अस्तित्व के संकट से जूझती मध्य प्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा

जबलपुर: नर्मदा नदी को मध्य प्रदेश की जीवन रेखा कहा जाता है। लेकिन अब इस नदी की धारा अमरकंटक से लेकर बड़वानी तक जगह-जगह खंडित हो गई है। कई जगह बालू के ऊंचे-ऊंचे टापू बन गए हैं, इसलिए यहां नर्मदा को पैदल ही पार किया जा सकता है। इस तरह की स्थिति होशंगाबाद और बड़वाह जैसी जगहों पर ज्यादा देखी जा रही है। जानकारों का कहना है कि इसकी एक वजह कम बारिश है, तो दूसरी वजह यह है कि नर्मदा के किनारे के इलाकों में भूजल का भारी दोहन हो रहा है, जिसकी वजह से नदी की धारा पर बुरा असर पड़ा है।

भूजल के दोहन की वजह से खंडित हो गई जलधारा

जब भूजल का दोहन ज्यादा होने लगता है, तो इसका स्तर गिर जाता है, जिससे धरती नदी का पानी सोख लेती है। कारण यही है कि जगह-जगह नदी की धारा खंडित हो गई है। जानकारों के मुताबिक नदी में जितना कम पानी इस समय है, उतना कभी नहीं रहा। उनका कहना है कि नदी की धारा अचानक नहीं टूटी है, बल्कि यह सिलसिला कई चालों से चला आ रहा है। जिस मात्रा में भूजल का दोहन बड़ा है, उसी मात्रा में नर्मदा की जलधारा भी क्षीण होती चली गई है। जानकारों का कहना है कि सरकार अगर नर्मदा को बचाना चाहती है तो उसे भूजल को रिचार्ज करने की योजना बनानी होगी, नर्मदा के करीबी इलाकों में भूजल के दोहन पर प्रतिबंध लगाना होगा। इसके अलावा नर्मदा के किनारे वनीकरण करने की भी जरुरत है।

अगर नर्मदा की दुर्दशा की विस्तार से बात करें तो महेश्वर में नर्मदा के बीचोंबीच चट्टानें निकल आई हैं। बड़वाह में नर्मदा इस प्रकार सूख गई हैं कि नदी को पैदल ही पार किया जा सकता है। जहां नेमावर में नर्मदा का पानी तलहटी में पहुंच गया है, वहीं होशंगाबाद में जगह-जगह टापू दिखने लगे हैं। नर्मदा की सबसे ज्यादा दुर्दशा जबलपुर में हुई है, जहां नदी की धारा बहुत पतली हो गई है।

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