और बिहार की सभी दलित जातियां अचानक महादलित हो गयी 

अखिलेश अखिल 

राजनीति क्या ना कर दे। जातियों की राजनीति नेताओं को खूब भाती है और जातियां ही राजनीति का पोषण करती है। जाती है तो राजनीति है ,जाति नहीं तो राजनीति बेरंग। जातियों की राजनीति पूरे देश में चलती है लेकिन राजनीति में जातियों का जुड़ाव शायद बिहार से ही कहा जा सकता है। बिहार का बड़ा भाई यूपी भी है। वहाँ जातिया राजनीति को सम्बल प्रदान तो करती है लेकिन यूपी में जातियों के साथ धर्म की राजनीति भी कुलांचे मारती है। पिछले कई चुनाव बताते हैं कि यूपी में जातिया और धर्म राजनीति को प्रभावित करती है। कभी कभी तो धर्म की राजनीति यहाँ जातियों को भी पछाड़ देती है।

बिहार की तमाम क्षेत्रीय पार्टियां जाति पर ही आधारित रही है। बहुत जमाने से। वैसे कांग्रेस और बीजेपी भी जातियों की राजनीति को बढ़ावा देती रही है लेकिन जाति आधारित राजनीति सबसे ज्यादा क्षेत्रीय दल ही करते रहे हैं। चाहे वह लालू की राजनीति हो या नीतीश की। पासवान की राजनीति हो या कुशवाहा की। मांझी की राजनीति हो या पप्पू यादव की। समय समय पर सभी नेताओं ने जातियों की राजनीति की और अच्छी फसल काटी।

बिहार में जब नीतीश युग आया तो एक नयी राजनीति सामने आयी। दलित समाज की 22 जातियां पहले एक साथ ही हुआ करती थी। कांग्रेस वाले इस समाज की राजनीती करते थे। समय बदला तो क्षेत्रीय जातियां दलित जातियों को अपने में मिलाया। खासकर लालू प्रसाद के समय में ऐसा कुछ हुआ। फिर बीजेपी ,पासवान से लेकर सभी दल दलितों को अपनाने को बेताव हुए। नीतीश कुमार ने एक नयी चाल चली। दलितों को बाँट दिया। दलित से महादलित का सूत्रपात किया। दलित समाज की 22 जातियों को महादलित की श्रेणी में डाला।

पिछले दो चुनाव में नीतीश कुमार को इसका भरपूर लाभ भी मिला। दुसाध जाति को महादलित से अलग रखा गया था जिसको लेकर रामविलास पासवान मुँह फुलाय घुमा करते थे। लेकिन अब जब नीतीश के सरोकार  पासवान के साथ परवान चढ़ते जा रहे हैं  तो महादलित से त्याज्य दुसाध जाति को भी महादलित में शामिल कर लिया गया। ऐसा होते ही बिहार से दलित जाति की समाप्ति ही हो गयी। सभी के सभी महादलित हो गए। अब सभी 22 दलित जातियां महादलित हो गयी है।

इससे पहले नीतीश कुमार ने ही मार्च 2015 में पासवान जाति को महादलित का दर्जा देने वाला जीतन राम मांझी का आदेश पलट दिया था।  उस समय उनका तर्क था कि दलितों में 31 फीसदी का हिस्सा रखने वाली इस जाति की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति बाकी दलितों से बेहतर है।  उन्होंने तब यह भी बताया था कि महादलित का दर्जा उसी दलित बिरादरी को दिया गया है जिनकी दशा दूसरों से खराब है।  असल में नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री बने जीतन राम मांझी ने उनसे बगावत के बाद फरवरी 2015 में महादलित वर्ग से बाहर रह गई एकमात्र दलित जाति पासवान को इसमें शामिल करने की घोषणा की थी।

बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस फैसले को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री की नीयत पर सवाल उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार कभी नहीं चाहते कि रामविलास पासवान या कोई और उनसे ज्यादा मजबूत हों इसलिए यह फैसला उन्होंने केवल अपनी भलाई के लिए लिया है। तेजस्वी यादव ने कहा, ‘जब मैं उपमुख्यमंत्री था तो चंपारण के एक कार्यक्रम में शामिल होने नीतीश जी के साथ गया था. इस दौरान हेलीकॉप्टर में दलित-महादलित का मुद्दा छिड़ने पर नीतीश जी ने मुझसे कहा कि पासवान जी दलित नेता बनने की कोशिश कर रहे थे और तब उन्हें केवल उनकी जाति तक सीमित रखने के लिए उन्होंने महादलित वर्ग का गठन किया था। ’

तेजस्वी यादव ने इसलिए नीतीश कुमार से पूछा है कि आखिर क्यों उन्होंने पासवान जाति को अब तक महादलित वर्ग से बाहर रखा और अब उसे इसमें शामिल कर लिया है। वहीं राजनीतिक विश्लेषक नीतीश कुमार के ताजा फैसले को केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन के भीतर चल रहे राजनीतिक दांव-पेंच का परिणाम मान रहे हैं।  इनके अनुसार एनडीए में शामिल बिहार के तीनों घटक आपसी सहयोग बढ़ाकर भाजपा पर दबाव बनाना चाहते हैं ताकि अगले लोकसभा चुनाव में अधिक से अधिक सीटों पर दावेदारी ठोकी जा सके।

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