कांग्रेस अब गठबंधन के सहयोगियों के लिए समस्या बनती जा रही है

नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। महागठबंधन की हार के लिए कांग्रेस को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। पार्टी 70 सीट पर चुनाव लड़कर सिर्फ 19 सीट हासिल कर पाई। ऐसा सिर्फ बिहार में नहीं हुआ है, इससे पहले हुए कई राज्यों के चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा है। कांग्रेस गठबंधन के सहयोगियों के लिए समस्या बनती जा रही है।

विधानसभा चुनाव में हम और वीआईपी जैसे क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर रहा है। चुनाव में पार्टी की जीत का प्रतिशत 27.1 फीसदी रहा, जबकि आरजेडी ने 52.8 फीसदी रहा। राजद ने कांग्रेस को 70 सीट अपनी खुशी से नहीं दी थी, बल्कि कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का दबाव बनाकर यह सीटें हासिल की थी। दूसरे प्रदेशों में भी कांग्रेस का यही रवैया रहा है।

महाराष्ट्र, झारखंड और तमिलनाडु चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस गठबंधन के सहयोगी पर दबाव डालकर अधिक सीट हासिल कर लेती है, पर उसकी जीत का प्रतिशत सहयोगी से कम रहता है। वर्ष 2017 के यूपी चुनाव में कांग्रेस-समाजवादी पार्टी ने यूपी के लड़के के नारे के साथ गठबंधन किया। इन चुनाव में पार्टी 114 में से सिर्फ सात सीट ही हासिल कर पाई।

पिछले साल हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 147 सीट पर चुनाव लड़कर 44 सीट हासिल की, जबकि एनसीपी ने 121 सीटों में से 54 सीट जीती। झारखंड चुनाव में भी कांग्रेस 31 में 16 सीट जीत पाई। जबकि जेएमएम ने 43 में 30 सीट पर जीत दर्ज की। तमिलनाडु में भी कांग्रेस की जीत का प्रतिशत गठबंधन के सहयोगी डीएमके से कम है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रदेश में संगठन कमजोर है। बकौल उनके, ज्यादातर प्रदेशों में पार्टी संगठन की हालत खराब है। यही वजह है कि विधानसभा और लोकसभा में जीत का प्रदर्शन खराब रहता है। जिन राज्यों में पार्टी सत्ता में है या मुख्य विपक्षी दल है, वहां पार्टी नेताओं के आपसी झगड़े किसी से छुपे नहीं है।

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