कन्या भोज के आईने में भूख से मरते भारत को भी देखें !

– अजय बोकिल

नवरात्र पर नौ दिन व्रत रखना और महानवमी के दिन कन्या पूजन करके कन्याओं को भोजन कराने एवं दान-दक्षिणा देने की परंपरा सदियों पुरानी है। आम आदमी ही नहीं, कई बड़ी राजनीतिक हस्तियां भी नवरात्र परंपरागत तरीके से मनाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी नौ दिन व्रत रखकर गोरखपुर में कन्या भोज कराते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राजबब्बर ने भी कन्या भोज कराया। इसके अलावा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा और राजद नेता तेजस्वी यादव तक सभी नवरात्र के पर्व को राजनीतिक रूप से भुनाते नजर आए। शायद ऐसा पहली बार है कि कन्या भोज का भी राजनीतिकरण हो गया और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लग गई।

हालांकि इसका दूसरा पक्ष काफी स्याह है। दरअसल, जिस देश में महानवमी पर कन्या भोज की पवित्र और अनुकरणीय परंपरा हो, उसी नवरात्र में यह खबर आए कि भुखमरी खत्म करने वाले देशों की सूची में भारत और पीछे चला गया है, क्षुब्ध और चिंतित करने वाली है। क्योंकि एक तरफ हम भूखे को भोजन कराने को पुण्य कर्म मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी देश में रोजाना औसतन 3 हजार बच्चे प्रतिदिन इस कारण दम तोड़ देते हैं कि उन्हें या तो खाना ही नहीं मिलता या फिर भरपेट खाने के लाले हैं। इसका एक बड़ा कारण गरीबी और खाने का सही वितरण न होना है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स की वर्ष 2018 की जारी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बनता भारत वैश्विक भुखमरी सूचकांक में तीन स्थान और नीचे चला गया है। पिछले साल हम 100वें नंबर पर थे, अब 103 पर चले गए हैं। अगर वर्ष 2015 को छोड़ दिया जाए, तो भारत इस सूची में नीचे ही जा रहा है। इस मामले में भारत की स्थिति नेपाल और बांग्लादेश जैसे छोटे और गरीब पड़ोसी देशों से भी खराब है, जबकि चीन हमसे काफी आगे हैं। चाहें तो हम इस बात से जरूर ‘राहत’ महसूस कर सकते हैं कि हमसे ज्यादा भूख से मौतें पाकिस्तान में हो रही हैं।

दरअसल ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भूख से मरने की स्थिति का आकलन करता है। इसका मकसद भूख के खिलाफ पूरी दुनिया में संघर्ष की जागरूकता और समझ बढ़ाना, विभिन्न देशों के बीच भूख के स्तर की तुलना का तरीका विकसित करना और विश्व के उन क्षेत्रों की ओर लोगों का ध्यान आकॢषत करना है, जहां लोगों को दो जून की मिलना भी दूभर है। जीएचआई में यह देखा जाता है कि देश की कितनी जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल रहा है। कितने लोग कुपोषण के शिकार हैं। साथ ही यह भी देखा जाता है कि पांच साल के नीचे के कितने बच्चों की लंबाई और वजन उनके उम्र के हिसाब से कम है। इसके साथ ही इसमें बाल मृत्यु दर की गणना को भी शामिल किया जाता है। ये आंकड़े हर साल इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट प्रकाशित करता है।

विडंबना यह है कि पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन के बावजूद भारत में लोगों और खासकर बच्चों को पेट भर अन्न भी नहीं मिल रहा है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में तो भूख से बजाय ज्यादातर मौतें कुपोषण के कारण होती हैं। कारण कि तमाम सरकारी योजनाओं और सुपोषण के दावों के बाद भी बच्चों तक अन्न नहीं पहुंच रहा है। यदि पहुंच भी रहा है तो बच्चों के मां-बाप में उसे खरीदने की आॢथक शक्ति नहीं हैं। ऐसी स्थिति ज्यादातर जंगलों में गुजर-बसर करने वाले आदिवासियों की है। भारत जैसे देशों में एक बड़ा सामाजिक-आॢथक विरोधाभास यह भी है कि जहां एक ओर हजारों बच्चों को थोड़ा भी अन्न पेट भरने के लिए नहीं मिल पा रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारे यहां खाने की बर्बादी भी शायद सर्वाधिक होती है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों हमें बताते हैं कि भारत में 40 फीसदी खाना बर्बाद हो जाता है।

