आरक्षण को लेकर तीन मजबूत समुदायों की लामबंदी और आसन्न चुनाव

अखिलेश अखिल

”आरक्षण नहीं तो वोट नहीं। तुमने वादा तोड़ा, हमने वोट छोड़ा।” कुछ इसी तरह की राजनीति सामने आती दिख रही है। जिस तरह के राजनीतिक स्लोगन लग रहे हैं और जातीय समुदाय लामबंद हो रहे हैं उससे तो यही लगता है कि साल 2018 और 2019 की चुनावी राजनीति बीजेपी को भारी पड़ने वाली है। इधर अभी पिछले दिनों ही ऑल इंडिया जाट आरक्षण समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने कहा है कि जाट, मराठी और पटेल समुदाय के नेता 25 फरवरी को नई दिल्ली में एक बैठक करेंगे। बैठक का उद्देश्य समुदायों के आरक्षण की मांग की रणनीति तय करना है।

तीनों समुदायों के नेताओं द्वारा साथ बैठक करना और आरक्षण की मांग को दोहराना भाजपा को भारी पड़ सकता है। बीजेपी की राजनीति से ये तीनो समुदाय काफी दुखी हैं और अब किसी भी सूरत में बीजेपी को सबक सिखाने को तैयार है। जाट समुदाय अभी तक बीजेपी को वोट डालते रहे हैं। कुछ राज्यों में इनकी काफी आवादी है जो चुनावी राजनीति को बहुत हद तक प्रभावित भी करती है। जाटों की आवादी राजस्थान में 10फीसदी , पंजाब में 20 फीसदी , दिल्ली और उत्तरप्रदेश में 5 फीसदी और हरियाणा में 25 फीसदी है। आपको बता दें कि पिछले कई साल से हरियाणा और राजस्थान में जाटों का आंदोलन आरक्षण को लेकर गर्म होता रहा और बीजेपी उसे आरक्षण देने की बात कहती रही लेकिन आरक्षण नहीं मिला।

कह सकते हैं कि हरियाणा और राजस्थान में जाटों का आंदोलन फिर शुरू होगा तो हरियाणा सरकार की मुश्किलें तो बढ़ेगी ही साथ ही चुनावी राज्य राजस्थान में भी इसका व्यापक असर होगा। वैसे भी राजस्थान और हरियाणा में दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें सत्ताविरोधी लहर का सामना कर रही हैं। राजस्थान में हाल ही में जाट समुदाय के एक गैंगस्टर के एनकाउंटर के बाद समुदाय में भाजपा के प्रति गुस्सा बढ़ गया है। इसके अलावा सही कीमत पर बिजली मुहैय्या न कराने पर सरकार किसानों का विरोध झेल रही है।

उधर महारष्ट्र में भी भाजपा के खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है। मराठा महाराष्ट्र में मज़बूत पैठ वाला समुदाय है। ये समुदाय शिवसेना और एनसीपी का वोटर रहा है। शरद पवार को इस समुदाय का बड़ा नेता माना जाता है। पिछले साल जो ‘मूक मोर्चे’ मराठा समुदाय द्वारा निकाले गए थे उसे शरद पवार का समर्थन हासिल था। हाल ही में शिवसेना ने 2019 में चुनाव अकेले लड़ने का एलान किया है।जाहिर है मराठाओं का आरक्षण को लेकर कोई आंदोलन शुरू होता है तो इसका असर बीजेपी को प्रभावित करेगा। अब मराठा समाज का जाट और पटेल से हाथ मिलाना आगामी विधानसभा और लोकसभा में भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता है।

गुजरात का पटेल आंदोलन काफी कुछ कह रहा है। हार्दिक पटेल की अगुवाई में चला पटेल आंदोलन की वजह से ही गुजरात में बीजेपी को मन मुताविक सीटें नहीं मिली। बीजेपी की जीत जरूर हुयी है लेकिन पटेलों को नाराजगी ने साफ़ बता दिया है कि आगामी चुनाव में पटेल बीजेपी को सबक सिखाएंगे। लोकसभा में उसे गुजरात जितने में मुश्किलें आ सकती हैं। बता दें, कि गुजरात में पटेल समुदाय की जनसँख्या 17 फीसदी है।
हरियाणा , राजस्थान, उत्तरप्रदेश, गुजरात, महारष्ट्र ये वो राज्य हैं जहाँ जाट, मराठा और पटेल राजनीतिक परिणामों को प्रभावित करते हैं।

इन सभी राज्यों भाजपा की सरकार है फिर भी किसी भी राज्य में समुदाय को आरक्षण प्राप्त नहीं हुआ है। इन समुदायों का इस समय हाथ मिलाना आने वाले समय में एक बड़े आन्दोलन को जन्म दे सकता है जिसका समर्थन विपक्ष करेगा। इधर जब से विपक्ष एकता की राजनीति शुरू हुयी है ,माना जा रहा है कि जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं वहाँ समुदायों की आरक्षण से जुडी राजनीति बीजेपी को परेशान कर सकती है।

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