आपातकाल की मध्यप्रदेश स्तरीय पुनरावृत्ति

दिवंगत दुष्यंत कुमार और श्रीलाल शुक्ल आज जीवित होते तो कुछ तब्दीली कर अपनी पुरानी बात नए सिरे से कहते। मध्यप्रदेश के संदर्भ में। दुष्यंत ने पहले लिखा था, “तेरा निजाम है, सिल दे जुबान शायर की।” अब वह लिख सकते थे, “तेरा निजाम है, सिल दे जुबान आवाम की।” श्रीलाल शुक्ल ने “राग दरबारी” के आगे “राग अहंकारी” लिखा होता। उसमें लंगड़ एक नहीं अनेक होते। वह केवल भटकते नहीं, बल्कि दर-दर पिटते। गरियाये जाते। जुतियाये जाते। क्योंकि ऐसा मध्यप्रदेश में हो रहा है।

नरसिंहपुर में एक बुजुर्ग चार दिन तक हवालात में डाल दिया जाता है। कसूर केवल यह कि उसने कलेक्टर महोदय के सामने अपनी समस्या रख दी। अपना हक मांग लिया। अपने गांव के लिए एक अच्छी सड़क की उम्मीद कर ली। बुजुर्ग वार भी कोई ऐसे वैसे नहीं, मित्र पत्रकार ब्रजेश राजपूत ने अपने टीवी चैनल एबीपी न्यूज के घंटी बजाओ कार्यक्रम में इस घटना का हवाला देते हुए बताया था कि बुजुर्ग सज्जन रेलवे के रिटायर्ड इंजीनियर हैं। कलेक्टर ने उन पर शराब पीकर हल्ला मचाने का आरोप जड़ा है।

बुजुर्गवार का कहना है कि उनके खानदान में ही किसी ने शराब को छुआ नहीं है। छुआ भी होता तो क्या होता? पुलिस ने धारा 151 में उन्हें गिरफ्तार किया था और इसकी जमानत थाने से ही देने के प्रावधान हैं। कलेक्टर ने चार दिन उनकी जमानत नहीं होने दी। ये एक अकेली घटना नहीं है। छिंदवाड़ा में महिला किसी अफसर से अपनी बात कहने के चलते बदसलूकी की शिकार हो गई। खरगौन में जन समस्याएं बताने वाले दो युवकों को तत्कालीन कलेक्टर ने जब हड़का दिया तो उन्हें पुलिसिया कहर का सामना करना पड़ा। इधर राज्य का मुख्यमंत्री यात्रा निकालकर आशीर्वाद मांग रहा है और उधर अपना हक मांगने वालों को आपातकाल जैसे दुर्दिनों का सामना करना पड़ रहा है।

जुमलेबाजी की बात करें तो आज के समय शिवराज सिंह चौहान को नरेंद्र मोदी से एकाध कदम ही पीछे रखा जा सकता है। चौहान गलत काम करने वाले अफसरों को उलटा करने की गीदड़भभकी देकर ही रह गए और गलत करने पर आमादा उनके अफसरान लोकतंत्र को खूंटी पर टांगने पर आमादा हैं। सीधी सी बात है कि प्रदेश की नौकरशाही बेलगाम है और कमजोर शासन तंत्र के चलते हर ओर हावी हो चुकी है। यह मध्यप्रदेश का सौभाग्य है या दुर्भाग्य कि उसने एक ही मुख्यमंत्री को तीसरी बार चुना लेकिन पहले दिन से जो आशंकाएं थी, वो 13 साल बाद भी जस की तस कायम ही नहीं बल्कि हकीकत में बदल हुई हैं।

शिवराज की प्रशासिनक क्षमता पर पहले दिन से सवाल थे। 13 साल में तो आखिर राजनीतिक स्थिरता का कीर्तिमान रच चुके नेता को एक बेहतर प्रशासक बन ही जाना था। लेकिन शिवराज में ऐसा हो न सका और “न हो पाएगा,” कहने में भी किसी को शायद ही आपत्ति होना चाहिए। शिवराज संवेदनशील हैं, जनता को भगवान मानते हैं, इस प्रदेश को मंदिर और खुद को पुजारी। पुजारी का प्रशासन मंदिर की व्यवस्थाओं का सत्यानाश करने को सिर माथे खड़ा है। पुजारी भगवानों को रोज जोर शोर से सपने बेचने में लगा है। मामला, देख तेरे इंसान की हालात से बदलकर “देख तेरे भगवान की हालत” वाला हो गया है।

आपातकाल में भी तो ऐसा ही कुछ होता रहा था। अंतर केवल इतना कि उसकी भयावहता का स्तर मध्यप्रदेश के मुकाबले कुछ अधिक था। गनीमत है कि इस अघोषित आपातकाल की पहल शिवराज के स्तर पर नहीं हुई, वरना तो अब तक प्रदेश की आवाम की आवाज को सामूहिक रूप से घोटने का अनाचार आम बात हो चुकी होती। इंदिरा गांधी के समय लोगों की जबरिया नसबंदी की गई थी और आज राज्य में लोकतंत्र के बुनियादी स्वरूप का गर्भपात ही करा दिया गया होता। जबरिया। वैसे अफसरों की तैयारियां तो इसी दिशा में दिख रही हैं। वो तब, जब शिवराज सरकार को अगले कुछ ही महीनों में एक नया जनादेश हासिल करने से दो चार होना है। क्या जबरदस्त भरोसा है, क्या अतिआत्मविश्वास है, या शायद इसी नौकरशाही से उम्मीद है ऐसे ही कुछ कर दिखाने की।

खैर, जिस निरंकुश नौकरशाही के सामने खुद सरकार के कई मंत्री और जनप्रतिनिधि बेबस हों, उस नौकरशाही से जनता क्या कर निजात पा सकती है? हो सकता है कि चुनाव के समय वह शिवराज को भी दिग्विजय सिंह जैसा सबक सिखा दे। हो सकता है, इसलिए क्योंकि प्रदेश में विपक्ष के नाम पर फिलहाल भयानक कमजोर कड़ी मौजूद है। यदि कांग्रेस सशक्त होती तो नरसिंहपुर का घटनाक्रम होने से पहले ही प्रदेश में अफसरों के खिलाफ व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता था। यही शिवराज की किस्मत है और अफसरों की अकड़ बनाए रखने तथा उसे सतत रूप से बढ़ाने के र्इंधन का स्रोत।

मध्यप्रदेश के वर्तमान विधानसभा भवन से जुड़ा वाकया है। तब दिग्विजय सिंह की सरकार थी। मुख्य विरोधी दल भाजपा को भवन के नाम से आपत्ति थी। उनका कहना था कि इंदिरा गांधी का नाम उन्हें आपातकाल के काले दिनों की याद दिलाता है। बात नहीं सुनी गई तो भाजपा विधायकों के एक समूह ने भवन से इंदिरा गांधी के नाम का एक अक्षर तोड़कर फेंक दिया। इस प्रयास में एक विधायक को चोट भी आई थी। उस पीढ़ी में से अधिकांश चेहरे आज विधायक नहीं है। ज्यादातर मुख्य धारा से अलग हो चुके हैं। क्या राज्य के ताजा घटनाक्रम देखकर उनका मन यह कहता होगा कि हमने कुछ जल्दबाजी कर दी। क्योंकि वह आपातकाल की याद थी, यहां तो आपातकाल की पुनरावृत्ति का चरण आरम्भ हो चुका है। शिवराज सिंह चौहान से क्या उनके तेरहवें साल में यह उम्मीद की जा सकती है कि वे इन घटनाओं से कोई सबक लेंगे। लगता तो नहीं, वरना तो अब तक नरसिंहपुर कलेक्टर को उलटा लटक जाना चाहिए था।

फ़ास्ट कालम से साभार

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