अपनों के विद्रोही तेवरों को ठंडा करने की जुगाड़ में भाजपा-कांग्रेस

मध्यप्रदेश में होने वाले लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान में अब केवल नौ दिन का समय शेष है और प्रचार अभियान का शोर सात दिन बाद थम जायेगा। भाजपा और कांग्रेस के सामने इस समय कुछ क्षेत्रों में टिकट वितरण से असंतुष्ट हुए नेताओं या कोपभवन में बैठे नेताओं को सक्रिय करना एक चुनौती बन गया है। इन दिनों डेमेज कंट्रोल करने की जिम्मेदारी भाजपा में मुख्यरुप से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सौंपी गयी है। भाजपा हाईकमान ने यह भी साफ कर दिया है कि इस चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने की जिम्मेदारी उनके ही कंधों पर है। शिवराज के साथ ही डेमेज कंट्रोल करने में प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे, केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा एवं चुनाव प्रभारी स्वतंत्रदेव सिंह तथा संगठन मंत्रियों को भी यही जिम्मेदारी सौंपी गयी है। क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह एक तो खुद चुनाव लड़ रहे हैं और दूसरे नाराज कार्यकर्ताओं पर उनकी बातों का कोई असर होता नजर नहीं आता। वहीं कांग्रेस में रुठों को मनाने, निष्क्रियों को सक्रिय करने और विद्रोही तेवर दिखाने वाले लोगों को मनाने के लिए मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मोर्चा संभाल लिया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह जबलपुर में कांग्रेस उम्मीदवार विवेक तन्खा से मिल रही कड़ी चुनौती में कुछ इस प्रकार उलझ गए हैं कि अपने क्षेत्र से बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं। उसके उलट कांग्रेस में सारा दारोमदार मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के कंधों पर है, वे स्वयं विधानसभा का और उनके बेटे नकुलनाथ लोकसभा का छिंदवाड़ा में चुनाव लड़ रहे हैं इसके बावजूद कमलनाथ पूरे प्रदेश में प्रत्याशियों को जिताने के अभियान में भिड़े हुए हैं।

भाजपा मध्यप्रदेश में सभी 29 सीटों पर जीत का परचम लहराने का लक्ष्य लेकर चुनावी समर में उतरी है तो वहीं कांग्रेस भी 20 से अधिक लोकसभा सीटें जीतने की रणनीति पर काम कर रही है। जहां तक लक्ष्य का सवाल है वह बढ़ा-चढ़ा कर ही रखा जाता है। भले ही भाजपा 29 सीटों पर जीत का लक्ष्य लेकर चल रही हो लेकिन यदि वह 20 से अधिक सीटें जीत लेती है तो फिर यह माना जाएगा कि अभी भी मध्यप्रदेश के मतदाताओं पर शिवराज के आभामंडल का जादू छाया हुआ है। उधर कांग्रेस भले ही 20 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है लेकिन यदि वह 15 से अधिक सीटें जीत लेती है तो यह कमलनाथ की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा कि कमलनाथ के वचनपत्र और बदलाव की बयार का कितना असर है या शिवराज का जादू अभी भी मतदाताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है या नहीं। इस समय दोनों दलों की रणनीतियों को पहले तो चुनौती अपनों से ही मिल रही है। भाजपा में असंतोष की अधिक खबरें सामने आ रही हैं जबकि तुलनात्मक रुप से कांग्रेस में असंतोष कुछ कम है। भाजपा में तो हालात यहां तक हो गए कि सांसद बोधराम भगत को बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा क्योंकि वे चुनाव मैदान में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार ताल ठोंक रहे हैं। शिवराज दूसरे सांसद ज्ञान सिंह को चुनाव न लड़ने के लिए सहमत कराने में तो सफल हो गए लेकिन कोपभवन से निकालने में अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिली है। शुक्रवार को शहडोल लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत कोतमा और पुष्पराजगढ़ में भाजपा प्रत्याशी हिमाद्री सिंह के समर्थन में शिवराज ने जो सभायें लीं उनके मंच से ज्ञान सिंह नदारद थे। जब केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर क्षेत्र में आये और हिमाद्री ने जब नामांकन किया उस समय भी ज्ञान सिंह और उनके बेटे भाजपा विधायक शिवनारायण सिंह भी नजर नहीं आये। ज्ञानसिंह कह चुके हैं कि वे संसाधनों के अभाव के कारण चुनाव नहीं लड़ रहे लेकिन हिमाद्री का प्रचार भी नहीं करेंगे।

