कहानी भारत के उस मंदिर की, जिसके निर्माण में 3 हजार हाथियों ने दिया था योगदान

भारत एक ऐसा देश है जो मंदिरों और तीर्थस्थानों के कारण पूरे विश्व में प्रशिद्ध है। जहा लगभग हर इलाके हर मोहल्ले में कोई न कोई मंदिर देखने को ज़रूर मिल जाता है। जिसकी वजह यह भी है कि भारत के लोग भगवान या ईश्वर को इतना मानते हैं कि, उनके लिए विशाल से विशाल मंदिर बनवाने से जरा भी पीछे नहीं हटते है। इतना ही नहीं आए दिन दान पुण्य करते रहते है। उनका यह काम आज से नहीं बल्कि सदियों से चला आ रहा है।

इस देश में बहुत से ऐसे विशाल मंदिर है। जिन्हे बनाने में काफी साल लग गए है। तो कुछ ऐसे भी है जिनको अनोखे अंदाज़ में बनाया गया है। ऐसा ही एक मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित है। जो अपने वास्तु और शिल्पकलाो के लिए पूरे विश्व में परषिद है। आज के अपने इस पोस्ट में हम आपको तमिलनाडु के तंजौर में स्थित मंदिर के बारे में बताएंगे। जो बहुत ही प्राचीन है। और अपनी खासयत कि वजह से मशहूर है।

आपकी जानकारी के लिए बता दे इस मंदिर का नाम बृहदेश्वर मंदिर है। साथ ही तमिलनाडु के तंजौर में स्थित होने कि वजह से इसे तंजौर के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। जिसका निर्माण सन 1003-1010 ई. के बीच चोल शासक के प्रथम राजा चोल ने करवाया था। उनके नाम पर ही इसे ‘राजराजेश्वर मंदिर’ का नाम दिया गया है। और इसे इस नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जब वो श्रीलंका की यात्रा पर निकले हुए थे। तब उस दौरान मंदिर को बनाने को लेकर उन्हें एक सपना आया था।

आपको बता दे इस मंदिर में भगवान शिव को समर्पित किया गया है। इस मंदिर में कुल 13 मंजिले है, जिसकी ऊंचाई लगभग 66 मीटर है। वैसे आमतौर पर बिना नींव के तो ना ही कोई मकान बनता है और ना ही किसी प्रकार की अन्य इमारत। लेकिन इस विशालकाय मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि, यह बगैर नींव के हजारों साल से अपनी जगह पर खड़ा है। यह एक रहस्य ही बना हुआ है कि, बिना नींव के यह इतने मंज़िलो के कैसे टिका हुआ है।

आपको बताते चले यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाइट से बना हुआ है। दुनिया में यह संभवत: अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है, जो ग्रेनाइट का बना हुआ है। तप वही बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में करीब 1 लाख 30 हजार टन ग्रेनाइट के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इन पत्थरों को अलग-अलग जगह से लाने के लिए 3 हजार हाथियों की मदद ली गई थी। यह मंदिर अपनी भव्यता, वास्तुशिल्प और गुंबद की वजह से दुनियभर में परषिद है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भी शुमार है।

इतना ही नहीं इस मंदिर की एक और ख़ास बात यह है कि इसके शिखर पर एक स्वर्णकलश स्थित है और ये स्वर्णकलश जिस पत्थर पर स्थित है। उसका वजन करीब 80 टन बताया गया है। जो केवल एक ही पत्थर से बना हुआ है। अब इतने वजनदार पत्थर को मंदिर के शिखर पर कैसे ले जाया गया होगा, यह अब तक एक रहस्य ही बना हुआ है। क्योंकि उस समय तो क्रेन तो नहीं होते थे। कहते हैं कि इस गुंबद की परछाई धरती पर नहीं पड़ती। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें... ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper