अब सस्ता होने के बजाय महंगा होता जाएगा कर्ज

नई दिल्ली: बीते सप्ताह देश के कई बैंकों ने कर्ज पर वसूले जाने वाले एमसीएलआर (उधारी दर) में 0.1 से 0.25 फीसदी तक का इजाफा कर दिया है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने एक साल के लिए एमसीएलआर में 20 आधार अंकों की बढ़ोतरी करके इसे 8.15 फीसदी कर दिया। इसके अलावा दो और तीन साल के कर्ज पर लगने वाले एमसीएलआर में भी क्रमश: 20 और 25 आधार अंकों की वृद्धि कर दी है। कुछ ऐसी ही वृद्धि पंजाब नैशनल बैंक, बैंक आफ बड़ौदा, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक जैसे अन्य बैंकों ने भी कर दी है। इससे बैंकों के सभी तरह के कर्ज पहले से महंगे हो जाएंगे।

बैंकों के इन फैसलों पर ज्यादातर जानकारों का कहना है कि कर्ज की लागत में हो रही वृद्धि के चलते फिलहाल अब कर्ज के सस्ता होने का दौर खत्म हो गया है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बीते छह महीनों में खुदरा महंगाई दर में लगातार तेजी आई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कच्चे तेल के महंगा होने के अलावा दूसरी कई वजहों से भी इस साल महंगाई और बढ़ सकती है। इसके अलावा बाजार से उगाहे जाने वाले धन की लागत भी लगातार बढ़ रही है। मालूम हो कि पिछले केवल छह महीने में सरकारी बॉन्डों के सहारे जुटाए जाने वाला धन 1.25 फीसदी महंगा हो गया है। जानकारों के मुताबिक ऐसे हालात में वह दिन ज्यादा दूर नहीं है जब आरबीआई रेपो और रिवर्स रेपो दरों में कमी लाने का सिलसिला छोड़कर इसे बढ़ाना शुरू कर दे।

आर्थिक मंदी से लगभग उबर चुके अमेरिका और यूरोप से लेकर दुनिया के अन्य देशों में पिछले कई महीनों से यह सिलसिला शुरू हो गया है। ऐसे में अनुमान है कि हमारे यहां भी इस साल जून या अगस्त तक ब्याज दरें बढ़ना शुरू हो जाएगी। जानकारों का कहना है कि अभी के हालात देखें तो अगली कई तिमाहियों तक खुदरा महंगाई के घटने के आसार नहीं लगते। कच्चे तेल की उच्च कीमत के अलावा महंगाई पर इस समय राजकोषीय घाटे के तय लक्ष्य से ज्यादा बने रहने का भी असर पड़ने की संभावना है। इसके अलावा इस साल के बजट में मोदी सरकार ने खरीफ फसलों की कीमत में करीब एक तिहाई की वृद्धि कर इसे लागत का 1.5 गुना करने की घोषणा की है। इसके अलावा सरकार ने पिछले साल जुलाई से केंद्रीय कर्मचारियों के भत्ते सातवें वेतन आयोग के अनुसार बढ़ाने की घोषणा की थी। इन सभी वजहों से बाजार में धन का प्रवाह और मांग दोनों के बढ़ने की संभावना है जो महंगाई बढ़ाने का कारण बन सकती है।

गौरतलब है कि आरबीआई ने वित्त वर्ष 2018-19 की शुरुआत (एक अप्रैल, 2018) से बैंकों द्वारा तय होने वाले बेस रेट की पुरानी प्रणाली को हमेशा के लिए खत्म करने का फैसला लिया है। इसके बजाय अब केवल और केवल एमसीएलआर पद्धति से ही सभी तरह के कर्जों की ब्याज दरें निर्धारित की जाएंगी। इससे रेपो दर के घटने या बढ़ने पर बैंकों के कोष की लागत निश्चित रूप से घट या बढ़ जाएगी। आरबीआई का मानना है कि ऐसा करने से बैंक यह बहाना बनाना छोड़ देंगे कि रेपो दर के बदलने पर भी कई दूसरी वजहों से उनके कोष की लागत पहले जैसी बनी हुई है।

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