अपनों को छोड़ परायों पर भरोसा जताया कांग्रेस-भाजपा ने

‘घर का जोगी जोगना आन गाँव का सिद्ध’ की कहावत इन दिनों शहडोल लोकसभा क्षेत्र में सटीक बैठ रही है। अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित शहडोल लोकसभा सीट पर दिलचस्प चुनावी मुकाबला इस मायने में हो रहा कि कांग्रेस नेत्री रही हिमाद्री सिंह भाजपा प्रत्याशी के रूप में और भाजपा विधायक रहीं प्रमिला सिंह कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में हैं। इसका एक अर्थ यह भी है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों का अपनों की तुलना में परायों पर ज्यादा भरोसा है या दलबदल के खेल में यहां कोई किसी से कम नहीं है। ‘पंजा’ चुनाव चिन्ह पर लोकसभा का उपचुनाव लड़ने वाली हिमाद्री सिंह का चुनाव चिन्ह अब ‘कमल’ हो गया है तो ‘कमल’ के चुनाव चिन्ह पर विधायक बनने वाली प्रमिला सिंह अब ‘पंजा’ चुनाव चिन्ह पर मैदान में हैं, इसी कारण यहां की चुनावी तस्वीर दिलचस्प बन गयी है।

हिमाद्री सिंह की मां राजेश नंदिनी सिंह और पिता दलबीर सिंह कांग्रेस टिकट पर सांसद रह चुके हैं। दलबीर सिंह ने तो कई बार लोकसभा चुनाव जीता और केन्द्र की कांग्रेसी सरकार में राज्यमंत्री भी रहे। हिमाद्री सिंह ने 2016 का लोकसभा उपचुनाव कांग्रेस टिकट पर लड़ा और इन्हें भाजपा के ज्ञान सिंह ने 60 हजार 383 मतों के अन्तर से पराजित कर दिया। इनके पति भाजपा नेता हैं और वे भी भाजपा में चली गयीं तथा भाजपा ने ज्ञानसिंह के स्थान पर इन्हें अपना उम्मीदवार भी बना दिया, सांसद ज्ञानसिंह इसी बात से नाराज हैं और रुठकर कोपभवन में जा बैठे हैं। हिमाद्री सिंह की मां राजेश नंदिनी सिंह 2014 के लोकसभा चुनाव में 2 लाख 41 हजार 34 मतों के अन्तर से पराजित हुई थीं जबकि हिमाद्री ने इस अन्तर को उपचुनाव में काफी पाट दिया था। इनके भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस ने प्रमिला सिंह को अपना उम्मीदवार बना दिया जो भाजपा विधायक थीं, लेकिन टिकट कट जाने के कारण विधानसभा चुनाव से कुछ पूर्व कांग्रेस में आ गयी थीं।

दिलचस्पी का कारण यह है कि मौजूदा सांसद ज्ञानसिंह जो कि राजनीति का तीसरा कोण बने हुए हैं इनकी भूमिका क्या रहती है, ज्ञानसिंह की पीड़ा यह है कि जब वे चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे तब इन्हें लड़ाया गया और जब उपचुनाव जीतने के बाद इस बार वे लड़ना चाहते थे तो भाजपा ने इन्हें उम्मीदवार ही नहीं बनाया। हिमाद्री के मन में यह टीस थी कि कांग्रेस नेताओं की उदासीनता के कारण इनकी जीत की संभावनाएं खत्म हो गयी थीं और यह टीस अभी भी इनके मन में बनी हुई है। देखने की बात यही होगी कि ‘पंजा’ छोड़ ‘कमल’ थाम कर क्या लोकसभा में जाने की इनकी तमन्ना पूरी हो पाती है या नहीं। वैसे उपचुनाव और आमचुनाव के बीच हिमाद्री के जीवन में बदलाव भी आया और भाजपा नेता नरेंद्र मरावी से इनकी शादी हो गयी, इसी वजह से कांग्रेस का इन पर भरोसा डगमगाने लगा था। मुख्यमंत्री कमलनाथ चाहते थे कि वे पहले अपने पति मरावी को कांग्रेस में लायें लेकिन हुआ उल्टा, मरावी इन्हें भाजपा में ले जाने में सफल रहे। हिमाद्री ने दुविधा छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया, इनकी दुविधा संभवत: यह थी कि इनकी माता और पिताजी दोनों ही कांग्रेस के बड़े नेता थे।

ज्ञानसिंह ने पहले तो काफी बागी तेवर दिखाये लेकिन बाद में चुनाव मैदान में नहीं उतरे, यह जरुर कहा कि वे हिमाद्री के लिए प्रचार नहीं करेंगे। देखने की बात अब यही होगी कि लोकसभा चुनाव की पूरी जिम्मेदारी भाजपा ने प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के कंधे पर डाल दी है जिन्होंने चुनाव न लड़ने के लिए तो ज्ञानसिंह को मना लिया, लेकिन क्या अब इन्हें प्रचार करने को राजी कर पायेंगे। इस लोकसभा क्षेत्र में 21 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में और 79 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है। लगभग 45 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और दस प्रतिशत अनुसूचित जाति के मतदाता हैं, इन दोनों को मिलाकर यह आंकड़ा 55 प्रतिशत पहुंच जाता है। यदि यहां के मतदाताओं ने किसी हवा विशेष के साथ मन बना लिया होगा तो फिर आसानी से इसे रुख में बदलाव नहीं आयेगा। उपचुनाव के समय से ही आदिवासियों का झुकाव कांग्रेस की तरफ बढ़ा है और हाल के विधानसभा चुनाव के बाद चार कांग्रेस और चार भाजपा विधायक हैं।

आदिवासी मतदाताओं का झुकाव ही इस क्षेत्र में जीत-हार का फैसला करेगा। वैसे यहां चुनावी मुकाबला सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच ही हो रहा है, लेकिन चुनावी समर में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया, बहुजन समाजवादी पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में हैं। एक और घटनाक्रम तहत भाजपा के पूर्व विधायक छोटेलाल सरावगी ने भाजपा द्वारा सौंपे गए समस्त दायित्वों एवं प्राथमिक सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया है, इस क्षेत्र में भाजपा के लिए एक झटका मना जा रहा है।

सुबह सबेरे से साभार

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