उत्तर प्रदेश में अपराध पर काबू पाने की कहानी यूट्यूब से बता रहे आईपीएस अधिकारी

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में एक आईपीएस अधिकारी ऐसे हैं, जिन्होंने प्रदेश में करीब तीन दशकों से अपराध और राजनीति के चेहरे को बदलकर रख दिया है। इस अधिकारी ने पुलिस के लिए सिरदर्द बन चुके कई अपराधियों को ढेर किया है। हम बात कर रहे हैं बरेली के डीआईजी राजेश पांडे की, जिन्होंने अपने करियर में कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की है। पांडे ने अब एक यूट्यूब चैनल शुरू किया है, जिसमें वह अपराध की दुनिया में हुए कई रोमांचक किस्सों और अपराधियों के साथ अपने अनुभवों को याद कर रहे हैं।

भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी पांडे ने ‘किस्सागोई’ शीर्षक से शुरू किए अपने चैनल में अपनी पहली पोस्टिंग से लेकर अन्य कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम को उजागर किया है। उन्होंने 1990 में सोनभद्र में बतौर डीएसपी पदभार ग्रहण करने से लेकर उसके बाद जौनपुर और आजमगढ़ में अपने कार्यकाल को रेखांकित किया है। पांडे उत्तर प्रदेश में विशेष टास्क फोर्स (एसटीएफ) के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं। उन्होंने आपराधिक एवं राजनेताओं की सांठगांठ से संबंधित अनगिनत हाई-प्रोफाइल मामलों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

पांडे ने रविवार को कहा कि उन्होंने राष्ट्रव्यापी बंद के दौरान अपने अनुभवों को संजोकर रखने का फैसला किया, जब उन्होंने पाया कि उनके पास खुद के लिए कुछ समय है। पांडे ने कहा, “वैसे अपने करियर में मैं फील्ड पोस्टिंग पर रहा हूं, जिससे मुझे अपने और परिवार के लिए कोई समय नहीं मिला। चूंकि डीआईजी के रूप में फील्ड दबाव तुलनात्मक रूप से कम है और फिर लॉकडाउन शुरू हो गया तो मैंने अनुभवों को रिकॉर्ड करने का फैसला किया।”

पांडे ने लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति को याद किया, जब छात्र नेताओं में अपने उप-नाम रखने का चलन होता था। उस समय ज्ञानेंद्र सिंह ने अपने नाम के साथ ‘ज्ञानू’ जोड़ा, शैलेश कुमार ने ‘शैलू’ और अरविंद सिंह का ‘गोपी’ नाम रखा। आईपीएस अधिकारी ने अपने एक एपिसोड में बताया कि कैंपस में उस समय वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई थी, जब छात्रों के संघ चुनावों के लिए अपना सिक्का जमाए रखने के लिए व अपनी उच्च आकांक्षाओं के लिए होडिर्ंग्स लगने शुरू हो गए थे। पांडे बताते हैं कि इसका मतलब यह था कि एक विशेष छात्र के लिए एक विशेष होडिर्ंग रिजर्व हो गया था और इसे चुनौती देने से हिंसा हो सकती थी।

इसके बाद के एपिसोड में पांडे 1997 में एक ला मार्टिनियर ब्वायज स्कूल के शिक्षक फ्रेडरिक गोम्स की सनसनीखेज हत्या की बात करते हैं, जो अपने कमरे में मृत पाए गए थे। पांडे की ‘किस्सागोई’ का चरम बिंदु खूंखार डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला और अंडरवल्र्ड में मोबाइल फोन के इस्तेमाल से संबंधित है। शुक्ला उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े खूंखार अपराधियों में से एक था, जिसका कभी ऐसा बोलबाला होता था कि कल्याण सिंह सरकार को अंडरवल्र्ड से निपटने के लिए एक एसटीएफ गठित करनी पड़ी।

पांडे इसकी स्थापना से इस बल के प्रमुख सदस्यों में से एक हैं। आईपीएस पांडे को अपनी बहादुरी के लिए चार बार राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा उन्हें ‘शांति की सेवा’ के लिए संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। पांडे ने उच्च-प्रोफाइल व्यवसायियों की हत्या और अपहरण से संबंधित कई मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो कि नब्बे के दशक में आए दिन की घटनाएं हो चली थी।

उन्होंने लखनऊ में एक कवयित्री की सनसनीखेज हत्या के मामले को भी देखा, जिसके लिए तत्कालीन मंत्री अमर मणि त्रिपाठी को दोषी ठहराया गया था। वह बताते हैं कि कैसे पुलिस ने तकनीक का इस्तेमाल करना सीखा और इसमें अपराधियों को पछाड़ दिया। उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण मामलों को सुलझाने को लेकर भी बात की। पांडे यूट्यूब पर अपने अनुभवों के 21 अलग-अलग एपिसोड जारी कर चुके हैं और आगे भी कुछ और एपिसोड जारी होंगे। अब पांडे उत्तर प्रदेश पुलिस में अपने अनुभवों पर एक किताब लिखने की योजना बना रहे हैं।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि नई पीढ़ियों को उस समय के बारे में विस्तार से जानने की आवश्यकता है और वे केवल इंटरनेट ज्ञान पर ही निर्भर नहीं हैं।” पांडे ने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद पुस्तक को जारी करने की योजना बनाई है, जिसमें अभी डेढ़ साल बचा हुआ है।

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