आखिर सन्नाटा क्यों पसरा है, कहीं से तो जवाब आये

भारत सिंह


विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया द्वारा यह कहा जाना कि उनके एनकाउंटर की साजिश थी, हर कोई स्तब्ध है। स्तब्धता की वजह इसलिए है, क्योंकि इस बाबत तोगड़िया के डरावने बोल के अलावा चौतरफा सन्नाटा है। संघ हो, भाजपा हो, राम मंदिर आंदोलन में तोगड़िया के साथी हों, केन्द्ग व गुजरात की सरकार हो या फिर गुजरात का पुलिस प्रशासन हो, सबके सब पूरी तरह से खामोश हैं। यह खामोशी हर हाल में टूट जानी चाहिए, क्योंकि तोगड़िया खुलेआम कह रहे हैं कि दिल्ली के इशारे पर गुजरात क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट सीपी जेके भट्ट ने उनके खिलाफ साजिश रची थी। वह भट्ट के कॉल रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं ताकि यह साफ हो सके कि भट्ट प्रधानमंत्री के सम्पर्क में थे या नहीं?

अति गंभीर मसले पर पड़ी खामोशी की परत न हटने के कारण इस मसले से जुड़े अन्य सवाल भी अनुत्तरित हैं। जैसे, क्या जेड श्रेणी सुरक्षा के घेरे में रहते हुए भी व्यक्ति लापता हो सकता है? यदि लापता हो सकता है, तो अभेद्य कहे जाने वाले इस सुरक्षा घेरे का और विकल्प खोजना पड़ेगा, क्योंकि तोगड़िया प्रकरण में यह सुरक्षा कवच चिंदी-चिंदी हो चुका है। हैरत की बात, तो यह है कि जेड श्रेणी की सुरक्षा में 24 घंटे रहने वाले वीवीआईपी जेड कवच में छेद हो जाने के बावजूद भी चुप हैं। कम से कम, इस व्यवस्था के दारोमदार को, तो जवाब तलब करना ही चाहिए था कि तोगड़िया उनके घेरे से कैसे निकल गये? फिलहाल इस मायने में भी सन्नाटा पसरा है।

गुजरात के ज्वाइंट सीपी जेके भट्ट पर साजिश रचने का आरोप

वर्षों की बात नहीं, हाल में बीते पिछले साल दिसम्बर में प्रधानमंत्री नरेंद्ग मोदी एक कार्यक्रम में शिरकत करने नोएडा आये थे। उनके काफिले के गुजरने वाले रूट में पुलिस की ओर से लापरवाही हो गई थी। इस पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल संज्ञान लिया था। लापरवाही जिन दो पुलिस वालों ने की थी, उन्हें निलम्बित करने में देरी नहीं की गई थी। तोगड़िया प्रकरण में, तो जेड श्रेणी की सुरक्षा-व्यवस्था में गंभीर खामी सामने आने के बावजूद कोई कार्रवाई करने की बात, तो दूर पूछताछ तक भी नहीं की गई कि आखिर जब इस घेरे में परिंदा तक पर नहीं मार सकता, तो इसमें इतनी बड़ी खामी कैसी आई?

जवाब तो यह सवाल भी मांग रहा है कि बेहोशी की हालत में अस्पताल में पहुंचाये गये तोगड़िया की खबर आ जाने के बाद भी संघ और भाजपा की तरफ से उनका कुशलक्षेम जानने की कोशिश क्यों नहीं की गई? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि विहिप तो संघ का ही अंग है और भाजपा उसकी राजनीतिक विंग मानी जाती है। तीनों एक दूसरे से गुंथे हैं। संघ और भाजपा का तोगड़िया से दूरी बना लेना, तोगड़िया के मुंह खोलने के बाद, तो समझा जा सकता है, पर उनके बोलने के पहले उनसे दूरी नहीं होनी चाहिए थी। बेशक, दिसम्बर में तोगड़िया और संघ में विहिप के शीर्ष पद पर चुनाव को लेकर मतैक्यता में दरार उभरी थी, फिर भी ऐसे हालात में पड़े-फंसे तोगड़िया से दूरी बनाना वाजिब नहीं दिखता, क्योंकि विहिप ने अपने आंदोलनों-अभियानों के जरिए संघ के विस्तार में अहम भूमिका निभाई है।

