कर्नाटक विस चुनाव: इतिहास दोहराने की जुगत में कांग्रेस

बेंगलुरु: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस बार ज्यादा अत्‍मविश्‍वास से भरपूर नजर आ रहे हैं| हो सकता है कि यह विश्वास केंद्रीय नेतृत्व द्वारा उन पर पूरा भरोसा जताने तथा अपने हिसाब से विनिंग कैंडिडेट को विधानसभा टिकट देने की छूट के कारण हो लेकिन इससे भी ज्यादा खास है कि वे पिछले 33 वर्षों के पूर्व इतिहास को पुनः दोहराना चाहते हैं। जब जनता पार्टी की सरकार लगातार दो बार सत्ता में आने में यहां कामयाब रही थी। दूसरी ओर भाजपा है जिसने कांग्रेस के इस नेता को उसी की परंपरागत विधानसभा सीट चामुंडेश्वरी पर हराने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इसे देखते हुए चर्चा है कि मुख्यमंत्री दो स्थानों से एक साथ चुनाव लड़ें| यह सीटें बादामी या बसक्कल्याण हो सकते हैं।

कर्नाटक विधानसभा चुनावों की अब तक की समीक्षा करें तो इन तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि राज्य में 1985 के बाद से किसी भी दल को दो बार लगातार का बहुमत नहीं मिला है| इसी के साथ एक तथ्य यह भी है कि 2013 छोड़कर केंद्र और राज्य दोनों ही स्थानों पर एक ही राजनीतिक पार्टी की सत्ता इससे पहले भी कभी नहीं रही है। उधर, भाजपा की भी कोशिश यही है कि वह राज्य के पूर्व सीएम बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में एक बार फिर 2013 की तरह केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार बनाने का जो उदाहरण पूर्व में कांग्रेस के दौर में देखने को मिला उसे दोहराने में कामयाब हो सके।

कर्नाटक का दिलचस्प राजनीतिक इतिहास

देखा जाए तो अब तक का कर्नाटक चुनाव से जुड़ा इतिहास बेहद रोचक रहा है| 1977 में जब आम चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद उसने केंद्र में सरकार बनाई थी| मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री बने थे| तब ठीक 1978 में यहां विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था| उसे विधानसभा की 224 सीटों में 59 सीटें मिली थीं और कांग्रेस (इंदिरा) ने यहां 149 सीटों पर जीत प्राप्त करते हुए अपनी सरकार बना ली थी| यानि की केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन गई लेकिन राज्य में नहीं बन सकी थी, जबकि आगे 5 साल बाद 1983 में इसके विपरीत यहां का रिजल्ट आया।

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस को 82 सीटों पर सिमट कर रख दिया था और 95 सीटें जीतकर जनता पार्टी के रामकृष्ण हेगड़े ने भाजपा व अन्य राजनीतिक पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने में सफलता हासिल की थी| यह बात अलग है कि इस मिलीजुली सरकार का कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा और सिर्फ 2 साल में ही यहां हेगड़े के नेतृत्व में बनी सरकार पूरी तरह बिखर गई और फिर से 1985 में कर्नाटक राज्य में विधानसभा चुनाव कराए जाने की नौबत आ गई। इस चुनाव में फिर एक बार जनता ने रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी जनता पार्टी को खुलकर अपना समर्थन दिया और स्पष्ट बहुमत की सरकार दी। जनता पार्टी को इस चुनाव में 139 सीटों पर जीत हासिल हुई। कांग्रेस इस दूसरी बार के चुनाव में 65 सीट ही प्राप्त कर सकी, जबकि यह वह समय था जब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी।

