इधर गुमशुदगी के ‘पोस्टर’, उधर मंत्री बनने नामों के ‘रोस्टर’..!

इस कोरोना संकट में भी मध्यप्रदेश के राजनीतिक फलक पर ‘अमावस’ और ‘पूर्णिमा’ जैसे दो नजारे हैं। एक तरफ प्रदेश के जनप्रतिनिधियों के ‘गायब’ होने के जन- पोस्टर तो दूसरी तरफ शिवराज मंत्रिमंडल में जगह पाने के इच्छुक नेताओं के नामों के ‘रोस्टर’। इस रोस्टर में रोज नए नाम जुड़ और पुराने कट रहे हैं। इधर जनता ‘ईद का चांद’ बने अपने नुमाइंदों को खोज रही है तो कुछ ‘गुमे’ हुए नेता सत्ता की ईद मनाने के लिए हर रोज ‘चांद’ दिखने का इंतजार कर रहे हैं। इस विरोधाभास के बीच कोरोना और लाॅक डाउन से जूझ रहा वो आम आदमी है, जो समझ नहीं पा रहा है कि कोरोना पर कुर्सी इतनी क्यों भारी है?

मध्यप्रदेश के इस राजनीतिक परिदृश्य में हताशा भी है और अदम्य आशा भी है। फर्क है तो नेता और जनता के चश्मों का। बीते दो माह से जारी कोरोना वाॅर के दौरान अवाम के मन में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि इस लड़ाई में जनता के नुमाइंदे कहां है? अपने ही वोटरों से उनकी इतनी डिस्टेंसिंग क्यों? घर बैठे बयान जारी करने का कर्मकांड करने और वीडियो क्लिप्स में अपनी सक्रियता दर्ज कराने वाले ये तमाम लीडरान लाॅक डाउन में जनता की परेशानी शेयर करते ( कुछ अपवादों को छोड़ दें) क्यों नहीं महसूस हो रहे? गरीबों को रसद बांटने के फोटो खिंचवाने की जहमत उठाने के अलावा कोरोना त्रस्तों को भुखमरी से बचाने कितने नेता सिर पर कफन बांध कर सड़कों पर उतरे हैं? जवाब ज्यादातर निगेटिव ही होगा। ऐसे में पब्लिक के पास नेताअोंको पोस्टरों के माध्यम से ‘सर्च’ करने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा है। हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि इस पोस्टर गेम के पीछे कांग्रेसियों और भाजपाइयों का ही हाथ है। बहरहाल इस ‘खोजी पोस्टर अभियान’ की शुरूआत एक हफ्ते पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री कमलनाथ तथा उनके चिरंजीव एवं छिंदवाड़ा सांसद नकुल नाथ की ‘गुमशुदगी’ के पोस्टर के साथ हुई। छिंदवाड़ा के ‘दुखी’ मतदाताअों ने पोस्टर चिपकाए कि ‘लापता’ कमलनाथ को ढूंढ कर लाअो, 21 हजार रू. का नकद इनाम पाअो।‘ पोस्टर प्रकाशक के रूप में ‘छिंदवाड़ा विधानसभा एवं लोकसभा के सभी मतदाता’ नाम लिखा है। इसके पहले बीजेपी ने भी सोशल मीडिया में ‘गुमशुदा की तलाश’ मुहिम चलाई थी, जिसमें कमलनाथ और नकुलनाथ का पता बताने पर इनामी राशि 1100 रू. रखी गई थी। छिंदवाड़ा में ऐसे पोस्टर हैरान करने वाले इसलिए हैं, क्योंकि छिंदवाड़ा कमलनाथ का गढ़ रहा है और विकास का ‘छिंदवाड़ा माॅडल’ 14 माह तक प्रदेश का ‘आदर्श’ रहा। कमलनाथ जब तक सीएम रहे, तब तक प्रदेश की अघोषित दूसरी राजधानी ‘छिंदवाड़ा’ ही मानी जाती थी।

शायद इसी के जवाबी हमले के रूप में पूर्व कांग्रेस नेता और अब नए अवतार में भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की तलाश को लेकर उनके गृह क्षेत्र ग्वालियर में ‘पोस्टर’ चिपक गए। सिंधिया के जयविलास पैलेस ‍स्थित निवास के बाहर चिपके इस पोस्टर में कहा गया कि जो भी ज्योतिरादित्य‍ सिंधिया के बारे में जानकारी देगा, उसे 5100 रूपए का इनाम दिया जाएगा। यहां ‘खोया-पाया’ की इनामी राशि छिंदवाड़ा के मुकाबले एक चौथाई ही है। लेकिन पोस्टर की इबारत ज्यादा आकर्षक थी। लिखा था-‘तलाश है गुमशुदा जन सेवक की’। हालांकि कल तक ‘महाराज’ को कोसने वाले भाजपाई इस पोस्टर से भड़क गए और थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी। पुलिस ने स्थानीय कांग्रेस नेता सिद्धार्थ सिंह राजावत को गिरफ्तार कर लिया। राजावत का कहना है कि ‘अपने को जनसेवक बताने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया पिछले तीन महीनों से ‘गायब’ हैं और ग्वालियर भी नहीं आए हैं। पहले तो उन्होंने अतिथि शिक्षकों के मानदेय के मामले में सड़क पर आकर संघर्ष करने की चेतावनी तत्कालीन कांग्रेस सरकार को दी थी। लेकिन अब जब प्रवासी मजदूर पैदल घर जा रहे हैं, वो ‘लापता’ हैं।

