अब नहीं चलेगी कश्मीरियत के नाम पर सियासत, J-K को 370 से ‘आजादी’ का एक साल

नई दिल्ली: सेल्फ रूल और ऑटोनामी… ये दो ऐसे पॉलिटिकल टर्म हैं, जिसके इर्द-गिर्द जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की दो बड़ी पार्टियां पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बरसों तक राजनीति की. दोनों का मकसद एक ही, कश्मीरियत. यानी, जम्मू-कश्मीर में बाहरी हस्तक्षेप कम से कम हो. लेकिन 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35 ए हटने के साथ ही इन दलों के सियासी समीकरण फेल हो गए.

मूड-मिजाज को देखते हुए दोनों ही दलों ने सेल्फ रूल और ऑटोनामी को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जो कभी इनके फ्लैग इश्यू हुआ करते थे. 370 की प्रबल समर्थक कांग्रेस इस मसले पर कोई स्टैंड लेती नहीं दिख रही. वहीं बीजेपी के लिए ये एक बड़ा मौका है. जम्मू-कश्मीर को 370 से ‘आजादी’ मिले आज एक साल पूरे हो गए हैं. एक बरस में जो बदलाव आए हैं, उससे यहां की सियासी पार्टियों के लिए आगे की राह बेहद चुनौतीपूर्ण हो गई है.

PDP कैडर को कोई स्पष्ट संदेश नहीं
जम्मू-कश्मीर सरकार में मीडिया सलाहकार रहे उमेश पंगोत्रा कहते हैं कि राज्य में इस समय जो परिस्थितियां हैं, उसको देखते हुए पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के सुर बदल गए हैं. राज्य में नई लीडरशिप उभरने के लिए ये माकूल समय है. रियासत की मुख्यधारा की पार्टियों में पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस की बात करें तो दोनों ही इस समय अपने कैडर को कोई स्पष्ट संदेश नहीं दे पा रहीं. 370 खत्म होने के बाद बदली परिस्थितियों में पार्टी का अब आगे क्या स्टैंड है, इस बारे में कोई साफ संदेश नहीं है. पीडीपी की बात करें तो पार्टी इस समय बुरे दौर से गुजर रही. पार्टी की मुखिया महबूबा मुफ्ती 5 अगस्त 2019 से ही नजरबंद हैं. कई पुराने नेता पार्टी से नाता तोड़ चुके हैं. बिखराव के दौर से गुजर रही पार्टी में फिलहाल कोई एक्टिविटी नहीं है.

370 पर पीडीपी का पुराना स्टैंड कायम!
सेल्फ रूल का राग अलापने वाली पीडीपी (Peoples Democratic Party) फिलहाल चुप्पी साधे हुए है. एक-एक कर तमाम नेताओं की नजरबंदी खत्म हो गई लेकिन केंद्र के खिलाफ मुखर रहीं महबूबा की नजरबंदी हाल ही में तीन महीने की और बढ़ाकर नवंबर तक कर दी गई है. नजरबंद महबूबा से संपर्क में रह रहीं उनकी बेटी इल्तिजा मुफ्ती 370 हटने के दिन यानी 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर के इतिहास का काला दिन बता रही हैं. पार्टी अभी भी 370 को वापस लाने की बात खुलकर तो नहीं कह रही, लेकिन मां के हवाले से इल्तिजा जो बयान दे रही हैं, उससे साफ लग रहा कि पीडीपी अभी भी अपने पुराने स्टैंड पर कायम है.

जमीन पर कोई हलचल नहीं
जम्मू-कश्मीर मामले के जानकार वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मिश्रा कहते हैं कि बीते एक साल में पीडीपी की ओर से जमीन पर भी कोई हलचल नहीं दिख रही है. 370 हटने के बाद लगा था कि पार्टी इसका खुलकर विरोध करेगी, लेकिन महबूबा के नजरबंद होने के बाद कैडर को कोई मैसेज भी कन्वे नहीं हुआ. पार्टी के दूसरे नेता भी लोगों के बीच नहीं जा पा रहे. इसके चलते कैडर भी छिन्न-भिन्न होता जा रहा. पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद की विरासत को सहेज पाने में महबूबा असफल ही दिखी हैं. मुफ्ती मोहम्मद के कई साथी उनकी बेटी के साथ तालमेल नहीं बैठा पाए और वे ‘किनारे’ होते चले गए.

पीडीपी में कम होती नेताओं की वफादारी
पीडीपी का कोई स्टैंड न होने के चलते नेताओं की वफादारी भी अब कम हो गई है. जम्मू संभाग की बात करें तो यहां के पीडीपी नेता अपनी सियासी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए दूसरी जगह तलाश रहे. जम्मू के सेंटिमेंट्स को जिंदा रखते हुए वे अपनी सियासत चमकाए रखने की कोशिश में लगे हैं.

370 हटते ही एक झटके में खत्म हुई PDP की सियासत!
पीडीपी की पूरी सियासत राज्य में सेल्फ रूल लागू कराने के इर्द-गिर्द रही है. साल 2008 में पार्टी ने ‘सेल्फ रूल फ्रेमवर्क फॉर रिजॉल्यूशन’ में साफ कहा था कि उनका मिशन है राज्य में सेल्फ रूल. दो ध्वज और एक अलग संविधान की मांग रखने वाली पीडीपी ‘अफ्स्पा’ को भी चरणबद्ध हटाने की मांग करती रही है. पीडीपी जम्मू-कश्मीर में केंद्र के दखल का जितना विरोध करती रही हैं, 370 हटने से एक झटके में वे सब खत्म कर दिया.

नियंत्रित बयान देने लगे फारूक और उमर
वहीं बात अब दूसरी मुख्यधारा की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस की करते हैं. एनसी की सियासत भी ऑटोनामी यानी राज्य को स्वायत्तता दिलाने की ही रही है. फारूक अब्दुल्ला और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला, दोनों ही अब ‘आजाद’ हैं. यानी उनकी नजरबंदी खत्म हो गई है. लेकिन बाहर आने के बाद से ही दोनों नियंत्रित बयान दे रहे हैं.

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