कर्नाटक में मायावती के नेतृत्व में बन रहा तीसरा मोर्चा, कांग्रेस-बीजेपी के लिए आफत

अखिलेश अखिल

सबके अपने अपने दांव हैं और अपने अपने जमात भी। जमात नहीं तो राजनीति नहीं। जमात तैयार तो राजनीति बहुरे। पूरे देश में जहां साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर राजनीति हो रही है वहीँ कर्नाटक में एक नयी राजनीति होती दिख रही है। यह है अपने तरीके की नयी राजनीति। तीसरे मोर्चे की राजनीति। 2019 के चुनाव को लेकर तीसरे मोर्चे की संभावना को लेकर भले ही कई नेता एड़ी छोटी एक कर रहे हों लेकिन कर्नाटक में तो तीसरा मोर्चा साफ़ दिख रहा है। और यह मोर्चा ठीक से घेराबंदी कर दे बीजेपी और कांग्रेस की राजनीति बिगड़ जायेगी।

बता दें कि कांग्रेस-भाजपा से इतर एक नया मोर्चा भी कर्नाटक में बनता दिख रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्यूलर पहले ही मायावती की बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ का फैसला कर चुकी है। अब माना जा रहा है कि वोक्कालिगा और दलित समीकरण में मुस्लिम भी जुड़ सकता है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तिहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने वैसे तो 40 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करने का एलान किया है, मगर सूत्र बता रहे हैं कि जेडीएस-बीएसपी गठबंधन के साथ उनकी बातचीत भी चल रही है। अगर इनका चुनाव पूर्व गठबंधन होता है तो यह कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए खतरा हो सकता है।

बता दें कि राज्य में वोक्कालिगा और पिछड़े वोट बैंक पर जेडीएस का प्रभाव माना जाता है जबकि दलितों पर मायावती का भी प्रभाव है। इस बार बसपा बड़े स्तर पर कर्नाटक में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। मायावती को लग रहा है कि जिस तरह से जातीय ध्रुवीकरण हो रहे हैं वैसे में बसपा के लिए राज्य में संभावना बढ़ गयी है। नए राजनीतिक परिदृश्य में हाल के वर्षों में असदुद्दीन ओवैसी का प्रभाव भी मुसलमानों पर बढ़ा है। ऐसे में अगर ये तीनों नेता एकसाथ आते हैं तो दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के वोट बैंक में सेंध लग सकता है। राज्य में अल्संख्यकों की आबादी करीब 17 फीसदी है, जिसमें 13 फीसदी सिर्फ मुसलमान हैं। दलितों-पिछड़ों की आबादी भी 32 फीसदी है जबकि वोक्कलिगा समुदाय की आबादी भी करीब 17 फीसदी है। ऐसे में मुस्लिम, दलित और पिछड़े वोटों का विभाजन होने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान हो सकता है।

गौरतलब है कि कर्नाटक में फिलहाल कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि जेडीएस बीजेपी की बी पार्टी है। ऐसे में कांग्रेस और जेडीएस के बीच दोस्ती की संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं। वहां कांग्रेस अकेले अपने दम पर जोर आजमाइश में लगी है जबकि जेडीएस अभी भी एक बड़े गठबंधन की कोशिश कर रही है। पिछले दिनों संसद में देवगौड़ा और असदुद्दीन ओवैसी के बीच भी बातचीत हो चुकी है। अगर देवगौड़ा की मुहिम कामयाब होती है तो माना जा रहा है कि यह कांग्रेस के लिए बड़ा झटका हो सकता है। हैदराबाद में जड़ें जमा चुकी एआईएमआईएम पिछले पांच सालों में तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के बाहर भी पांव पसारने की कोशिश करती रही है। महाराष्ट्र विधानसभा में भी इस पार्टी ने दो सीटें जीती हैं। अब पार्टी की नजर पड़ोसी राज्य कर्नाटक के मुस्लिम बहुल इलाकों पर है।

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