काश! कलम बन जाए ‘कैंडल मार्च’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा था, ‘किसी पीडि़ता की जगह खुद को रख कर या उसके सगे-संबंधी बनकर सोचते हैं, तो रूह कांप जाती है। देश की कोई भी बेटी हमारी बेटी की तरह है।’ पीएम मोदी की दिल को छू लेने वाली सोच क्या उन 16 महिला पत्रकारों के लिए नहीं है, जो एम.जे. अकबर के जिल्लत भरे कारनामों से आहत हैं। अकबर को बचाव की छाया देकर मोदी देश की आधी आबादी को क्या संदेश देना चाहते हैं?

क्या लगता है कि अकबर के खिलाफ उठ खड़ी हुईं सभी महिलाएं झूठ बोलेंगी? एक हरिश्चंद्र अकबर ही हैं? इनमें वे महिलाएं भी हैं जो अकबर की उम्र से आधी उम्र की थी, जिस समय उनके साथ अकबर ने यौन-दुव्र्यवहार किया था। अकबर ने तो अपने मित्र की बेटी तक को नहीं छोड़ा, जिसकी उम्र घटना के समय मात्र 18 साल थी।

जनमानस में था कि अकबर जब विदेश-यात्रा से लौटेंगे, तो वह मंत्री नहीं रहेंगे। ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ वाली भारतीय जनता पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएगी। लेकिन 97 वकीलों की फौज खड़ी करके अकबर सभी को डरा रहे हैं। तो इसका सीधा अर्थ है कि बतौर ‘बॉस’ उन्होंने कितना डराया होगा? और डराने के लिए उन्हें कहां से प्रश्रय मिल रहा है! पर भूलना नहीं चाहिए कि ‘खूब लड़ी मर्दानी…’ श्रृंखला की महिलाएं अब उठ खड़ी हुई हैं अकबर के खिलाफ।

खिलाफत की तासीर में कलम ‘कैंडल मार्च’ की शक्ल में आ रहे हैं। ये कलम श्रृंखला जुड़ती गई, तो मोदी सरकार के लिए संकट बन जाएगी। अकबर खुद तो डूबेंगे, भाजपा को भी नुकसान पहुंचाएंगे। स्याही विरोध का सैलाब बन रही है। वरिष्ठ पत्रकार निधि राजदान लिखती हैं, ‘एम.जे. अकबर के केस का वकालतनामा पढ़ा। कुछ 97 वकील उनके लिए लडऩे वाले हैं, वह भी अकेली महिला पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ। वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे ने अपने ट्वीट में एक तस्वीर शेयर की है, जिसमें एक बलशाली बैल के सामने कम उम्र की एक मासूम लड़की उससे लडऩे के लिए खड़ी है। मृणाल पांडे लिखती हैं, ‘प्रिया रमानी के खिलाफ एम.जे. अकबर, उनके 97 वकील और ’56 इंच’ भी जोड़ लिया जाए, तो भी वह सवा सौ करोड़ से बहुत कम बैठता है।

‘द हिंदू’ न्यूज पेपर की डिप्टी रेजिडेंट एडिटर सुहासिनी हैदर लिखती हैं, ‘अकबर ने 12 सीनियर पत्रकारों को कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है। सोचिए उन्होंने शिकायतकर्ता इंटन्र्स के साथ क्या व्यवहार किया होगा, जोकि उस वक्त बस कॉलेज पास करके नौकरी में गई थीं।’ लेखिका निलंजना रॉय लिखती हैं, ‘एम.जे. अकबर का इस्तीफा न लेकर नरेंद्र मोदी सरकार ने यह साफ कर दिया है कि यौन उत्पीडऩ और कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा को लेकर इस सरकार का रवैया क्या है?’

एम.जे. अकबर की कानूनी कार्रवाई के कुछ घंटे बाद ही प्रिया रमानी ने कहा, ‘मैं लडऩे के लिए तैयार हूं। सच और सिर्फ सच ही मेरा बचाव है।’ प्रिया का यह कहना उन लोगों को तमाचा है, जो अकबर का बचाव कर रहे हैं या उनका समर्थन कर रहे हैं। क्या हम पुरुष प्रधान दरिंदगी-व्यवस्था की ओर तो नहीं लौट रहे हैं? अकबर को मुकदमा करने की सहूलियत देना आसुरी प्रवृत्तियों का वंदन तो नहीं है!

अकबर ने अपने ऊपर लगे आरोपों को चुनावी एजेंडा बताया है। सवाल सिर उठाता है कि क्या जिन महिला पत्रकारों ने खुद पर हुए यौन उत्पीडऩ की आपबीती पीड़ा बताई है और दुनिया के सामने अपना नाम उजागर किया है, क्या उन्होंने महज एक चुनाव लडऩे के लिए ऐसा किया है? ऐसी सोच पर घिन आती है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि ‘महिला पत्रकारों का माखौल नहीं बनाया जाए।’

लेकिन क्या उन्हें अब यह महसूस नहीं होगा कि उन महिला पत्रकारों का मजाक उड़ाया जा रहा है, अकबर को बचा कर। कानूनी लड़ाई की शुरुआत करके तो अकबर ने केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के उस कदम को ही लंगड़ा कर दिया है, जिस कदम के तहत शिकायतों की पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाने की बात उन्होंने की थी। उस कदम का अब क्या होगा?- जब आरोपी व्यक्ति को ही समिति की जांच पर भरोसा नहीं है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ वालों का दिमाग क्या इतना कुंद हो गया है कि अपने मंत्री को मंत्रिमंडल से बाहर करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं?

आइए आपको एक ‘संयोग’ से रूबरू करा देते हैं, जो लॉ फर्म करंजावाला एंड कंपनी एम.जे. अकबर का केस लडऩे वाली है, वही लॉ फर्म तहलका मैगजीन के पूर्व चीफ एडिटर तरुण तेजपाल का यौन-उत्पीडऩ का केस भी लड़ रही है। सोने पर सुहागा यह है कि करंजावाला एंड कंपनी के मालिक राएन करंजावाला पर भी यौन-उत्पीडऩ के आरोप लग चुके हैं। इस ‘संयोग’ को आंख मूंदकर देखिए। आंखें खोलेंगे तो महिला पत्रकारों का हौसला दिखेगा।

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