असामाजिक करता वर्क फ्रॉम होम, जानिये कैसे दूर हो रहे हम

लखनऊ  : कोरोना संकट हमें बहुत कुछ देकर जाने वाला है, इनमें से एक है ‘वर्क फ्रॉम होम’ कल्चर। यूं इसकी शुरूआत भारत में इस दशक के आरंभ में ही हो गई थी, लेकिन आम लोगों तक यह शब्द अब पहुंचा है। ‘वर्क फ्रॉम होम’ (डब्ल्यूएफएच) से तात्पर्य ‘घर से काम करना’ है। कोरोना प्रकोप के बाद पिछले माह भारत सरकार ने एडवायजरी जारी कर कारपोरेट जगत से कहा था कि वो ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के मद्देनजर यथासंभव कर्मचारियों को ‘वर्क फ्रॉम होम’ के लिए कहे।

तदनुसार देश की कई कंपनियों और संस्थानों ने इसे अपने यहां लागू भी कर दिया है। इसके ‘सकारात्मक’ अनुभव को देखते हुए कारपोरेट जगत में यह व्यवस्था स्थायी रूप से लागू करने पर विचार हो रहा है। माना जा रहा है कि तकनीकी तौर पर और उत्पादकता के लिहाज से यह नई कार्य संस्कृति लाभदायक है, लेकिन दूसरी तरफ यह सोशल डिस्टेंसिंग थ्योरी को उस मुकाम पर ले जा सकती है, जो मनुष्य के सामाजिक होने के मूल स्वभाव को ही खत्म कर देगी। दरअसल कोरोना ‘नरसंहार’ ही नहीं कर रहा है, वह सामाजिकता और मनुष्यता की परिभाषा बदलने पर भी आमादा है। यानी केवल खुद को बचाओ, खुद के बारे में सोचो। सबसे दूरी बनाओ। यही इसका सबसे डरावना और चिंताजनक पहलू है। हम इससे कैसे बचेंगे, हमें नहीं पता।

वैसे ‘वर्क फ्रॉम होम’ नया कनसेप्ट नहीं है। दुनिया में यह ‘टेलीकम्युटिंग’ अथवा ‘टेलीवर्किंग’ नाम से पहले से यह प्रचलित है। फर्क इतना है कि ‘टेलीकम्युटिंग’ तकनीकी-सा शब्द है और ‘वर्क फ्रॉम होम’ आम बोलचाल का। कुछ लोग इसे ‘वर्क एट होम’ भी कहते हैं। लैपटाप, स्मार्टफोन आदि हमारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा बनने के बाद यह शब्द ज्यादा प्रचलन में आया। आज दुनिया भर में करीब 3 करोड़ लोग ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि ‘मिलेनियल पीढ़ी’ अब गुजरे जमाने के ‘दस से पांच’ वाली कार्य संस्कृति में यकीन नहीं रखती। इसके अलावा महानगरों में आवास मिलने की कठिनाई, भयंकर ट्रैफिक और उसमें जाया होने वाला समय, कार्य स्थलों की घरों से बहुत दूरी, दफ्तर का तनाव, परिवार के लिए बहुत कम समय बचना आदि भी इसके कारण हैं, जिनकी वजह से युवा ‘वर्क फ्रॉम होम’ आप्ट कर रहे हैं।

फ़ायदे के तर्क : वर्क फ्रॉम होम’ के पक्ष में बड़ा तर्क यह है कि इससे प्रति व्यक्ति कार्यक्षमता और उत्पादकता बढ़ती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘वर्क फ्रॉम होम’ के तहत का काम करने वाला एक रिमोट एम्प्लायी (दूरस्थ कर्मचारी) एक ऑफिस एम्प्लायी के अनुपात में प्रति माह 1.4 दिन ज्यादा काम करता है। यानी साल भर में यह 17 दिन अतिरिक्त काम के बराबर होता है। इसका अर्थ यह है कि दूरस्थ कर्मचारी घर में ज्यादा कंफर्टेबल होकर काम कर सकता है। यानी आप बिस्तर पर, टीवी देखते हुए, बच्चों को दुलराते हुए भी वर्क फ्रॉम होम कर सकते हैं। कंपनियों को फायदा यह है कि चाहे‍ कितने कर्मचारी हों, उन्हें बड़े और महंगे कार्यालय लेने और उन्हें मेंटेन करने के खर्च से मुक्ति मिलेगी। कर्मचारियों को ट्रैवल अलाउंस और चाय-नाश्ते की व्यवस्था की जरूरत न होगी।

क्या हैं नुकसान
– लोगों की दूरी न केवल कार्यालय से होगी, बल्कि और ज्यादा आत्मकेन्द्रित और वर्च्युअल दुनिया के नागरिक बनते जाएंगे।
– ऑनलाइन शापिंग को ‘वर्क फ्रॉम होम’ और बढ़ाएगा।
– मनुष्य का मनुष्य पर से भरोसा डिग जाएगा।
– लोग शादी-समारोहों में जाने से या तो बचेंगे या फिर सहमे से हिस्सेदारी करेंगे।
– बच्चों का आपस में खेलना पहले-सा मासूम नहीं रह जाएगा।
– इस बदले सामाजिक सोच से ‘हाथों में हाथ डालकर’ चलने की वो पुरानी मान्यताएं और ‘संगठन में शक्ति’ जैसे नारे भी ध्वस्त हो सकते हैं।
– ज्यादा काम और मुनाफे के चक्कर में शोषण का एक नया अध्याय भी शुरू होगा, क्योंकि इस संस्कृति में काम करने के निश्चित नियम-कायदे अभी नहीं हैं।
– कुछ जगह तो ‘वर्क फ्रॉम होम’ का मतलब चौबीस घंटे की चाकरी से भी है।
– कार्यालय संस्कृति और अनुभवों को रूबरू साझा करने का कल्चर भी खत्म होगा।
– डर है कि कहीं लोग एक दूसरे की शक्लें तक न भूल जाएं।

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