1989 के बाद की कर्नाटक राजनीति

इसके आगे का कर्नाटक विधानसभा का सफर देखें तो 1989 में जब यहां चुनाव हुए तो कर्नाटक की जनता ने जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने की दृष्टि से नकारते हुए उसे दूसरे नंबर की पार्टी बना दिया और कांग्रेस को राज्य में सरकार बनाने का अवसर मिला। कांग्रेस के लिए इस सफलता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जहां उसने पिछले चुनावों में 65 सीटें प्राप्त की थीं| 1989 के चुनाव में प्रदेश की जनता ने बंपर वोटिंग करते हुए कांग्रेस की झोली में 178 सीटें उपलब्ध कराई थीं| बड़ा रिकॉर्ड बना| लेकिन संयोग ऐसा था कि इस बार राज्य में जहां कांग्रेस बहुमत में आने में सफल रही तो केंद्र से कांग्रेस की विदाई हो चुकी थी।

आगे जब 1994 में यहां चुनाव हुए तो कांग्रेस को कर्नाटक की जनता ने विधानसभा से बाहर का रास्ता दिखा दिया और पार्टी अपनी सरकार नहीं बचा पाई| उस समय केंद्र में कांग्रेस की पामुलापति वेंकट नरसिंह राव की सरकार थी। यहां इस दौरान हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा के नेतृत्व में 115 सीटें हासिल कर जनता दल (सेक्युलर) सरकार बनाने में कामयाब रही थी। कर्नाटक का राजनीतिक इतिहास इसके आगे यह भी बताता है कि जब 1999 में यहां चुनाव हुए तो फिर एक बार कांग्रेस की सरकार बनी और एचडी देवेगौड़ा की जनता दल एस को कर्नाटक की आवाम ने बाहर का रास्ता दिखा दिया जबकि उस समय में केंद्र में भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी।

कनार्टक विधानसभा चुनावों को लेकर आगे दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस ने 2004 में केंद्र में सत्ता में वापसी की और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनाई लेकिन जब कर्नाटक विधानसभा के लिए चुनाव हुए तो यहां कांग्रेस एक बार फिर पिछड़ गई और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी| कांग्रेस को 65 तथा भाजपा को 82 सीटें मिली| इस समय कांग्रेस ने जनता दल (सेक्युलर) के साथ मिलकर सरकार बनाई| जो राज्य में कांग्रेस की पहली साझा सरकार थी।

2008 के चुनाव में पहली बार भाजपा सरकार

आगे जब 2008 में चुनाव हुए तो भारतीय जनता पार्टी ने यहां 110 सीटें प्राप्त की और अपनी सरकार बनाने में सफलता हासिल की। कह सकते हैं कि यह भाजपा की दक्षिण भारत में पहली बार किसी राज्य में अपने बूते बनी सरकार थी| उस समय में केंद्र में कांग्रेस की सरकार चल रही थी| कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 80 सीटें मिली थीं| इसके बाद जब 2013 में चुनाव हुए तभी वह संयोग था कि केंद्र में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे तो वहीं राज्य में स्वतंत्र सिद्धारमैया की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनी। यानी केंद्र-राज्य में एक ही पार्टी की सरकार| कर्नाटक में वर्षों बाद ऐसा संयोग|

इस तरह यदि 1985 से लेकर अभी तक के कर्नाटक के चुनावी इतिहास को देखें तो सीधे तौर पर यही कहा जाएगा कि दक्षिण के इस राज्य में किसी भी दल को दोबारा बहुमत नहीं मिला है। यदि यह रिकॉर्ड अभी तक किसी के नाम दर्ज भी है तो वह जनता पार्टी की सरकार रही है, लेकिन इस बार कांग्रेस इस रिकॉर्ड को अपने भी नाम दर्ज कराना चाहती है। सिद्धारमैया को केंद्रीय नेतृत्व ने जिस तरह से निर्णय लेने की खुली छूट प्रदान की है उसको देखते हुए कहीं ऐसा भी नजर आता है कि कांग्रेस हो सकता है अपनी सरकार रिपीट करने में सफल हो जाए| उसका यह सपना जो वह पिछले चार दशक से कर्नाटक में देख रही है कि राज्य में उसकी पार्टी की सरकार पुन: बने, हकीकत में ऐसा हो जाए।

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