अगर अन्न की इस बर्बादी को पैसों में नापा जाए तो यह आंकड़ा 50 हजार करोड़ रुपए के आसपास पहुंचेगा। खाने की इस बर्बादी को देखने महसूस करने के लिए हमें ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। अक्सर शादियों, पार्टियों में इतना खाना बना लिया जाता है कि यूं ही फेंकना पड़ता है। अगर इस खाने को बचाकर बांट दिया जाए, तो कई भूखों का पेट भर सकता है। आंकड़े बताते हैं कि भूख से पीडि़त दुनिया की 25 फीसदी आबादी भारत में रहती है। भारत में करीब साढ़े 19 करोड़ लोग कुपोषित हैं। इसमें वे लोग भी हैं, जिन्हें खाना नहीं मिल पाता और वे भी हैं, जिनके खाने में पोषण की कमी होती है। वैसे कुछ सामाजिक संस्थाएं बचे खाने को एकत्र कर उन्हें जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम करती हैं, ताकि भूखे की भूख मिटे और ज्यादा अन्न फेंकने की नौबत न आए।

इसके बाद भी भारत भूख से मौतों के मामले में और नीचे जा रहा है, बजाय ऊपर उठने के। भूखों का पेट भरे, उन्हें पर्याप्त अन्न मिले यह कौन नहीं चाहता। लेकिन सवाल यह है कि यह अन्न उन भूखे लोगों तक पहुंचे कैसे? इसके लिए बनाई गई व्यवस्था में सौ छेद हैं। सरकार से बांटा जाने वाला राशन भी गरीबों तक नहीं पहुंचता। वे शिकायत करने की भी स्थिति में नहीं हैं। साथ ही भ्रष्टाचार की गंगोत्री भी यही से निकलती है। पोषण आहार प्रदाय में होने वाला भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। तमाम दावों के बाद भी गरीबों तक अन्न नहीं पहुंच पा रहा है।

मुद्दा यह है कि गरीबों में भूख अथवा कुषोषण के कारण होने वाली मौतों को कैसे रोक जाए। सरकारी फर्जीवाड़े की जगह वास्तविक जरूरतमंदों तक अन्न पहुंचे। उन्हें पेट भर खाना मिले तो देश की स्थिति हंगर इंडेक्स में सुधर सकती है। हैरानी की बात यह है कि सरकारी आंकड़े लगभग हर क्षेत्र में प्रगति की रिपोर्ट देते हैं, फिर भी दूरदराज के आदिवासियों खाद्यान्न नहीं पहुंच पाता। यह स्थिति तब है कि हमारी संस्कृति यह कहती है कि भगवान इतना दे कि न तो मैं भूखा रहूं और न ही साधु भूखा जाए। जिनके पास ज्यादा है, वह खाद्यान्न आसानी से जरूरतमंदों तक पहुंचे। इस व्यवस्था के छेद बंद हों। हमारे लिए यह शर्मनाक इसलिए भी है कि एक ओर हम विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहे हैं तो भुखमरी की तालिका में हमारी हालत दयनीय होती जा रही है।

सरकारों को इसकी चिंता शायद इसलिए भी नहीं है, क्योंकि जो भुखमरी से जूझ रहे हैं, उनमें वोट देने की भी ताकत नहीं है। ऐसे में उन्हें भगवान भरोसे ही जीना है। अगर कन्याभोज जैसे आयोजनो में यह संदेश दिया जा सके कि महज धार्मिक रस्म अदायगी और स्त्री के देवी रूप को पूजने के साथ साथ उन भूखे बच्चों के पेट भी भरें, जिनके पास भोजन खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। यह भी मजाक ही है कि राजनीति में सदा उतराते रहने वाले इस देश में लोग अपनी मांगों के लिए मरने तक अनशन करने को तैयार हैं, लेकिन जो व्यक्ति वास्तव में भूखा है, उसे भोजन देने में किसी की ज्यादा रुचि नहीं है।

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