कांग्रेस को घेरने के लिए बोफोर्स का जिन्न आने को बेताब

अखिलेश अखिल

लखनऊ ट्रिब्यून दिल्ली ब्यूरो: आजाद भारत में घोटाले की श्रृंखला बड़ी लम्बी है। आज तक ऐसी कोई सरकार नहीं बनी जिसके काल में घोटाले नहीं हुए हों। एक से बढ़कर एक घोटाले। आर्थिक घोटाले के साथ राजनीतिक खेल भी अपने इतिहास रहे हैं। हर राजनितिक दलों में बहेलियों की फ़ौज रही है जिनका काम सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों को उठाना रहा है। सभी दलों में राजनितिक बहेलियें भरे पड़े हैं। चुनाव को अपने फेवर में करने के लिए राजनितिक दल बहेलियों पर जिम्मेदारी डालते हैं और फिर सरकारी नवकर्शाहों को मिलकर खेल शुरू होता है।

आपको बता दें कि आगामी चुनाव को देखते हुए फिर बोफोर्स का मामला सामने आ रहा है। यह मामला हमेशा ही कांग्रेस को डराता रहता है। एक बार फिर से यह जिन्न बाहर निकलने को बेताब है। 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या इस मामले को फिर से खोला जाए या नहीं। बताते चलें कि साल 1987 में यह बात सामने आई थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हासिल करने के लिए 80 लाख डॉलर की दलाली दी थी।

उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 16 अप्रैल 1987 में इसका खुलासा किया। इसे ही बोफोर्स घोटाले के नाम से जाना जाता है। आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताए जाने वाले इटली के व्यापारी ओतावियो क्वात्रोची ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका निभाई थी। इसके बदले में उसे दलाली की रकम मिली थी। कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डॉलर का था।

बोफोर्स स्कैंडल उस समय हुआ जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के रक्षा मंत्री थे। वीपी सिंह ने एक गवाही के दौरान कहा कि क्वात्रोची ने कई बार उनके साथ मिलने का समय मांगा था, लेकि लेकिन क्वात्रोची को कोई अप्वाइंटमेंट नहीं दिया। फिर राजीव गांधी ने उन्हें इटैलियन बिजनेसमैन क्वात्रोची से मिलने के लिए कहा। बोफोर्स स्कैंडल के बारे में खोजी पत्रकारिता के जरिये इंडियन एक्सप्रेस की चित्रा सुब्रमण्यम और द हिंदू के एन. राम ने उजागर किया। साल 1987 में स्वीडिश पुलिस प्रमुख स्टीन लिंडस्ट्रॉम ने 350 से ज्यादा दस्तावेजों को लीक कर चित्रा को दिया था, जिससे उन्हें इस स्कैंडल की रिपोर्ट करने में मदद मिली।

इस सौदे में बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले, जिसे विलेन भी कहा जाता है, वह ओटवियो क्वात्रोची था। वह इटली की एक पेट्रोकेमिकल फर्म स्नैम्पोगेटी का प्रतिनिधित्व करता था। क्वात्रोची गांधी के परिवार का करीबी था और 1980 के दशक में बड़े व्यवसायों और भारत सरकार के बीच शक्तिशाली दलाल के रूप में उभरा। आरोप हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इटली के कारोबारी ओटावियो क्वात्रोची को बचाने के लिए इस कथित घोटाले में रिश्वत की जांच को नरम कर दिया था।

बोफोर्स मामले के 25 साल बाद स्वीडन में बोफोर्स जांच का नेतृत्व करने वाले लिंडस्ट्रॉम ने हाल ही में चित्रा सुब्रमण्यम को एक इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारतीय समकक्षों ने बड़े पैमाने पर मामले में लीपापोती की। लिहाजा यह जिन्न एक बार फिर बाहर निकल आया है।

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