तोगड़िया को लगता है भट्ट यह कदम उठा रहे हैं दिल्ली के इशारे पर

कहा जाता है कि गुजरात चुनाव के दौरान तोगड़िया और भाजपा में भी दूरियां बन गई थीं। दूरी बन जाने की वजह यह थी कि तोगड़िया द्वारा चुनाव के दौरान ऐसे मसले उठाना, जो भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्ग मोदी और अमित शाह को चुनाव हार जाने पर नीचा दिखा सकते थे। ऐसे हालात पैदा करने वाले शख्स से कोई भी दूरी बना लेगा, लेकिन मौजूदा प्रकरण में भट्ट के बहाने सीधे-सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधने का मसला, चुनाव के दौर से कहीं ज्यादा बड़ा है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिए।

सवालों के गुच्छे में लटके इस प्रकरण में एक सवाल यह भी कि जब 2014 में राजस्थान की भाजपा सरकार ने तोगड़िया से सम्बंधित केस को ही वापस ले लिया था, तो तोगड़िया के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी कैसे हो गया? खबरों में कहा यह जा रहा है कि राजस्थान सरकार के इस कदम की जानकारी न, तो राजस्थान पुलिस को थी और न ही कोर्ट को। अजीब बात है। फिलहाल ऐसी हालत में समझा जा सकता है कि जब ऐसे हालात, भाजपा शासित राज्यों में होंगे, तो भाजपा द्वारा बहु प्रचारित सुशासन देने वाली सरकार के दावे का जनता के बीच क्या हश्र होगा, कुछ भी कहने की जरूरत नहीं।

और अब तोगड़िया पर गौर करें। तोगड़िया के खिलाफ जिस केस के सिलसिले में गैर जमानती वारंट जारी किया गया था, वह राजस्थान में सवाई माधोपुर जिले के गंगानगर सिटी से जुड़ा है। 25 मार्च, 2002 को ताजिया निकालने के विवाद में दंगा हो गया था। दंगाइयों को नियंत्रित करने के लिए की गई पुलिस फायरिंग में तीन लोगों की मौत हो गई थी। इन्हीं मृतकों को श्रद्धांजलि देने के लिए 4 अप्रैल, 2002 को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। हिंदुओं के फायर ब्रांड नेता तोगड़िया उसमें आमंत्रित थे। तोगड़िया की मौजूदगी से हालात कहीं और नाजुक न हो जाएं, इस मद्देनजर तोगड़िया को श्रद्धांजलि सभा में जाने से रोकने के लिए गंगानगर सिटी में धारा 144 लागू कर दी गई थी। तोगड़िया ने प्रतिबंध का उल्लंघन किया और श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित किया। यही नहीं उन्होंने मृतकों के परिजनों से भी मुलाकात की थी।

श्रद्धांजलि सभा हो जाने के बाद पुलिस ने तोगड़िया और अन्य 16 के खिलाफ धारा 188 के तहत केस दर्ज किया था। कोर्ट में मामला पहुंच गया। जूडिशियल कोर्ट ने अगस्त से अक्टूबर 2017 के बीच तोगड़िया को पांच समन जारी किये। तोगड़िया, फिर भी नहीं पहुंचे। फिर कोर्ट ने उसी साल नबम्बर में दो जमानती वारंट जारी किये। फिर भी तोगड़िया नहीं पहुंचे। हालांकि 16 अन्य ने जमानत करा ली थी। कोर्ट ने फिर साल के आखिर में दिसम्बर में तोगड़िया के विरुद्ध दो गैर जमानती वारंट जारी किये। तोगड़िया ने इनकी भी अनदेखी की। लिहाजा कोर्ट ने 8 जनवरी, 2018 को फिर से गैर जमानती वारंट जारी किया। इसी सिलसिले में राजस्थान पुलिस वारंट को तामील कराने के लिए तोगड़िया के गुजरात स्थित निवास पर गई थी।

