एक छुपे हुए अजेंडे का सच !

अखिलेश अखिल

सबसे पहले इन आंकड़ों पर नजर दौड़ाइए। आंकड़े बता रहे हैं सर्वोच्च न्यायालय में कुल न्यायाधीशों के 31 पद स्वीकृत हैं लेकिन सालों से 7 पद खाली पड़े हुए हैं। नतीजा यह है कि लाखों केस पेंडिंग पड़े हुए हैं। के को देखने के लिए जज नहीं हैं। देश भर के हाई कोर्ट जजों की कुल संख्या 1079 स्वीकृत है लेकिन इनमे से 403 पद खाली पड़े हुए हैं। हाई कोर्ट के लिए कुल 24 चीफ जज के पद निर्धारित हैं लेकिन इनमे भी 9 पद खाली हैं। इन खाली पदों की वजह से देश की न्यायिक व्यवस्था पर क्या सर पड़ रहे हैं इसका अवलोकन आप खुद ही कर सकते हैं।

इसी प्रकार रिजर्व बैंक के चार डिप्टी गवर्नर पद में से एक पद खाली है ,सेबी के 9 सदस्यों में 2 खाली पड़े हुए हैं ,प्रतिभूति अपीलीय अधिकरण के 3 पद में से एक पद खाली है ,राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के लिए 11 पद निर्धारित हैं जिनमे 6 खाली हैं ,आयकर अपीलीय अधिकरण के लिए 126 निर्धारित पदों में से 34 पद सालों से खाली हैं। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण के 66 पदों में से 24 खाली हैं। केंद्रीय सुचना आयुक्त के 11 पदों में से चार खाली पड़े हुए हैं जबकि इसी आयोग के 160 कर्मचारियों में से 117 पद खाली पड़े हुए हैं। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग आयुक्त के 7 पदों में से 2 खाली पड़े हुए हैं जबकि इसी आयोग में कर्मचारियों की संख्या 197 निर्धारित हैं जिनमे से 79 पद खाली पड़े हुए हैं।

केंद्रीय सतर्कता आयोग आयुक्त के 3 पदों में से एक खाली है और आयोग के 296 कर्मचारियों में से 53 पद खाली पड़े हुए हैं। देश भर में आईपीएस के 4843 पद सृजित किये गए हैं जबकि 938 पद खाली पड़े हुए हैं। सीबीआई के कुल 7274 पदों में से 1656 पद खाली हैं। सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपतियों की संख्या 41 निर्धारित है जबकि 3 खाली हैं और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कुल संख्या 17106 निर्धारित हैं जिनमे 5997 पद खाली पड़े हुए हैं। ये आंकड़े देश के उन बड़े विभागों के हैं जहां से बड़े स्तर पर काम निपटाए जाते हैं और आम जनता से जुड़े मसलों पर काम किये जाते हैं। इसके अलावा देश के तमाम विभागोंकी सूचि जारी जाय तो आंकड़े अंतहीन हो सकते हैं।

ऐसे सवाल उठता है कि आखिर सरकार करना क्या चाहती है ?उसका अजेंडा क्या है ? और उसकी योजना क्या है ? सबसे पहले याद दिला दें कि पीएम मोदी ने 2014 में शपथ लेने के बाद ऐलान किया था कि छोटी सरकार ,ज्यादा काम। सरकार को बताना चाहिए कि क्या उन्होंने अपने ऐलान वाले वादों को पूरा किया है ? ऐसा नहीं लगता। अब उनकी सरकार भी बड़ी है और काम भी कुछ होता नहीं दिखता। एक तरफ बेरोजगारी से देश तबाह है और दूसरी तरह हजारों पद खाली पड़े हुए हैं। इससे बड़े स्तर पर काम भी प्रभावित होता दिख रहा है। ऐसे में तो लगता है क़ि सरकार ने जो न्यूनतम सरकार की बातें की थी दरअसल उसके पीछे अधिकतम नियंत्रण कायम करने और उदार लोकतंत्र को बुरा बनाने तथा उसे नुक्सान पहुंचाने भर का है।

इससे एक सवाल और बनता है कि सरकार के इस खेल के पीछे कोई छुपा अजेंडा तो नहीं ? आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि निर्णायक नियामकों और प्राधिकरणों में खाली पद रखने से आखिर किसे लाभ हो रहा है ? जाहिर है कम कर्मचारी की वजह से आरटीआई के कमतर खुलासे हो रहे हैं और कर सम्बन्धी मामलों के कमतर निपटारे हो रहे हैं। इससे सरकार के हित ही सधते दीखते हैं। सरकार जान बुझ कर यह खेल कर रही है। कहने के लिए वादों की झड़ी लगाई जा रही है और जो दिखाई पड़ रही है उससे जनता में खींझ व्याप्त है।

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