अर्थ-व्यवस्था में त्यागपत्र

अगस्त, 2017 से आर्थिक विशेषज्ञों के त्यागपत्र का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है। आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे के बाद सुरजीत भल्ला का इस्तीफा ऐसे समय आया, जब बीते 15 महीनों में आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल (10 दिसम्बर, 2018), मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम (जून 2018), नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढिय़ा (अगस्त, 2017) सरकार का साथ छोड़ चुके हैं। हर किसी ने निजी कारण बताए हैं। पर कहानी अलग है। उर्जित पटेल के इस्तीफे पर सरकार बगले झांक रही है।

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि इस्तीफा एक गंभीर चिंता का विषय है। पूरे देश को इसे लेकर चिंतित होना चाहिए। यह बात उन्होंने उर्जित पटेल का इस्तीफा होने पर कही। रघुराम राजन ने खुलकर कहा कि उर्जित पटेल ने इस्तीफा देकर विरोध दर्ज कराया है। एक सरकारी कर्मचारी का इस्तीफा देना विरोध का प्रतीक होता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह उर्जित पटेल के इस्तीफे को अर्थ-व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका मानते हैं। उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि उर्जित पटेल का इस्तीफा पीएम मोदी द्वारा देश की अर्थ-व्यवस्था की संस्थागत नींव को नष्ट करने के प्रयासों की वजह से न आया हो। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए किसी संस्थान के साथ इस तरह से कुछ करना पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण निर्णय होगा।

उर्जित पटेल आरबीआई के 24वें गवर्नर थे। उन्हें सितम्बर, 2016 में तीन वर्ष के लिए इस पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने रघुराम राजन की जगह ली थी। कार्यकाल समाप्ति के 9 महीने पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। पिछले कुछ समय से केंद्र की मोदी सरकार और उर्जित पटेल के बीच गतिरोध चल रहा था। दरअसल, इसके पीछे कारण यह था कि हाल में केंद्र सरकार की ओर से अब तक कभी नहीं इस्तेमाल की गई रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा-7 के तहत पहली बार आरबीआई को निर्देश दिए जाने और आरबीआई की कमाई में सरकार के हिस्से को लेकर नियम बनाने जैसे मामलों को लेकर विवाद चल रहा था। ऐसा माना जा रहा है कि केंद्र की ओर से रिजर्व बैंक पर दबाव डाला जा रहा है और बैंक स्वायत्तता को प्रभावित किया जा रहा है।

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