आखिर सूर्योदय और सूर्यास्त समय सूरज लाल क्यों दिखाई देता है, बेदह दिलचस्प है प्राकृति का यह नियम

मुंबई: दुनिया में कई जगह देखने और घुमने के बहुत ही पोपुलर है | कुछ जगह समुन्द्र भी है भारत में भी कई एतिहासिक इमारते व जगह है, अगर हम यहाँ रोज घुमने आने वाले लोगों की बात करें तो लगभग 1 लाख से भी ज्यादा लोग हर रोज एसे स्थानों पर आते रहते हैं | एसे ही कुछ स्थानों और समुन्द्र तट पर ढलते समय सूरज लाल रंग का नजर आता है और यह रंग लोगों को आकर्षित करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर यह सूरज ढलते समय हमें लाल क्यों दिखाई देता है, असल में इसके पीछे पूरी तरह वैज्ञानिक कारण हैं। इसका जवाब रेली स्कैटरिंग (प्रकाश का प्रकीर्णन) में छुपा है।

19वीं सदी में ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी लॉर्ड रेली प्रकाश के प्रकीर्णन की घटना की व्याख्या करने वाले पहले व्यक्ति थे। प्रकाश का प्रकीर्णन वह प्रक्रिया होती है, जिसमें जब सूर्य का प्रकाश सूर्य से बाहर निकलकर वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो धूल और मिट्टी के कणों से टकराकर चारों तरफ फैल जाता है।

इस खूबसूरत दृश्य के बीच सूरज को सीधे आंखों से ना देखें और ना ही इसके लिए दूरबीन का इस्तेमाल करें। इससे आपकी आंखों को नुकसान पहुंच सकता है या आप अंधे हो सकते हैं। रॉयल म्यूजियम्स ग्रीनिच में खगोल विज्ञानी एडवर्डी ब्लूमर कहते हैं, “सूर्य के प्रकाश के प्रकाशीय गुण पृथ्वी के वातावरण से होकर गुजरते हैं।” सबसे पहले हमें प्रकाश को समझने की जरूरत है, जो दृश्यमान प्रकाश स्पेक्ट्रम के सभी रंगों यानी लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, गहरा नीला और बैंगनी से बना है।

”ये सूरज की रोशनी के बिखरने से जुड़ा है। लेकिन, ये समान रूप से बिखरी हुई नहीं होती।” हर रंग की अपनी वेवलेंथ होती है, जो उस रंग को वैसे ही दिखाता है, जिस रंग का वो है। उदाहरण के लिए बैंगनी रंग की सबसे छोटी वेवलेंथ होती है जबकि लाल रंग की सबसे लंबी। अब जानते हैं कि वातावरण क्या होता है। विभिन्न गैसों की वो परतें, जो हमारे ग्रह में फैली हुई हैं और जो हमें जिंदा रखती हैं। इसमें ऑक्सीजन भी शामिल है,जिससे हम सांस ले पाते हैं।

जैसे-जैसे सूरज की रोशनी अलग-अलग हवा की परतों से गुजरती है, इन परतों में अलग-अलग घनत्व की गैसें होती हैं। इनसे गुजरते हुए रोशनी दिशा बदलती है और बंट भी जाती है। वातावरण में कुछ कण भी होते हैं, जो विभाजित रोशनी में उछाल लाते हैं या उसे प्रतिबिंबित करते हैं। जब सूरज डूबता या उगता है, इसकी किरणें वातावरण की सबसे ऊपर की परत से एक निश्चित कोण से टकराती हैं और यहीं पर ये ‘जादू’ शुरू होता है। जब सूरज की किरणें इस ऊपरी परत से होकर गुजरती हैं, तो नीली वेवलेंथ बंट जाती है और अवशोषित होने की वजह से प्रतिबिंबित होने लगती है।

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