कहानी करवा चौथ स्पेशल

‘सुनिए जी, अगले महीने करवा चौथ है। आपको याद है ना।’ परिधि ने अपने पति अभिषेक से बड़े प्रेम भरे शब्दों में कहा। ‘पिछली बार आपने वादा किया था कि अगली करवा चौथ पर मुझे साड़ी जरूर दिलवाएंगे। अभी से कह रही हूं, कोई बहाना नहीं सुनूंगी। पिछली बार तो आपने बस चूडिय़ों में ही टाल दिया था।’

‘हां-हां यार, याद है। ले लेना साड़ी, और कुछ।’ अभिषेक ने मुस्कुराते हुए कहा। ‘अब ऑफिस जाऊं, देर हो रही है।’

धीरे-धीरे दिन बीतते गए और करवा चौथ में कुछ ही दिन बचे। एक दिन ऑफिस में कार्य करते हुए अभिषेक के सहकर्मी ने उससे कहा, ‘यार अभिषेक, कल मैं छुट्टी पर रहूंगा। जरा मेरा काम भी देख लेना।’

‘ठीक है, तुम चिंता मत करो। मैं संभाल लूंगा। कहीं जा रहे हो?’ अभिषेक ने पूछा।

‘नहीं भाई, एक हफ्ते बाद करवा चौथ है। तुम्हारी भाभी को साड़ी और कुछ सामान दिलवाना है। तो बस बाजार ही जाना है। औरतों का तो तुम्हे पता ही है, पूरा दिन लगा देती हैं खरीददारी में।’

यह सुनकर अभिषेक को परिधि की बात याद आ गई। वह मन में सोचने लगा कि उसने भी परिधि को साड़ी दिलवाने का वादा किया है। पर पैसे तो हैं नहीं, क्या करूं। अभी वेतन आने में भी काफी दिन हैं। ये त्योहार महीने के आखिर में ही क्यों आते हैं, जब जेब बिलकुल खाली होती है।

शाम को अभिषेक ऑफिस से घर पहुंचा। प्रतिदिन की तरह परिधि ने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला। पर उसकी आंखों में अभिषेक को कुछ प्रश्न दिखाई दे रहे थे, जैसे वो उसे उसका वादा याद दिला रही हो। अभिषेक हल्का सा मुस्कुरा कर अंदर बढ़ गया।

खाना खाकर सीधे सोने चला गया। वह परिधि के सामने आने से बचना चाह रहा था। किन्तु एक घर में रहकर यह संभव कहां? आखिर परिधि उसे पकड़ ही लिया।

‘क्या बात है? बहुत देर से देख रही हूं, नजर बचा-बचा के निकल रहे हो।’

‘नहीं तो, ऐसी कोई बात नहीं है। बस काम की थोड़ी थकान है, और कोई बात नहीं है।’

‘अच्छा, तो यह बताओ अपना वादा याद है या भूल गए गए।’

‘कौन सा वादा?’, ‘साड़ी दिलाने का’, परिधि ने थोड़ा नाराज होते हुए कहा।’ ‘अच्छा साड़ी, ले लेना। अभी तो कई दिन बाकी हैं।’ अभिषेक ने आहिस्ता से कहा।

‘अच्छा दो दिन पहले दिलाओग,े तो कैसे पहनूंगी। साड़ी पहनने के लिए तैयार भी तो करवानी पड़ती है। आजकल तो बुटीक पर कितनी भीड़ होती है। दस-दस दिन में नंबर आता है। आज पैसे दो तो कल ले आऊंगी।’ परिधि तुनक कर बोली।

‘कितने तक की आएगी?’

‘अच्छी साड़ी कम से कम पांच हजार तक की तो होगी ही।’

पांच हजार सुनकर अभिषेक की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे अटक गई।

‘अभी तो पैसे नहीं हैं, एक दो दिन में इंतजाम करता हूं।’ अभिषेक ने परिधि को देखते हुए कहा। परिधि झुंझलाते हुए बोली, ‘आपका हर बार का यही रहता है, जब मैं इतने दिन पहले से कह देती हूं, तो इंतजाम क्यों नहीं कर के रखते।’ इतना कहकर परिधि पैर पटकते हुए चली गई और अभिषेक वहीं खड़ा सोचता रह गया। गलत भी क्या कह गई, हर त्योहार पर उसे केवल आश्वासन के सिवा दिया ही क्या है।

अभिषेक ने कुछ दोस्तों और सहकॢमयों से पैसे उधार देने की बात की, लेकिन त्योहार के कारण सबने असमर्थता जताई। कुछ दिन और निकल गए और करवा चौथ में केवल एक दिन बचा। इस बीच परिधि ने अभिषेक से कुछ कहा भी नहीं। वह भी समझ चुकी थी कि साड़ी के लिए पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया होगा।

करवा चौथ से एक दिन पहले अभिषेक ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था तभी परिधि आ कर बोली, ‘कल करवा चौथ है। साड़ी तो आ गई, कुछ पैसे ही दे दो। श्रृंगार का सामान ही ले आऊंगी।’

‘कितने पैसों में हो जाएगा’ अभिषेक ने पूछा। ‘पंद्रह सौ या दो हजार दे दो। मेहंदी भी लगवानी है। पांच सौ तो एक हाथ पर लगवाने के जाते हैं।’ परिधि ने जवाब दिया।

‘ठीक है शाम को ले लेना। करवा चौथ तो कल है, दिन में सामान ले आना।’ उसने झिझकते हुए कहा, तो परिधि बिफर पड़ी, ‘हां-हां शाम को क्यों कल ही दे देना, वैसे भी मुझे कल कोई और काम तो हैं ही नहीं ना। अपने पैसे अपने पास रखो मुझे नहीं चाहिए।’ कहती हुई परिधि वहां से चली गई।

अभिषेक को उम्मीद थी कि शायद शाम तक किसी तरह से इंतजाम हो जाएगा। भगवान कुछ तो राह निकलेगा ही। यही सोचते हुए वह ऑफिस आ गया। दोस्तों से एक बार फिर पूछा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसी तरह शाम के सात भी बज गए। उसके सहकर्मी घर जाने लगे और वह सोच में डूबा हुआ बैठा था कि एक सहकर्मी ने कहा, ‘अभिषेक क्या बात है, कहां खोये हुए हो? घर नहीं जाना क्या?’

