अमृतसर रेल हादसे पर शिवसेना ने बोला हमला, बताया ये खून से सने ‘अच्छे दिन’

नई दिल्ली: केंद्र सरकार में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने अमृतसर रेल हादसे पर प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि ये हैं खून से सने अच्छे दिन। शिवसेना के मुखपत्र सामना में ‘रक्तरंजित अच्छे दिन’ शीर्षक के साथ प्रकाशित लेख में अमृतसर रेल हादसे को जलियांवाला बाग हत्याकांड से जोड़ा है। आलेख में लिखा गया है कि जलियांवाला बाग अंग्रेजी शासन में हुआ था, जबकि अमृतसर हत्याकांड स्वराज में हुआ है। आलेख में आगे कहा गया है कि आजादी मिलने के बाद भी चीटियों और कीड़े मकोड़ों की मौत मरना जनता की किस्मत बन गया है।

सामना में आगे लिखा है लोग खेत में मर रहे हैं, सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं में और रेल हादसों में मरना तो हमेशा की बात हो गई है। विकास और प्रगति की बात हम करते हैं, लेकिन रेलवे प्रणाली पूरी कबाड़ में चली गई है। सिग्नल प्रणाली, दरार पड़ी पटरियां, लड़खड़ाते टाइम टेबल के बावजूद सत्ताधारी ‘बुलेट ट्रेन’ के नाम पर डांडिया खेलते हैं, तो इस पर आश्चर्य होता है।

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शिवसेना ने आगे लिखा-कहीं कोई बड़ा रेलवे हादसा हो तो रेल मंत्री इस्तीफा देकर दूसरे विभाग में चला जाता है। यह परंपरा बन गई है। सुरेश प्रभु गए, उनके स्थान पर पीयूष गोयल आए, रेलवे की सेवा सुरक्षित और अनुशासित होगा, ऐसा कहा। मगर इसकी तुलना में कल कोहराम ठीक था, ऐसा कहने की नौबत आ गई है। सामना में आगे लिखा है अमृतसर दुर्घटना की न्यायालयीन जांच होगी, उससे क्या होगा? रामलीला रावण दहन का समारोह ही हादसे का कारण बना। रावण की भूमिका निभाने वाला कलाकार भी हादसे में मारा गया लेकिन उसने कई लोगों की जान बचाई। रावण की इस शहादत की तो कम से कम कुछ इज्जत करो।

अन्यथा अमृतसर, पटना और मुंबई की तरह दुर्घटनाएं होती रहेंगी। अमृसर की रेल पटरियों पर जो हुआ वो रक्तरंजित अच्छे दिन की करुण चीत्कार थी। उनके आंसू कैसे पोछोगे? नवजोत सिंह सिद्धू ने सवाल उठाए कि हमेशा धीमे चलने वाली ट्रेन, तेज रफ्तार से कैसे आई? इसे लड्डू ट्रेन कहा जाता है क्योंकि ये हमेशा 30 किलोमीटर की रफ्तार से चलती है लोग इसमें चलते चलते सवार हो जाते हैं। हमेशा 30 किलोमीटर प्रति घंटा वाली ट्रेन हादसे वाले दिन ट्रेन 110 किलोमीटर की रफ्तार से चल रही थी तो क्या इसके पीछे कोई खास वजह थी। हादसे से पहले 2 ट्रेनें उसी पटरी से गुजरीं। रेलवे फाटक के पास हादसा रोकने की जिम्मेदारी रेलवे की नहीं तो किसकी थी।

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