आकार लेने के पहले ही बिखरते अरमान

मध्यप्रदेश में पिछले तीन दशकों से छोटे-छोटे दलों की आंखों में यह सपना तैरता रहा है कि वह राज्य में तीसरी शक्ति बने, लेकिन उनके अरमानों पर हमेशा चुनाव नतीजों ने पानी फेर दिया है। बसपा सुप्रीमो मायावती की आंखों में लम्बे समय से यह सपना रहा है कि मध्यप्रदेश में सत्ता की चाबी उनकी मुट्ठी में बंद हो जाये लेकिन उनकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हुई। इस चुनाव में वे पूरी ताकत से लड़ रही हैं और उनका मकसद सत्ता की चाबी अपनी मुट्ठी में बंद करना है। 2003 में समाजवादी पार्टी ने भी उभार मारा था और उसके सात विधायक विजयी हुए। बाद में उपचुनाव में उसने भाजपा से एक सीट छीन ली, लेकिन वह भी बाद के चुनावों में काफी के प्याले में उठे तूफान से अधिक नहीं बन पाया, क्योंकि उसके बाद हुए चुनावों में उसकी सदस्य संख्या आठ से घटकर एक और बाद में शून्य हो गयी। यह तो स्थापित राजनीतिक दल हैं लेकिन चुनाव के समय बनने वाले छोटे-मोटे राजनीतिक दलों के अरमान कहीं अधिक हैं और उन्हें लग रहा है कि वे कांग्रेस व भाजपा का खेल बिगाड़ देंगे। आम आदमी पार्टी प्रदेश में तीसरी ताकत बनने की कोशिश कर रही है लेकिन पिछले तीन सालों में उससे भी कई लोग जुड़े परन्तु धीरे-धीरे उन्होनें किनारा कर लिया। कुछ ने मध्यप्रदेश विचार मंच बना लिया, तो कुछ लोग सपाक्स में चले गये और इक्का-दुक्का लोगों ने भाजपा में अपनी जगह तलाश ली। आदिवासियों में पैठ जमाने वाले जयस और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून को कड़ा करने तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए जो विधेयक संसद ने पारित किया उसके बाद से अनायास ही सपाक्स आंदोलन ने गति पकड़ी। इन दोनों को लगा कि अब प्रदेश की राजनीति उनकी गिरफ्त में आ जाएगी। इस कारण कुछ समय के लिए कांग्रेस एवं भाजपा में भी चिन्ता की रेखायें देखी गयी थीं। सपाक्स के हीरालाल त्रिवेदी और जयस के अध्यक्ष डॉ. हीरालाल अलावा पूरे जोश-खरोश से मैदान में कूद पड़े, लेकिन सपाक्स दो-फाड़ हो गयी और अलावा ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया तथा मनावर से टिकिट हासिल कर ली, इसलिए जयस भी दो-फाड़ हो गया। इस प्रकार आकार लेने के पहले ही छोटे-छोटे दलों के अरमान बिखरते नजर आ रहे हैं।

जहां तक जयस का सवाल है उसका सपना भी वैसे ही चकनाचूर हुआ जैसे गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का हुआ था। आदिवासियों के अधिकारों को लेकर बनी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी को 2003 के विधानसभा चुनाव में तीन सीटें मिल गयी थीं लेकिन यह दल भी पहले दो और बाद में तीन धड़ों में बंट गया तथा उसके बाद एक भी सीट नहीं जीत पाया। इस बार फिर वह एकजुट होकर चुनाव लड़ रही है, लेकिन जयस के बिखराव ने उसके अरमानों को असमय ही ठंडा कर दिया है क्योंकि जयस के प्रभावशाली धड़े ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया है। 2003 में भाजपा की चमकदार जीत का श्रेय लेने वाली उमा भारती ने जब भाजपा से अलग होकर भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई तो वे भी तीसरी ताकत नहीं बन पाईं और पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा जबकि उनसे अधिक सीटें तो मायावती को मिली थीं। चुनाव के समय मौसमी दलों का उदय होना, बड़े-बड़े सपने देखना और फिर उनका बिखरना उनकी नियति बन चुका है। अब देखने की बात यही होगी कि इस बार उनके अरमान आकार लेते पाते हैं या नहीं, या फिर अरमान आंसू बनकर बह जाते हैं।

सुबह सबेरे से साभार

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