अमित शाह जी! सब दिन होत न एक समाना

अखिलेश अखिल

सब दिन होत न एक समाना। इस लाइन को सबसे ज्यादा बीजेपी ही कहती रही है। लेकिन यही लाइन अब बीजेपी पर भारी पड़ रहा है। त्रिपुरा चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत देश को चौंका दिया था। लागढ़ में कमल। कोई मामूली बात नहीं। सालों से सत्ता पर काबिज माणिक सरकार की देखते देखते बेदखली हो गयी साथ ही वाम का यह राज्य भी समाप्त हो गया। निश्चित रूप से इस खेल के पीछे पीएम मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति रही।

त्रिपुरा जीत के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह अपने लाव लश्कर के साथ दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में पहुंचे थे। बड़ा भारी तामझाम दिखा था। पीएम मोदी भी पार्टी कार्यालय पहुंचकर कार्यकर्ताओं को सम्बोधित किया था। जीत के गुर बताये थे। लेकिन बुधवार को पार्टी कार्यालय में सन्नाटा पसरा था। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बिना किसी तामझाम के पार्टी मुख्यालय पहुंच गए। किसी को उनके पहुँचने का भनक तक नहीं हुआ। उनके चेहरे से हंसी भी गायब थी। माथे पर चिंता की लकीरें थी और कहने के लिए कोई खास बात नहीं। यूपी और बिहार उपचुनाव की जो तस्वीर सामने आयी है वह पार्टी को चिंतित किये हुए है। दो दशक से ज्यादा की वाम राजनीति को बीजेपी ने त्रिपुरा में जमींदोज किया था और अब दो दशक से ज्यादा की योगी की राजनीति को गोरखपुर में सपा ने ध्वस्त कर दिया। जानकार मान रहे हैं कि अगर इसे त्रिपुरा के चश्मे से देखें तो तो साफ़ हो जाता है कि सपा ने बीजेपी से बदला ले लिया।

यह बात और है कि यूपी उपचुनाव में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट के चुनाव हुए थे। लेकिन फूलपुर को लेकर कोई बड़ा उत्साह नहीं दिखता। वजह भी है। फूलपुर कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। नेहरू की राजनीति का केंद्र था यह। फिर सपा और बसपा ने भी इस सीट की राजनीति की और पिछले 2014 के चुनाव में यह सीट बीजेपी के पास चली गयी। अब फिर यही सीट सपा को आती दिख रही है। लेकिन गोरखपुर से सपा की जीत की संभावना बहुत कुछ कह रही है। यहां गोरखधाम पीठ की राजनीति चलती रही है। पिछले पांच चुनाव से योगी आदित्यनाथ इस सीट से जीतते रहे हैं। लेकिन अबकी बार गोरखपुर बीजेपी के हाथ से निकल गया। चुनावी परिणाम रुझानों के बाद गोरखपुर और फूलपुर में उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और अररिया (बिहार) में राष्ट्रीय जनता दल के प्रत्याशी ने बढ़त बना ली है ,अमित शाह की चिंता इसी को लेकर है। माना जा रहा है कि गोरखपुर और फूलपुर से बीजेपी की हार मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की करारी हार है।

बिहार में राजद के वरिष्ठ नेता तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद अररिया लोकसभा सीट खाली हो गई थी। महागठबंधन से नाता तोड़ कर एनडीए में शामिल होने के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए यह पहला चुनाव है। सीएम ने खुद इस क्षेत्र में बीजेपी प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार किया था। राजद की ओर से बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने लगातार चुनाव प्रचार अभियान चलाया था। लालू यादव के जेल में बंद होने से चुनाव प्रबंधन की पूरी जिम्मेदारी तेजस्वी पर ही आ गई थी। ऐसे में मुख्यमंत्री और पूर्व उपमुख्यमंत्री दोनों के लिए उपचुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गया था। यहां शुरुआत के कुछ राउंड में भाजपा प्रत्याशी आगे थे, लेकिन उसके बाद राजद के उम्मीदवार ने बढ़त बना ली है। खबर लिखे जाने तक लोक सभा की तीनो सीटों पर बीजेपी की हार होती दिख रही है जबकि सपा और राजद की राजनीति आगे बढ़ती दिख रही है।

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