पोस्टरबाजी का यह चैप्टर ठंडा भी नहीं पड़ा था कि एक और पूर्व कांग्रेस विधायक और अब भाजपा नेता राजवर्धन सिंह दत्तीगांव की गुमशुदगी के पोस्टर लग गए। राजवर्धन सिंधिया के कट्टर समर्थक हैं। खास बात यह कि राजवर्धन को ढूंढ कर लाने वाले को देने इनामी राशि बम्पर यानी कि 35 करोड़ रू. रखी गई है, जो कमलनाथ और सिंिधया के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।

गौरतलब है कि ग्वािलयर में सिंधिया के खिलाफ पोस्टरबाजी को भाजपा ने राजनीतिक ‘बदतमीजी’ बताया था, लेकिन प्रदेश की राजधानी भोपाल में खुद भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ ही फेसबुक पर लापता होने के पोस्टर लग गए हैं। अपने ‘बोल्ड’ बयानों के लिए मशहूर साध्वी प्रज्ञा को मतदाता कोरोना काल में शिद्दत से खोज रहे हैं। उधर भाजपा विधायक विश्वास सारंग ने आरोप लगाया कि ऐसे पोस्टर कांग्रेसी लगवा रहे हैं। जवाब में कांग्रेस विधायक पी.सी. शर्मा ने कहा कि जिस समय सांसद की जनता को सख्त जरूरत है, तभी वो ‘गायब’ हैं। इस ‘साध्वी खोजी’ पोस्टर में कोई इनामी राशि नहीं है। केवल मतदाताअों की ‘सदिच्छा’ भर है कि जो लोग सांसद को भोपाल लेकर आएंगे और उन्हें जनता के काम में लगाएंगे, उन्हें जनता दिल से शुभकामनाएं देगी। लेकिन बात साध्वी तक ही नहीं थमी। कई गृहस्थाश्रमी भाजपा नेता भी पोस्टर वाॅर की चपेट में आ गए। इनमें रतलाम सांसद गुमान सिंह डामोर, भाजपा विधायक दिलीप मकवाना और चैतन्य काश्यप भी शामिल हैं। बताया जाता है कि ये पोस्टर रतलाम के युवा कांग्रेस नेता किशन सिंगाड़ ने लगाए।

उधर कुछ ‘लापता’ नेता राज्य मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी के लिए बेकरार दिखे। कुछ मंत्री बनने तो कुछ मंत्री बनवाने के लिए। शिवराज के वर्तमान ‘मिनी मंत्रिमंडल’ के ‘महा-मं‍त्रिमंडल’ में तब्दीली के किस्से बीते एक माह से चल रहे हैं। अब हुआ कि तब हुआ। लेकिन बस वो हो ही नहीं पा रहा। अलबत्ता राजनीतिक रिपोर्टर कोरोना के ठंडे सीजन में भी अटकलों की चाट जरूर आए दिन परोस रहे हैं। कोर्ट की माफिक मंत्रिमंडल विस्तार की तारीख पर तारीख पड़ रही है, लेकिन शपथ है कि नहीं हो पा रही। अब तो खुद राजभवन ही कोरोना की चपेट में है। इस खबर के बाद मंत्री बनने के कई आकांक्षी ‘डिप्रेशन’ में हैं। बताया जाता है कि मामला अगले लाॅक डाउन तक टल सकता है। जिन्हें कांग्रेसी ‘लापता’ बता रहे हैं, उन सबका मंत्री बनना तय है, लेकिन झगड़ा भाजपा के भीतर चल रही तलवारबाजी और रूठने-मनाने का ज्यादा है। 22-24 नए मंत्री बनना तय माना जा रहा है, लेकिन भाजपा के कौन, किस खेमे के और कितने होंगे, यह तय करना कोरोना वैक्सीन तैयार करने से भी ज्यादा दुश्वार साबित हो रहा है। नए और पुराने नेताअोंका शाश्वत झगड़ा तो है ही। दोनो एक दूसरे को पीछे धकेलने में लगे हैं। साथ में थोक में होने वाले उपचुनावों में अपने प्रत्याशियों को जितवाना भी बड़ी चुनौती है। मुख्य मंत्री की परेशानी यह है कि अपनी टीम में गैरों को ज्यादा रखें या अपनों को? कुलमिलाकर मंत्रिमंडल गठन पर शनि की छाया टल नहीं पा रही है।

मैदान से गुमशुदा नेताअोंके खिलाफ पोस्टर जिसने भी लगाए हों, लेकिन वो पब्लिक के गुस्से और हताशा का प्रतीक जरूर है। वैसे भी एक बार वोट दे चुकने के बाद वोटर के हाथ में पांच साल तक आत्म वंचना का ठुल्लू ही बचता है। ये सचमुच क्षुब्ध करने वाला है कि जहां कोरोना के शिकार लोग रोटी और काम मांग रहे हैं, वहीं नेताअोंको कुर्सी में ही ‘राम’ नजर आ रहे हैं। लुब्बो लुआब ये कि गुमशुदगी के पोस्टरों ने नेताअों को विचलित तो किया है, लेकिन उनकी असली ‘चिंता’ तो मंत्री पद और उपचुनाव का टिकट ही है। उनकी इस ‘जीवटता’ के आगे शायद कोरोना भी नतमस्तक है !

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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