और नीतीश के खेल को समझ रही है बीजेपी !

अखिलेश अखिल

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रशंसकों पर गौर कीजिये तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आती है। एक बात तो सही है कि नीतीश कुमार बोलते कम हैं और करते ज्यादा दिखते हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक सूझ कभी कभी सामने वालों को भी चकित कर देती है। बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार चला रहे नीतीश कुमार के पिछले कुछ फाइलों पर गौर करें तो साफ़ हो जाता है कि वे भविष्य की राजनीति देख रहे हैं और उसी के अनुरूप अपनी तैयारी भी कर रहे हैं। ज़रा उनके फैसले को देखिये। नीतीश कुमार के सबसे बड़े विरोधी कभी पासवान साहब ही रहे हैं। जब तक लालू यादव के साथ नीतीश कुमार सरकार चला रहे थे तब तक नीतीश कुमार रामविलास पासवान के रडार पर रहे।

अब नीतीश कुमार के सबसे बड़े प्रेमी पासवान ही हो गए हैं। नीतीश कुमार जब महादलित बनाकर दलित समाज को बांटा था और अपना वोटबैंक महादलित के जरिए खड़ा किया था तब पासवान साहब भड़क गए थे। नीतीश को क्या क्या नहीं कहा था। लेकिन अब पासवान और नीतीश की जोडी बहुत कुछ करती दिख रही है। वजह साफ़ है। पहले नीतीश कुमार ने महादलित से दुसाध समाज को अलग कर दिया था। दुसाध दलित और बाकी सब महादलित। नीतीश कुमार का कहना था कि दलितों में दुसाध सबसे ज्यादा सबल है और आरक्षण का सारा लाभ उसी को मिलता है। लेकिन अब नीतीश कुमार ने फिर से दुसाध को महादलित में शामिल कर लिया है। पासवान जी फुले नहीं समा रहे। इससे पहले नीतीश कुमार ने पासवान के भाई पशुपति पारस को विधान परिषद में भेजा था और अपनी सरकार में मंत्री बनाया था।तब से ही बीजेपी की समझदारी बढ़ी है।

खबर यह भी मिल रही है कि जैसे जैसे नीतीश और पासवान की जोड़ी मजबूत होती जा रही है बीजेपी के कान खड़े हो रहे हैं। रामविलास पासवान की राजनीति को देख कर बीजेपी ने इस बार अपने संजय पासवान को विधान सभा में भेजने की तैयारी की है। संजय पासवान बहुत समय से बीजेपी से नाराज चल रहे थे या यह कहिये कि बीजेपी ने उन्हें साइड लीन कर रखा था। अब सनजय पासवान बीजेपी के लिए दलित ,महादलित की राजनीती करेंगे। पहले कहा जा रहा था कि भाजपा और जदयू कोटे की छह सीटों में से जदयू चार और भाजपा दो सीटों पर लड़ेगी। पर बाद में भाजपा तीसरी सीट लेने के लिए अड़ गई।

मजबूरी में नीतीश कुमार को अपनी पार्टी के प्रवक्ता संजय सिंह की टिकट काटनी पड़ी। पर अंत समय में नीतीश ने पूर्वी चंपारण से एक मुस्लिम चेहरे खालिद अहमद को उम्मीदवार बना दिया। वे पैसे वाले और काफी अच्छे कारोबारी हैं पर उनको विधान परिषद में भेजना हैरान करने वाला फैसला है। जदयू नेताओं को पता है कि भाजपा के साथ रहने पर मुस्लिम वोट नहीं देंगे, फिर भी नीतीश का मुस्लिम उम्मीदवार बनाना आगे की राजनीति का कुछ तो संकेत देता है। बीजेपी को लग रहा है कि आगे कोई भी खेल हो सकता है और पासवान नीतीश की जोड़ी कभी भी गच्चा दे सकती है। यह समझकर बीजेपी अपनी तैयारी भी कर रही है।

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