आओ, रोज लगाएं सम्मान की तिलक

भारत सिंह

आज अंतराष्ट्रीय महिला दिवस है। दुनियाभर की महिलाएं देश, जात-पात, भाषा, राजनीतिक, सांस्कृतिक भेदभाव से परे एकजुट होकर इस दिन को मनाती हैं। सभी उस लीसिसट्राटा नामक महिला के साथ उन महिलाओं को सैल्यूट करती हैं, जिन्होंने प्राचीन ग्रीस में फ्रेंच क्रांति के दौरान युद्ध समाप्ति की मांग को लेकर आंदोलन किया था, ताकि युद्ध के कारण महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार को रोका जा सके। इस आंदोलन से अन्य देशों में जागरूक हुईं महिलाओं ने भी अपने-अपने मुल्कों में समान अधिकार आदि के लिए मोर्चे खोले और उन्हें फतह मिली। आखिरकार 191० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल द्बारा कोपेनहेगन में महिला दिवस की स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी महिलाओं के समान अधिकार को बढ़ावा और सुरक्षा देने के लिए विश्वभर में कुछ नीतियां, कार्यक्रम और मापदंड निर्धारित किए हैं।
अपना देश भी इस मायने में पीछे नहीं है। अपने यहां भी जोर-शोर से महिला दिवस मनाया जाता है। तमाम प्रकार के आयोजन जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न संगठनों व सरकारों द्वारा किये जाते हैं। हर तरफ से महिलाओं के सम्मान में आवाजें गूंजती हैं। तब ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में पुरुष-महिला में कोई भेदभाव नहीं है। सबको समान अधिकार सर्वत्र हासिल है। हालांकि सम्मान भरा यह शोर इस दिन के बाद साल भर बाद फिर इसी दिन ही सुनाई पड़ता है। इसीलिए सवाल यह है कि महिला दिवस की रस्म अदायगी भर क्यों? क्या महिलाएं साल में सिर्फ एक ही दिन के लिए ही सम्मान की, बराबरी की हकदार हैं? रोज महिलाओं को सम्मान देने में आखिर क्या दिक्कत है? उन्हें बराबर का दर्जा देने में वे कौन सी बाधाएं हैं, जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता है? इस दिवस को हम सब रोज की दिनचर्या में क्यों शामिल नहीं कर लेते? ऐसे सवाल इस दिन तमाम दिलों, संगठनों, राजनीतिक दलों में उठते तो हैं, लेकिन सबके सब अनुत्तरित रह जाते हैं। आखिर क्यों?
इन सवालों की तह में जाने पर जवाब के तौर पर पुरुष एकाधिकार की स्थिति ही सामने आती है। इस हकीकत से कोई मुंह भी नहीं फेर सकता। चाहे घर हों, परिवार हों, समाज हों, संगठन हों, कार्य क्षेत्र हों, राजनीतिक पार्टियां हों, सरकारें हों…सब में पुरुषों का ही वर्चस्व है। महिलाएं सर्वत्र सेकंडरी हैं। पहले तुम की पहल जहां कहीं दिखती भी है, वह भी देर तक नहीं ठहरती। रस्मी अदायगी से उबरना होगा। इससे उबरने का साहस, तो हर जगह करना होगा। अलबत्ता इसकी शुरुआत हम आप अपने घरों से कर सकते हैं। फिलहाल, गौर करें, पुरुष एकाधिकार के केन्द्ग घर भी हैं। मसलन, लोग अपने घरों में किसी भी काम के लिए अपनी मां, पत्नी, भाभी, बहन आदि को जब आवाज देते हैं, और सकारात्मक जवाब नहीं मिलता या फिर अनसुना कर दिया जाता है, तो वे बैचेन हो उठते हैं। आखिर यह बेचैनी क्यों? है ना, समस्या पुरुष प्रधानता की। इसे ही खत्म करना होगा। पुरुष-महिला में फर्क मिटाना होगा। उन्हें भी वैसा ही सम्मान देना होगा जैसा अपने लिए चाहते हैं। ऐसा करके देखिए, किसी को भी अपने बुलावे के जवाब में बेचैनी नहीं होगी। घरों से यह शुरुआत हो गई, तो आगे इसकी बेल परिवार, समाज, संगठन, कार्य क्षेत्र, राजनीतिक पार्टियों, सरकारों में भी बढ़ने लगेगी।
तो आइए, इस महिला दिवस पर हम आप अपने घरों से महिला-पुरुष में बराबरी के सम्मान की शुरुआत करते हैं। महज एक दिन नहीं, बल्कि इन्हें रोज सम्मान देंगे, का संकल्प लेते हैं। इनके अंदर अपने ही हाथों उगाई गयी इस प्रवृत्ति को खत्म कर देंगे कि वे सेकंडरी हैं। जो अपना है, वो उनका है और बराबर है। और हम आप ऐसा कर सके तो, तय मानिये फिर कोई महिला किसी आवाज को अनुसना नहीं करेगी। वह कहीं पर सतायी नहीं जाएगी। उसके साथ आये दिन जगह-जगह हो रहे आपराधिक कृत्य नहीं होंगे। आखिर में हर जगह खुशहाली ही खुशहाली।

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