ओबीसी-एससीएसटी एक्ट: उल्टा पड़ा भाजपा का दांव!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लग रहा है कि आगामी चुनाव में उनकी कूटनीति से फिर भाजपा लहलहा जाएगी, लेकिन जो हालत दिख रहे हैं उससे साफ है कि इस दफा उनकी नीति काम नहीं कर पाएगी। एससी-एसटी एक्ट और ओबीसी आयोग भाजपा के लिए गले की हड्डी बन गए हैं। इन फैसलों के राजनीतिक मायनों का विश्लेषण कर रहे हैं अखिलेश अखिल

राजनीति में सारे दांव तात्कालिक ही होते हैं। स्थाई कुछ भी नहीं होता। जैसे कल तक समूचे देश में मोदी-मोदी के नारे लग रहे थे, अब ऐसा नहीं होता दिखता। पीएम मोदी के प्रति देश के लोगों में पहले जैसा सुरूर अब नहीं रह गया है। यह बात और है कि आज भी पीएम मोदी के सामने कोई बड़ा वक्ता और जनता के बीच पैठ रखने वाला नेता नहीं दिखता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब लोगों का मिजाज मोदी की राजनीति से जुदा होता जा रहा है। मोदी का अब हर शंखनाद लोगों को भ्रमित करता है और दुखी भी। कारण साफ है कि जनता की उम्मीदों पर यह सरकार भी अभी तक सफल नहीं दिखती। लेकिन यहां हम बात कर रहे हैं आगामी चुनाव से जुड़े राजनीतिक खेल और पैतरेबाजी को लेकर।

आधुनिक राजनीति के चतुर खिलाड़ी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लग रहा है कि आगामी चुनाव में उनकी कूटनीति से फिर भाजपा लहलहा जाएगी और विपक्ष ढेर हो जाएगा। लेकिन जो हालत दिख रहे हैं उससे साफ है कि इस दफा उनकी नीति काम नहीं कर पाएगी। भाजपा बड़े ही जतन से एससी-एसटी एक्ट में बदलाव करके इस कानून से जुड़े दलित समाज को लाभ पहुंचाने की राजनीति कर रही है। इसी तरह ओबीसी आयोग को संवैधानिक महत्व देने में लगे हैं, ताकि अगले चुनाव में ओबीसी और एससी-एसटी समाज भाजपा को वोट दे। लेकिन ऐसा नहीं दिखता नहीं। जब रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाया जा रहा था, तो यही कहा जा रहा था कि वोट पाने के लिए भाजपा ने ऐसा किया है। कोविंद के बहाने दलित वोट पाने की संभावना भाजपा को जगी थी, लेकिन ऐसा होता नहीं दिखा।

अगर ऐसा होता, तो शायद भाजपा एससी-एसटी एक्ट में बदलाव नहीं करती। लेकिन जब भाजपा को लग गया कि राष्ट्रपति कोविंद के आने के बाद भी दलित और पिछड़े वोट भाजपा के पक्ष में नहीं आ रहे हैं, तब रणनीति के तहत आगे की कूटनीति तैयार की गई। और यह कूटनीति है एससी-एसटी एक्ट में बदलाव और ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की। लेकिन जिस तरह कि राजनीति देश में चल रही है और जातीय समीकरण दिख रहे हैं ऐसे में नहीं लगता कि भाजपा के इस खेल का लाभ भी उसे मिल पाएगा।

भाजपा की सबसे ज्यादा नजर यूपी और महाराष्ट्र पर लगी है। दोनों राज्यों की 128 लोकसभा सीटों में से कोई 115 सीटें एनडीए के पास हैं। इनकी वापसी के लिए मोदी-शाह दस तरह के जतन कर रहे हैं। मगर न उद्धव ठाकरे-शिवसेना-मराठा वोट भाजपा की गणित बनने देंगे और न यूपी में बसपा-सपा का कोर वोट हिलना है। फिर ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने या एससी-एसटी एक्ट नया बनवा देने का भले ही कितना भी हल्ला मोदी-शाह करवाएं। इसकी वजह है। मोदी-शाह की नंबर एक गलती थी कि योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश में और देवेंद्र फडऩवीस को महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री बनाया। दोनों नेता कुछ अलग तरह के हैं। सभी जातियों में न इनकी पकड़ है और न ही इनका प्रभाव ही। खासकर दलित और पिछड़े वर्ग तक इनकी पहुंच ना के बराबर है।

