अपेक्षाओं के ऊंचे पहाड़

लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक जीत के बाद राजनीतिक हलकों में खिंचे सन्नाटे में कई नए-पुराने सवाल गूंजने लगे हैं, जिनके उत्तरों की तलाश लंबे समय तक जारी रहेगी। जैसी कि परम्परा है, चुनाव में जीत-हार की परिस्थितियों का विश्लेषण करने के लिए समीक्षकों की जमात सक्रिय है और सत्तारोहण के मंगल-गान के लिए भाजपा का हर छोटा-बड़ा नेता तत्पर है। चुनाव में हार-जीत का अपना प्रोटोकॉल होता है, जिसके सहारे राजनीति और संवाद का सिलसिला आगे बढ़ता है। भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती ही यही है कि सभी दल लोगों के जनादेश को अक्षरश: स्वीकार करते हैं। लोकसभा के वर्तमान चुनाव में विपक्षी नेताओं ने जिस तरीके से इस हार को स्वीकार किया है, वह इसका उदाहरण है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में देश के करोड़ों मतदाताओं का भारी-भरकम और इकतरफा जनादेश भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नई इबारत जोड़ रहा है। आजादी के बाद से अभी तक पंद्रह नेता प्रधानमंत्री के नाते देश का नेतृत्व कर चुके हैं। इनमें पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी ही एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनके नेतृत्व में उनकी पार्टी लगातार दो चुनावों में बहुमत प्राप्त करके सत्तारूढ़ हुई है।

मोदी ने जिन परिस्थितियों में दोबारा सत्ता हासिल करने की जो सफलता हासिल की है, उसकी परिस्थितियां नेहरू अथवा इंदिराजी के काल-खंड से भिन्न हैं। आजादी के बाद पहले चुनाव 1951 में हुए थे। उस वक्त नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को 364 सीटें हासिल हुई थीं। नेहरू जब तक जिंदा रहे, कांग्रेस हमेशा दो-तिहाई सीटों पर जीतकर सरकार बनाती रही। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने 1967 में 283 सीटें जीती थीं। उसके बाद 1971 में इंदिराजी ने लोकसभा की 518 सीटों में से 352 सीटों पर जीत हासिल करके कांग्रेस की सरकार बनाई थी।

सातवें-आठवें दशक में सफलता के इसी दौर में कांग्रेस के कतिपय नेताओं ने इंदिराजी को आसमान पर बिठा दिया था। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकांत बरुआ इस मामले में सबसे अव्वल थे। बरुआ के मतानुसार ‘इंदिरा इज इंडिया’ अथवा ‘इंडिया इज इंदिरा’ एकरूप हो गए थे। राजनीतिक गलियारों में आज भी उनके इस कथन का उल्लेख चुटकुलों के रूप में होता रहता है।

वैसे सरकार और दरबार में स्तुति-गान कोई नई बात नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के पिछले कार्यकाल में चाटुकारिता का यह दिलचस्प अंदाज खूब चला था। एक दौर ऐसा था, जब साक्षी महाराज जैसे भाजपा नेताओं को मोदी में रब दिखने लगा था। साक्षी महाराज का कहना था कि कलयुग में असुरों का नाश करने के लिए मोदी का अवतार हुआ है। साक्षी महाराज के अलावा बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, उमा भारती सहित कई भाजपा नेता मोदी के गुणगान में ईश्वरीय उपमाओं का उपयोग कर चुके हैं। यह चुनाव मोदी का नया अवतार है। इस परिप्रेक्ष्य में भाजपा में साइकोफेंसी या चाटुकारिता का नया दौर फिर शुरू हो सकता है। वैसे इससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता, बशर्ते यह प्रक्रिया लोगों का दिमाग गरम नहीं करे।

इस मर्तबा मतदाताओं ने जिस तरीके से और जैसा समर्थन मोदी को दिया है, उसके राजनीतिक-निहितार्थ काफी गहरे और चुनौतीपूर्ण हैं। महाविजय के बाद भाजपा ने नरेंद्र मोदी को देश का महानायक घोषित कर दिया है। किसी भी देश में महानायक होने के अपने तकाजे और कसौटियां होती हैं। महाविजय की सफलताओं की तासीर और चुनौतियां बड़ी होती हैं।

मोदी को लोकसभा में करीब-करीब दो-तिहाई बहुमत मिला है। राज्यसभा में भी उनका समर्थन बढऩे वाला है। इस परिप्रेक्ष्य में मोदी-सरकार को अनिवार्य रूप से उन सभी वादों को पूरा करना होगा, जो उसने अपने चुनाव अभियान में आम जनता से किए हैं। लोकसभा में हासिल जीत के मद्देनजर मोदी-सरकार के सामने एजेंडे से विचलित होने की गुंजाइश नहीं बची है। अब मोदी को कोई भी जरूरी काम करने से रोकने की ताकत किसी भी पार्टी के पास नहीं बची है। चुनाव में भले ही हिंदुत्व अथवा राष्ट्रवाद जैसे अमूर्त मुद्दे हावी रहे हों, लेकिन जनता की अपेक्षाओं के कैनवास में राम-मंदिर का निर्माण, धारा 370, कॉमन सिविल कोड अथवा आतंकवाद जैसे सवाल रंग बिखेर रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी और खेती-किसानी की समस्याओं से उन्हें रूबरू होना पड़ेगा। देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती का एजेंडा भी उनकी जिम्मेदारियों में शुमार है।

चुनाव परिणामों के बाद मोदी ने ट्वीट किया था, जो उनके 2014 के चुनावी-नारे को नया विस्तार दे रहा है। 2014 में मोदी ने कहा था कि उनका लक्ष्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ है। 2019 में मोदी ने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के कैनवास में ‘सबका विश्वास’ भी जोड़ दिया है। चुनाव अभियान के दरम्यान मोदी का पुराना नारा नदारद था। क्योंकि मोदी ने नारे में विश्वास शब्द जोड़ा है, इसलिए हमें विश्वास करना चाहिए कि नए कैनवास में उनका नया नारा पहले की तरह गुम नहीं होगा। उमेश त्रिवेदी

 

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