कामदगिरी की परिक्रमा के बिना अधूरी चार धाम की यात्रा

पौराणिक कथाओं में चित्रकूट का कामदगिरी पर्वत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह वह स्थान है जहां भगवान श्रीराम ने अयोध्या के बाद सबसे ज्यादा समय बिताया था। यहां के साधु-संतों का मानना है कि चार धाम की यात्रा करने के बाद कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा किए बिना मनवांछित फल की प्राप्ति नहीं होती।

ऐसी मान्यता है कि 14 वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम ने साढ़े 11 वर्ष कामदगिरी पर्वत के घने जंगलों में ही गुजारे थे। कामदगिरी पर्वत में रहने वाले एक संत एस.गौतम ने बताया कि जब भगवान श्रीराम यहां से जाने लगे तो चित्रकूट पर्वत ने उनसे कहा, “प्रभु आपने तो यहां वास किया है इसलिए अब यह भूमि पवित्र हो गई है लेकिन आपके जाने के बाद हमें कौन पूछेगा।”

इस पर श्रीराम ने उन्हें वरदान देते हुए कहा, “अब आप कामद हो जाएंगे यानी इच्छाओं की पूर्ति करने वाले बन जाएंगे। जो आपकी शरण में आएगा उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और उस पर हमारी भी कृपा बनी रहेगी।” कामदगिरी पर्वत की विशेषता है कि इसके चार प्रमुख द्वार, चार अलग-अलग दिशाओं में हैं। इसके बारे में पूछे जाने पर गौतम ने बताया कि श्रीराम इन्हीं जंगलों में निवास करते थे और यहां से निकलने के लिए उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में एक-एक द्वार बनाए गए थे।

कामदगिरी पर्वत की परिक्रमा करने में लगभग डेढ़ घंटे का समय लगता है और इसकी पवित्रता की वजह से ही हमेशा यहां आने वाले सैलानियों की भीड़ लगी रहती है। दूर-दूर से लोग यहां अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए आते हैं। इस जंगल में हालांकि, बंदरों की संख्या बहुत ज्यादा है लेकिन ये सैलानियों को नुकसान नहीं पहुंचाते।

बुंदेलखंड के इस इलाके में जीविकोपार्जन के साधन बहुत सीमित ही हैं लेकिन कामदगिरी पर्वत आने वाले सैलानियों पर यहां के स्थानीय लोगों की आय निर्भर करती है। पर्वत के चारों तरफ जरूरी सामानों की दुकानें लगाई गई हैं।

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