योगी से सूबे की अधिकतर जनता खफा है, खासकर ब्राह्मण समाज। यूपी में ब्राह्मणों की आबादी भी ठीक-ठाक है और दलित-पिछड़ा आबादी भी ज्यादा है। लेकिन इस बड़ी आबादी पर महामहिम का भी कोई असर नहीं है। फिर पिछड़ा समाज, जहां कई दलों में बनता है, वहीं यादव समाज आज भी अखिलेश यादव के साथ ही बंधा हुआ है। इसके साथ ही पिछड़ों की कई जातियां सपा के साथ इनटेक्ट हैं। उधर सूबे का तमाम दलित समाज आज भी बसपा के साथ है और आगे भी रहने की संभावना है। ऐसे में दलित और पिछड़ों का वोट शायद ही भाजपा के पक्ष में जा सकेगा। फिर कहीं गोरक्षकों की मार, कहीं बीफ का हल्ला और कहीं चमड़े के कारोबार ने और कही सत्ता के साझे ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि एक रसायन ठीक करेंगे, तो दूसरा रसायन भड़केगा।

अब अगर नया एससी-एसटी एक्ट आ भी जाए, तो इसका लाभ भाजपा को कैसे मिलेगा? लाभ तो मायावती को ही मिलना है। दलित समाज मायावती की वाहवाही इस धारणा में करेंगे कि मायावती, रामविलास, उदितराज, अठावले, खडग़े आदि दलित नेताओं ने हल्ला किया तो मोदी सरकार मजबूर हुई। यह उन दलित संगठनों की जीत है जिन्होंने भारत बंद करवाया। मतलब यूपी, महाराष्ट्र में एक प्रतिशत दलित वोट भी भाजपा से वैसे ही नहीं जुडऩे हैं, जैसे रामनाथ कोविंद को बनाने के बावजूद नहीं जुड़े। इसके साथ ही एक और पेंच है। यूपी में ओबीसी और ब्राह्मण एससी-एसटी एक्ट से सर्वाधिक पीडि़त रहे हैं, ऐसे में नया एक्ट आने के बाद ब्राह्मण और ओबीसी के लोग भाजपा से और बिदकेंगे। जो भी वोट मिल रहे थे उसमें भी कटौती हो सकती है। ठीक इस तरह का खेल महाराष्ट्र में मराठों के साथ होना है।

महाराष्ट्र की हालत तो और भी खराब है। मराठा को पटाएंगे तो ओबीसी, दलित बिदकेंगे और दलित-ओबीसी को पटाएंगे तो मराठा-फारवर्ड बिदकेंगे। अब वहां कोई हिंदू लहर नहीं बननी है, नहीं चलनी है क्योंकि खांटी हिंदू शिवसेना मुंबई में ही यह हल्ला बनाए रखेगी कि भाजपा के नेता गुजराती व्यापारी हैं ना कि हिंदू। यूपी में योगी जी कितना भी हल्ला कर लें, जाट, ब्राह्मण, ओबीसी और दलित में वैसी हिंदू हवा बनवा नहीं सकते जो 2014 और 2017 में थी क्योंकि जातियों में परस्पर रिश्तों का 2014 से पहले का केमिकल फिर मुखर है। खुद योगी जब राजपूत इमेज बनवा बैठे हैं, तो भाजपा के भी ब्राह्मण, ओबीसी, भूमिहार वोटों का केमिकल भगवा रंग को फीका बनाए हुए हो गया है। अपनी जगह यह भी तथ्य है कि बसपा और सपा का ठोस वोट 2014 में जैसा था, तो वह 2017 में भी जस का तस था और आगे भी वह रहेगा। वह किसी सूरत में बांग्लादेशी घुसपैठियों के हल्ले यानी हिंदु बनाम मुस्लिम के नए नैरेटिव की हवा में नहीं बहेगा।

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