इस बाबत न संघ बोल रहा,न ही भाजपा, पुलिस प्रशासन भी है चुप

राजस्थान पुलिस वहां 15 जनवरी को पहुंची, लेकिन तोगड़िया नहीं मिले। खबरें आयीं कि तोगड़िया लापता हो गये हैं। फिर पता चला कि वह बेहोशी की हालत में एक व्यक्ति को एक पार्क में मिले। एम्बुलेंस बुलाकर उन्हें एक हॉस्पिटल पहुंचाया गया। अगले दिन तोगड़िया मीडिया से मुखातिब हुए। मीडिया में अपने एनकाउंटर करने की साजिश का खुलासा किया। सवाल यहां भी उभरता है कि इससे पहले तोगड़िया ने खुद की जान पर मंडराते खतरे को लेकर कभी भी एक शब्द नहीं कहा था। और अचानक, इस बाबत गहरे सवाल खड़े किये, तो देशवासी स्तब्ध हो गये। कई बातें मीडिया में आने लगीं, जिनके केन्द्ग में एक खबर यह थी कि कहीं तोगड़िया एनकाउंटर की साजिश के बहाने दबाव की राजनीति तो नहीं कर रहे। आखिरी उन्हें दबाव की राजनीति की जरूरत, क्यों पड़ी?

इस सवाल के सीधे तार 29 दिसम्बर, 2017 वाली घटना से जोड़े जाने लगे। उस तारीख को हुआ यह था कि ओडिशा के भुवनेश्वर में विहिप की तीन दिवसीय केन्द्गीय प्रन्यासी मंडल एवं प्रबंध समिति अधिवेशन की लास्ट बैठक थी। इसमें तोगड़िया को पदमुक्त कर उनकी जगह हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल जस्टिस कोगजे को बिठाना था। संघ की इस कोशिश को तोगड़िया ने अपने समर्थकों द्वारा हंगामा कराकर नाकाम कर दिया था। उनके समर्थकों के हंगामे के मद्देनजर वहां मौजूद रहे संघ के सरकार्यवाह भैया जी जोशी को हस्तक्षेप करना पड़ा था। वह हस्तक्षेप न करते, तो चुनाव की आ गई नौबत टाली नहीं जा सकती थी। चुनाव कराने की स्थिति में संघ को प्रत्यक्ष तौर पर हार देखनी पड़ सकती थी। यह संघ के लिए अच्छा नहीं होता। अतएव भैया जी जोशी ने तोगड़िया को ही उनके पद पर बरकरार रखने पर रजामंदी दे दी।

रही बात, इस परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री के नाम आने की, तो कहा जाता है कि प्रधानमंत्री जस्टिस कोगजे को पसंद करते हैं। कोगजे पदारूढ़ होते, तो 2019 के आम चुनाव में उनकी तरफ से मुश्किलें न आतीं। तोगड़िया के रहते आम चुनाव में बाधा खड़ी हो सकती थी, क्योंकि तोगड़िया जिस तरह के मुद्दे उठाते हैं, वे केन्द्ग सरकार को मुश्किल में डालने वाले होते हैं। तोगड़िया का फोकस आम तौर पर राम मंदिर, कश्मीर से सम्बंधित धारा 3700 गौ हत्या पाबंदी और किसानों से जुड़ा होता है। मोदी सरकार के सत्ता में आने से पूर्व ही भाजपा ने अपने चुनावी अभियान को वस्तुत: सबके विकास पर केन्द्गित किया हुआ है। ऐसी स्थिति में तोगड़िया के बोल भाजपा के लिए संकट बनते हैं।

बहरहाल, तोगड़िया के बारे में चर्चा यह भी है कि बेशक वह अपने पद पर बरकरार रहने में सफल हो गये हैं, लेकिन संघ को मात देने की वजह से संघ द्वारा वह उपेक्षित कर दिये गये हैं। फिर से पहले जैसी पूछ-परख की स्थिति पाने के लिए वह बेचैन माने जा रहे हैं। उनके द्वारा कही गईं बातें, इसी लिए दबाव के तौर पर मानी जा रही हैं। हकीकत, जो भी हो, तोगड़िया के हालिया बोल पर किसी भी स्तर पर चुप्पी साधे रहने में शुभ संकेत नहीं दिख रहे।

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