपा ने एक राज्य सभा सीट के लिए अपना उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को उतारा है। बदलती राजनीति में कांग्रेस ने बसपा उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर को समर्थन देने का एलान किया है। सपा भी अपने सरप्लस वोट बसपा उम्मीदवार को देगी। इसके बदले में बसपा पहले से ही उपचुनाव में सपा को समर्थन देने का ऐलान किया हुआ है। माना जा रहा है कि बसपा -सपा -कांग्रेस -आरएलडी और निषाद पार्टी के सहयोग से बसपा उम्मीदवार राज्य सभा में पहुँच जाएंगे। इन सभी दलों को मिलाकर 38 विधायकों की संख्या बनती है जबकि जीत के लिए 37 विधायकों की ही जरूरत है।

अब इसमें कोई शक नहीं कि आगे की राजनीति गठबंधन के जरिये ही चलेगी। यह बात और है कि फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव में कांग्रेस ने भी अपना उम्मीदवार उतारा है लेकिन जिस तरह से कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश कांग्रेस के फैसले पर अपनी सहमति जताते हुए बीजेपी को रोकने के लिए बसपा उम्मीदवार को मदद करने की बात कही है ,वह आगे की राजनीति के लिए बहुत कुछ कहती दिखाई पड़ती है। ऐसे में अगर यूपी लोकसभा उप चुनाव और राज्यसभा चुनाव के नतीजे सपा-बसपा की दोस्ती के पक्ष में रहते हैं तो इस बात की पूरी संभावना है कि बसपा सुप्रीमो मायावती 23 साल पहले के गेस्ट हाउस कांड को भुलाकर 25 साल पुराने सपा-बसपा के गठबंधन की कहानी को व्यापक स्तर पर दोहरा सकती हैं।

इस बात की अब पूरी संभावना बनती दिख रही है कि 2019 का लोकसभा चुनाव सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ-साथ आरएलडी भी एक महागठबंधन के तहत लड़ सकती है।उत्तर भारत में इस गठबंधन के साथ पहले से ही राजद ,झामुमो जैसी पार्टी है जिनका आधार अपने अपने राज्यों में है। शरद पवार और शरद यादव के साथ शिवसेना और ममता भी इस गठजोड़ में शामिल हो सकती हैं। कांग्रेस की असली चिंता नवीन पटनायक ,चंद्रबाबू नायडू को लेकर है। अगर इनके साथ बात बन जाती है तो एक व्यापक राजनीतिक जमीन तैयार होगी।

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