वह एकदम चौंकते हुए बोला, ‘हां बस जा ही रहा हूं।’ बैग और टिफिन उठाकर बाहर निकल आया। मन में हलचल मची हुई थी। परिधि को क्या जवाब दूंगा? कैसे सामना करूंगा उसका?

सोचते-सोचते वह पैदल ही चलता जा रहा था। चलते-चलते उसे एक घंटे के लगभग हो चुका था। वह कहां जा रहा था उसे भी नहीं मालूम था, बस चलता ही जा रहा था। थकान होने पर सड़क किनारे पड़ी एक बेंच पर बैठ गया और खुद के भाग्य को कोसने लगा। क्या लाभ ऐसे जीवन का जो अपनी पत्नी की एक छोटी सी इच्छा भी पूरी ना कर पाऊं। इससे अच्छा तो मर जाऊं, कम से कम उसके तानों से तो बचूंगा। नहीं, नहीं, कल करवा चौथ है। वह मेरी लंबी आयु के लिए उपवास रखेगी। जब उसके सामने मेरा शव जाएगा, तो क्या बीतेगी उस पर। लोग कायर कहेंगे मुझे।

अभिषेक के मन में ये अंतद्र्वंद्व चल ही रहा था कि उसका मोबाइल बजा। देखा तो परिधि का फोन था। उसने अनमने मन से फोन उठा लिया, ‘हैलो, कहां हैं आप? ग्यारह बज गए। घर क्यों नहीं आए अभी तक? आप ठीक तो हैं ना?’

दूसरी तरफ से परिधि घबराते हुए बोले जा रही थी, ‘आप सुन रहे हैं ना, जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं?’

‘वह परिधि, पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया।’ अभिषेक बड़ी मुश्किल से रुआंसे स्वर में बोला।

‘तो घर नहीं आएंगे आप?’ परिधि रोते हुए बोली, ‘आप जल्दी घर आ जाओ बस मैं कुछ नहीं जानती।’ उसका रो-रो कर बुरा हाल था।

‘तुम रोओ मत। मैं थोड़ी देर में घर पहुंचता हूं।’

अभिषेक जैसे ही घर पहुंचा, देखा परिधि चौखट पर खड़ी बड़ी बेसब्री से उसकी राह निहार रही थी। उसकी आंखों में अभी भी आंसू थे, और कुछ अनिष्ट होने की आशंका भी।

अभिषेक को देखते ही वह उससे लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी।

‘माफ करना परी, मैं अपना वादा नहीं निभा पाया।’ अभिषेक ने हौले से कहा।

‘ऐसे क्यों करते हो आप, पैसे नहीं हैं तो घर नहीं आओगे।’ वह रोते हुए ही बोली, ‘आपको मेरी कसम है जो फिर कभी ऐसे मुझे रुलाया तो।’

‘अच्छा बाबा ठीक है, अब रोना तो बंद करो और मुझे अंदर तो आने दो, पड़ोसी देंखेंगे तो क्या कहेंगे।’

‘ठीक है आप हाथ-मुंह धोकर कपड़े बदल लो मैं खाना लगाती हूं।’

खाना खाने के बाद अभिषेक ने उसे पांच सौ रुपए दिए और बोला, ‘ये रख लो, इतने ही हैं मेरे पास। इनमें जो सामान आए ले आना।’

परिधि रुपए लेते हुए बोली, ‘आप से ही तो मेरा साज श्रृंगार हैं आप साथ हैं तो फिर किसी चीज कि जरूरत नहीं। करवा चौथ तो हर साल आएगा। साड़ी का क्या है अगली बार दिला देना।’

तीन सौ उसे वापस करके दो सौ रखते हुए बोली, ‘मेरी चूड़ी, बिंदी वगैरह इतने में आ जाएगी, बाकी आप रख लो। आप को रोजाना ऑफिस जाना होता है यह आपको चाहिए।’

अभिषेक पैसे लेते हुए सोच रहा था यह कितने विशाल ह्रदय की है। कितनी आसानी से अपनी इच्छा को दबा लिया, सिर्फ यह ऐसी है या सभी स्त्रियां ऐसी होती हैं। हां सभी स्त्रियां ऐसी ही होती हैं विशाल ह्रदय की, सहनशील पल-पल अपनी इच्छाओं को मन में दबाती। इनकी दुनिया सिर्फ अपने पति के आस-पास ही सिमटी हुई होती है। अचानक उसकी सोचों को झटका लगा जब परिधि उसे हिलाते हुए बोली, कहां खो गए, इस बार छोड़ दिया, अगली बार बिल्कुल नहीं छोडूंगी। साड़ी ले कर ही रहूंगी अभी से कह देती हूं कोई बहाना नहीं सुनूंगी। इतना कहकर परिधि अपना कम निबटाने रसोई में चली गयी और अभिषेक उसे जाते हुए देखता रह गया।

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