भाजपा को डेमेज कंट्रोल करने में खजुराहो में सफलता मिल गयी है जहां उसके प्रत्याशी विष्णुदत्त शर्मा के नामांकन के वक्त वे सभी नेता मौजूद थे जो उन्हें टिकट मिलने के बाद बाहरी प्रत्याशी होने के आधार पर विरोध का झंडा बुलंद करते हुए पुतला दहन कर रहे थे। यहां शायद रुठे हुए भाजपा कार्यकर्ताओं को मन मसोसकर इसलिए साथ आना पड़ा क्योंकि एक तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के दबाव में शर्मा को उम्मीदवार बनाया गया था और दूसरे संघ के सक्रियता के साथ ही साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद पूरी ताकत से उनके पीछे खड़ी थी। अन्य क्षेत्रों में अभी रुठे व अनमने उन लोगों को मैदान में उतारने के लिए भाजपा को काफी मशक्कत करना होगी। टिकट वितरण के साथ ही भाजपा में बालाघाट, शहडोल, सीधी, राजगढ़ और मंदसौर में घोषित प्रत्याशियों को लेकर नाराजी का भाव है। गुना, ग्वालियर, भिण्ड में भी प्रत्याशी चयन को लेकर बड़े नेताओं में कुछ नाराजगी है, भिण्ड में तो मुरैना के महापौर और पूर्व सांसद अशोक अर्गल पार्टी से अपनी नाराजगी बयां कर चुके हैं। चुनाव प्रचार अभियान में उनकी भूमिका भी इस लोकसभा क्षेत्र में प्रभाव डाल सकती है। भाजपा को धीरे से एक जोर का झटका आज भिंड क्षेत्र में लगा जब उसके वहां विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी रहे चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी की पुन: घर वापसी हो गई और वे कांग्रेस में लौट आए। हालांकि उनकी घर वापसी पर कांग्रेस नेता अजय सिंह की प्रतिक्रिया आना अभी शेष है। लेकिन कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हे शिवपुरी में कांग्रेस की सदस्यता दिलाई। बुंदेलखंड में सागर, खजुराहो और टीकमगढ़ में भाजपा प्रत्याशियों को लेकर जमकर विरोध हुआ और नेताओं के पुतले भी फूंके गये।
जहां तक कांग्रेस का सवाल है उसमें भी भिण्ड, धार, बैतूल, मंडला और खरगोन में प्रत्याशी चयन को लेकर विरोध हो रहा है तो खंडवा में अरुण यादव का विरोध निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा भैया कर रहे हैं, हालांकि कमलनाथ सरकार को वे समर्थन भी दे रहे हैं। कार्यकर्ताओं की नाराजगी से निपटने के लिए कमलनाथ के साथ ही विधानसभा चुनाव के दौरान असरदार भूमिका निभाने वाले और कांग्रेस की जीत के असली शिल्पकार रहे दिग्विजय सिंह के बीच चर्चा हुई और उसके बाद रुठों को मनाने का दौर-दौरा प्रारंभ हुआ। धार में गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी को मनाने के लिए दिग्विजय सिंह और अन्य नेताओं ने बात की। मुरैना और भिण्ड में रुठों को मनाने का काम सिंधिया कर रहे हैं तो मंडला, बैतूल और खरगोन आदि में कमलनाथ नाराज नेताओं को साधने में लगे हुए हैं। टिकट से वंचित या अन्य कारणों से नाराज लोगों को बाद में सरकार में एडजस्ट करने एवं विभिन्न निगम-मंडलों में पद देने का आश्‍वासन दिया जा रहा है। चूंकि प्रदेश में कांग्रेस सरकार है इसलिए उसके पास भविष्य में पद देने का आश्‍वासन देने का रामबाण नुस्खा मौजूद है। यह तो चुनाव नतीजों के बाद ही पता चल सकेगा कि किसके असंतुष्ट अधिक दमदार हैं और वे अपने किस-किस साथी को लोकसभा में जाने से रोक पाये। वैसे कुछ लोकसभा क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा को बसपा, सपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवारों से भी खतरा हो सकता है, क्योंकि ये जीत-हार के समीकरणों को तीन-चार सीटों पर प्रभावित करने की हैसियत रखते हैं। जहां तक गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का सवाल है उसके दो उम्मीदवारों ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर छिंदवाड़ा विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव में मुख्यमंत्री कमलनाथ और लोकसभा चुनाव में उनके बेटे नकुलनाथ की क्रमश: विधानसभा और लोकसभा पहुंचने की राह काफी आसान कर दी है।

और यह भी पिछले विधानसभा चुनाव व इससे पूर्व हुए लोकसभा के दो उपचुनावों में आदिवासियों के बीच कांग्रेस की पकड़ काफी मजबूत रही है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की चुनौती पर तो उसने इस पार्टी को कमजोर कर एक बड़ी सीमा तक सफलता पा ली है लेकिन जयस लोकसभा चुनाव में उसके लिए चुनौतियां खड़ी कर सकता है। जयस को संभालने में कांग्रेस सफल होती है या नहीं यह आने वाले कुछ दिनों साफ हो जायेगा। विधानसभा चुनाव में जयस ने कांग्रेस को समर्थन दिया था और उसके बड़े नेता डॉ. हीरालाल अलावा मनावर से कांग्रेस विधायक हैं। लोकसभा चुनाव में जयस को कांग्रेस ने धीरे से जोर का झटका दे दिया है और उसके सुझाए गए एक भी आदिवासी चेहरे को उसने अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। जयस इस चुनाव में अपनी भूमिका को लेकर सोमवार तक कोई निर्णायक फैसला कर सकती है और यदि वह चुनाव लड़ने का फैसला करती है तो फिर बैतूल, खरगोन, धार में वह कांग्रेस की राह में रोड़े अटकाने का काम करेगी, वही झाबुआ में कांतिलाल भूरिया को भी कुछ परेशानी में डाल सकती है। कांग्रेस को अभी एक बार फिर इन्हें साधने की कला में महारत साबित करना शेष है।

सुबह सबेरे से साभार

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