कांग्रेस का देवाशीष पर दांव-क्या मतदाता देगा भाव?

1989 से लगातार आठ लोकसभा चुनावों में मुंह की खाने के बाद कांग्रेस ने भिण्ड लोकसभा सीट पर सबसे कम उम्र के प्रत्याशी देवाशीष जरारिया को चुनावी समर में उतार कर जीत की जो आस लगा रखी है क्या वे वहां कोई गुल खिलाते हुए कांग्रेस का परचम लहरा पायेंगे। पुरानी पृष्ठभूमि को देखा जाए तो कांग्रेस के लिए भिण्ड में चुनाव जीतना दूर की कौड़ी रहा है। यहां भाजपा की संध्या राय से देवाशीष कड़े चुनावी मुकाबले में उलझे हुए हैं। बहुजन समाज पार्टी के बाबूराम जामोर चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि यह क्षेत्र उत्तरप्रदेश की सीमा से लगा है और यहां बसपा का प्रभाव भी है लेकिन देवाशीष जरारिया भी बसपा के नजदीकी रहे हैं इसलिए चुनाव नतीजों से ही पता चल पायेगा कि जामोर कांग्रेस और भाजपा में से किसके मतों में सेंध लगाते हैं। अट्ठारह उम्मीदवारों के बीच हो रहे घमासान में असली टक्कर कांग्रेस के देवाशीष और भाजपा की संध्या राय के बीच ही हो रही है। लेकिन बाबूराम जामोर भी तीसरा कोण बनने की कोशिश कर रहे हैं। अब देखना यही है कि कांग्रेस ने देवाशीष पर दांव लगाया है और भिंड का मतदाता कितना उन्हे भाव देता है।

भिण्ड फतेह करने के लिए कांग्रेस ने हर बार नये-नये प्रत्याशी को चुनाव मैदान में उतारा लेकिन वह जीतने में सफल नहीं हो पाई, इसलिए अब सबसे युवा नये चेहरे पर उसने दांव लगाया है जो कि ठेठ कांग्रेस पृष्ठभूमि का भी नहीं है। 2009 से यह लोकसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित हो गया है। सर्वाधिक चार बार 1996, 1998, 1999 और 2004 तक भाजपा के डॉ. रामलखन सिंह ने यहां जीत का परचम लहराया, जबकि नरसिंहराव दीक्षित, योगानंद सरस्वती, अशोक अर्गल और डॉ. भागीरथ प्रसाद भी भाजपा टिकट पर यहां से चुनाव जीत चुके हैं। 2009 में भागीरथ प्रसाद कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में भाजपा के अशोक अर्गल से चुनाव हार गये थे लेकिन 2014 में अशोक अर्गल का टिकट काटकर कांग्रेस का टिकट पाये डॉ. भागीरथ प्रसाद को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया और वे 1 लाख 59 हजार 961 मतों के भारी अन्तर से चुनाव जीत गये। इस बार भागीरथ प्रसाद की टिकट भाजपा ने काट दी और वे बेटिकट होकर घर बैठ गये। मुरैना से चार बार और एक बार भिण्ड से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते अशोक अर्गल को यह बात नागवार गुजरी कि एक बार तो कांग्रेस से उम्मीदवार आयातित होने के कारण उनकी टिकट काटी गयी तो दूसरी बार भी उन्हें टिकट से वंचित कर दिया गया। टिकट कटने पर उन्होंने अपनी नाराजगी छिपाई भी नहीं और उसे जाहिर कर दिया था।

कांग्रेस उम्मीदवार देवाशीष जरारिया की समस्या यह है कि उन्हें सवर्ण विरोधी माना जा रहा है और दलित आंदोलन का असर यहां देखने को मिल रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में जहां सवर्णों की नाराजगी का भाजपा पर ज्यादा प्रभाव पड़ा था तो इस बार सवर्णों की नाराजगी कांग्रेस प्रत्याशी देवाशीष को झेलना पड़ रही है। दो अप्रैल 2018 को ग्वालियर-चम्बल संभाग में एट्रोसिटी एक्ट को लेकर जो उग्र आंदोलन हुआ था उसके लिए सवर्ण जातियों का एक बड़ा तबका यह मान बैठा है कि इसके पीछे देवाशीष का ही हाथ था, वहीं दूसरी ओर दलित वर्ग उनमें भविष्य का नया दलित नेता खोज रहा है। जरारिया अपनी नुक्कड़ सभाओं में इसी बात पर अपनी सफाई दे रहे हैं कि दो अप्रैल 2018 को वे दिल्ली में थे। इस प्रकार इस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले आठों विधानसभा क्षेत्रों में अभी भी उस घटना का असर बरकरार है। कांग्रेस के पक्ष में सहकारिता एवं सामान्य प्रशासन मंत्री डॉ. गोविंद सिंह ठाकुरों के प्रभुत्व वाले छत्तीसी और चौरासी इलाकों में जी-जान से जुटे हैं । भाजपा की संध्या राय न तो इस क्षेत्र की हैं और न ही लोग उन्हें जानते हैं केवल उनके पक्ष में सबसे मजबूत मोदी फैक्टर ही माना जा रहा है। भाजपा की संध्या राय पार्टी के स्थानीय नेताओं को लेकर प्रचार कर रही हैं। पूर्व मंत्री और भाजपा के बड़े नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा दतिया से विधायक हैं और इस क्षेत्र में उनकी पकड़ होने का लाभ संध्या राय को मिलता दिख रहा है। भिण्ड व दतिया के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से पांच कांग्रेस, दो भाजपा और एक बसपा के पास हैं। हालांकि पिछला चुनाव भाजपा के डॉ. भागीरथ प्रसाद ने लगभग एक लाख साठ हजार मतों से जीता था तो वहीं विधानसभा चुनाव के बाद परिदृश्य एकदम बदल गया है और कांग्रेस की भाजपा पर एक लाख चौबीस हजार मतों की मजबूत बढ़त हो गयी है। कांग्रेस ने नये युवा चेहरे को इसी उम्मीद से उतारा है कि वह इस बार शायद कुछ करिश्मा कर दे, अब यह तो चुनाव परिणाम से ही पता चलेगा कि कांग्रेस की उम्मीदों पर देवाशीष कितना खरे उतरे।

सुबह सबेरे से साभार

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