इस बार दो दिन मनेगी जन्माष्टमी, पूजा को मुहूर्त को लेकर असमंजस में लोग

नई दिल्ली: भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टी इस बार दो दिन मनाई जाएगी। लेकिन लोगों में पूजा मुहूर्त को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, अष्टमी तिथि 11 अगस्त, मंगलवार को सुबह करीब 10 बजे लग जाएगी और 12 अगस्त को यह सुबह करीब बजे तक रहेगी। ऐसे में कोई 11 को ही जन्माष्टमी व्रत कर रहा है तो कोई 12 अगस्त को। जानकारों के अनुसार, ग्रहस्थ लोगों के लिए 12 अगस्त को जन्माष्टमी का व्रत करना ज्यादा ठीक रहेगा। क्योंकि पूजन-विधान में उदया तिथि का महत्व होता है जो कि 12 अगस्त को पड़ रही है।

साथ ही भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्योत्सव के संकेत स्वरूप 12 अगस्त की रात 12 बजे ही जन्माष्टी का पूजन होगा। हालांकि इस बार अष्टमी तिथि के दिन रोहणी नक्षत्र नहीं है ऐसे में भक्तों का पूजा मुहूर्त को लेकर असमंजस में होना स्वाभाविक बात है। हिंदू धर्म मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ही श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी के दिन लोग भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उपवास रखने के साथ ही भजन-कीर्तन और विधि-विधान से पूजा करते हैं। ज्योतिषियों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के जन्म के समय रात 12 बजे अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र था। ज्योतिषियों के अनुसार जन्माष्टमी का दान 11 अगस्त को और 12 अगस्त को पूजा और व्रत रखा जा सकता है।

12 अगस्त को पूजा का शुभ समय रात 12 बजकर 5 मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक है। अर्थात पूजा की अवधि 43 मिनट तक रहेगी।

अष्टमी तिथि-
11 अगस्त 2020, मंगलवार – अष्टमी तिथि शुरू – 09:06AM
12 अगस्त 2020, बुधवार – अष्टमी तिथि समाप्त – 11:16AM

जन्माष्टमी पूजा मुहूर्त-
12 अगस्त 2020, बुधवार – रात 12:05 बजे से 12:47 बजे तक।

जन्माष्टमी पूजा विधि :
जन्माष्टमी के दिन पूजन सामग्री जैसे, पंचामृतम, भोग, हवन, पंजीरी, प्रसाद, आदि तैयार करके रखा जाता है। पूरे दिन व्रत रखने के बाद रात को रात 12:05 बजे (मुहूर्त) और चांद निकलने का इंतजार किया जाता है। माना जाता है कि जैसे चांद निकलता है वैसे भगवान श्रीकष्ण का प्राकट्योत्सव आरंभ होता है। पंडित के बताए मुहूत के समय या चंद्रमा निकलने के बाद भगवान श्रीकष्ण के विग्रह स्वरूप को गंगाजल, दूध, दही, पंचामृतम, घी आदि से स्नान कराना चाहिए। इसके बाद विधिवत पुष्प, अक्षत, चंदन आदि से पूजा करने साथ ही आरती करना चाहिए। फिर भोग लगाने के बाद प्रसाद बांटना चाहिए। कुछ देर तक चाहें तो भगवान के भजन या कीर्तन भी सुन/गा सकते हैं। इसके बाद भगवान को भोग लगने के बाद खुद प्रसाद लें और व्रत का पारण करें।

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