एक ऐसा गांव जहाँ रात में बना रहता है अनहोनी का डर, आज तक है श्रापित

भारत की जमीन में कई ऐसे राज दफ्न हैं जो कई वर्षों या कहें सदियों बाद आज भी उसी तरह ताजा और अनसुलझे हैं। ये रहस्य कुछ ऐसे हैं जिन्हें जितना सुलझाने की कोशिश होती है ये उतने ही उलझते चले जाते हैं। ऐसा ही एक राज दफ्न है राजस्थान के एक छोटे से गांव कुलधरा के भीतर। जो आज तक श्रापित होने का जख्म भूल नहीं सका है।

जैसलमेर से करीब 18 किलोमीटर दूरी पर स्थित कुलधरा नाम का यह छोटा सा गांव 1291 में बसा था। 600 घरों वाले इस गांव को रईस और मेहनती पालीवाल ब्राह्मणों बताया था। ये ब्राह्मण ना सिर्फ मेहनती बल्कि वैज्ञानिक तौर पर भी सशक्त थे क्योंकि कुलधरा के अवशेषों से यह स्पष्ट अंकित होता है कि कुलधरा के मकानों को वैज्ञानिक आधार से बनाया गया था। पालीवाल ब्राह्मणों का समुदाय सामान्यत: खेती और मवेशी पालन पर निर्भर रहता था। जिप्संम की परत बारिश के पानी को भूमि में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल ब्राह्मण अपने खेतों को सींचते थे।

इस शहर के श्रापित होने की कहानी तब शुरू हुई जब खुशहाल जीवन जीने वाले पालीवाल ब्राह्मणों पर वहां के दीवान सालम सिंह की बुरी नजर पड़ी सालम सिंह को एक ब्राह्मण लड़की पसंद आ गई थी और वह हर संभव कोशिश कर उसे पाना चाहता था। जब उसकी सारी कोशिशें नाकाम होने लगीं तब सालम सिंह ने गांव वालों को यह धमकी दी कि या तो पूर्णमासी तक वे उस लड़की को उसे सौंप दें या फिर वह स्वयं उसे उठाकर ले जाएगा।

गांव वालों के सामने एक लड़की के सम्मान को बचाने की चुनौती थी। वह चाहते तो एक लड़की की आहुति देकर अपना घर बचाकर रख सकते थे लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। एक रात 84 गांव के सभी ब्राह्मणों ने बैठकर एक निर्णय लिया कि वे रातों रात इस गांव को खाली कर देंगे लेकिन उस लड़की को कुछ नहीं होने देंगे। बस एक ही रात में कुलधरा समेत आसपास के सभी गांव खाली हो गए। जाते-जाते वे लोग इस गांव को श्राप दे गए कि इस स्थान पर कोई भी नहीं बस पाएगा, जो भी यहां आएगा वह बरबाद हो जाएगा। कुलधरा की सुनसान और बंजर जमीन का पीछा वह श्राप आज तक कर रहा है। तभी तो जिसने भी उन मकानों में रहने या उस स्थान पर बसने की हिम्मत की वह बर्बाद हो गया।

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