अलगाववादियों को किससे खतरा?

– रत्नाकर त्रिपाठी 

कम से कम मेरे लिए तो यह लाख टके का सवाल है। वह यह कि अलगाववादियों को आखिर किससे सुरक्षा चाहिए थी? उन्हें किससे खतरा था? पाकिस्तान से या आतंकवादियों से! पत्थरबाजों की उस भीड़ से, जो घाटी में सेना पर पथराव करती है या फिर वहां की आवाम के उस तबके से, जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से निलंबित किए गए छात्र बसीन हिलाल की तरह देश-विरोधी गतिविधियों को समर्थन दे रहा है! इनके अलावा घाटी में जो रहवासी बचते हैं, उनसे तो किसी को खतरा हो ही नहीं सकता। वे तो खुद ही हर सुबह अपनी जान की सलामती की दुआ करते हैं और अक्सर दिन ढलते-ढलते अपने परिवार या परिजनों में से किसी को आतंकवादी वारदात में खो देने की खबर उन तक पहुंच जाती है। ताकि उन्हें भयग्रस्त बनाए रहने का मिशन सफलतापूर्वक संचालित होता  रहे। सच कहें तो वोटबैंक की राजनीति में पगे भारत में अलगाववादियों के लिए किसी किस्म का खतरा रहा ही नहीं। लेकिन सरकारें हर साल उनकी हिफाजत के नाम पर दस करोड़ रुपए फूंकती चली गईं। क्योंकि गणित वोट का था, सरकारी पैसे की बर्बादी का नहीं। लेकिन पुलवामा कांड के बाद सुरक्षा वापस लेने का क्या कोई असर होगा? नहीं।

दुर्भाग्य से वैसा असर तो शायद ही हो पाए, जैसा यह देश देखना चाहता है। उसे कश्मीर में रहकर पाकिस्तान की हिमायत करने वालों के डर से पीले पड़े चेहरे देखने की चाहत है। मुल्क-विरोधी अघोषित सहोदरों के जिस्म और रूह पर कानून एवं व्यवस्था के डंडे से लगी चोट उभरती नजर आने की उसकी इच्छा है। यकीनन इसे आप प्रतिशोध का अतिरेक कह सकते हैं, लेकिन अतिरेक और कैसा-कैसा होता है, यह भी तो जान लीजिए। अतिरेक वह भी है, जिसमें घाटी में तैनात सेना के किसी जवान का सिर फोड़कर उसे मरने की हालत में पहुंचा दिया जाए। यह प्रक्रिया वह भी होती है, जिसके तहत निर्दोष लोगों का सरेराह नरसंहार करने वालों को ‘आजादी के लड़ाके’ कहकर महिमामंडित किया जाता है। इसके तहत ही होते हैं ऐसे घटनाक्रम, जिनमें तथाकथित मानवाधिकारवादी किसी आतंकी के मारे जाने पर तो सवाल उठाते हैं, लेकिन आतंकी वारदात में सुरक्षा बल के सदस्यों या बेकसूर नागरिकों की मौत पर उनके मुंह से उफ तक नहीं निकलती है। अतिरेक यह भी है कि सुरक्षा बल उन्मादी भीड़ के हाथों चुन-चुनकर मारे जाएं और बचाव की कार्रवाई में उनके द्वारा किए गए पैलेट गन के इस्तेमाल पर हायतौबा मचाई जानी लगे।

दरअसल, समस्या की जड़ उस अफीम की खेती में छिपी हुई है, जिसे कश्मीर की वादियों में ‘आजादी’ के नाम से बोया गया है। इसके पौधों के लिए पाकिस्तानी चश्मे से सूरज की रोशनी की खुराक दी जाती है। आतंकवादी संगठनों के झंडे लहराकर उनके लिए ताजी हवा का बंदोबस्त होता है। बेकसूरों का खून बहाकर उसे सींचा जाता है। ‘आतंकवादी’ शब्द में ‘गाजी’ का मिश्रण कर उसकी खाद का बंदोबस्त किया जाता है। फिर जो जहरीली फसल पनपती है, उसकी परिणति कभी उरी हमले, तो कभी पुलवामा में 44 जवानों की नृशंस हत्या के तौर पर होती है और होती रहेगी। क्योंकि इस अफीम के नशे में चूर होते ही हाथ में पत्थर आ जाते हैं। पांच-पांच सौ रुपए की दिहाड़ी पर सुरक्षा बलों को जख्मी करने का कुटीर उद्योग पनपता है। आतंकियों को बचाने के लिए सैनिकों की हत्या तक कर देने का जुनून पनप जाता है। अफीमचियों को कौन समझाए कि जो आजादी वे चाहते हैं, उसका नंगा रूप पाक अधिकृत कश्मीर में साफ देखा जा सकता है। वहां हर किस्म की स्वतंत्रता तिल-तिलकर मर रही है। एक बार उस क्षेत्र के हालात का साक्षात्कार करने के बाद शायद ऐसी सोच बदल सके, लेकिन नशा उतरे, तब ना। इससे भी बड़ी बात यह कि उसे उतरने दिया जाए, तब ना।

– वेब खबर डॉटकॉम से साभार

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