कासगंज जल रहा है, आखिर आग कौन बुझाए

अखिलेश अखिल


लखनऊ ट्रिब्यून ब्यूरो: उत्तर प्रदेश का कासगंज जल रहा है। पहले मुज़फ्फरनगर जला था। सहारनपुर भी जला था अब कासगंज की बारी है। कासगंज क्यों जल रहा है इसके बारे असली जबाब तो कासगंज ही दे सकता है। लेकिन कासगंज बोले कैसे ? असली गवाही तो उसी की हो सकती है लेकिन कासगंज कहे किसको और जिनको बोलना है वे बोलते नहीं। बोलेंगे नहीं। धर्म और जातियों में बंटा कासगंज का समाज लगता है अपना ईमान बेच चुका है। किसी का घर जले ,किसी की मौत हो, समाज को कोई मतलब नहीं। इंसानियत मारी गयी है। इंसानियत के भीतर डर समाया है।

बहुत दिन नहीं हुए ज़रा पीछे चले तो गुजरात जलने की भी याद ताजा हो जाती है। याद कीजिये गुजरात दंगे की। कैसे गुजरात जल गया था। सब देखते रह गए,गुजरात बदल गया। याद है ना गुजरात में आये भूकंप की। गुजरात में 2001 में एक भूकंप आया था। भूकंप से राज्य में भारी तबाही हुई थी। लगभग 20 हज़ार लोग मारे गए थे और उस से कहीं ज़्यादा ज़ख़्मी हो गए थे। भूकंप के बाद राहत कार्य सही से न मुहैय्या होने पर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कई सवाल उठे थे। यहाँ तक की उनकी कुर्सी जाने के नौबत आ गई थी। अचानक 2002 में गुजरात दंगों की आग में जल उठा। कैसे जला ,क्यों जला आजतक उत्तर नहीं मिले। हज़ारों अल्पसंख्यक मारे गए, इस दंगे में गुजरात सरकार पर कई सवाल उठे लेकिन वह सरकार चुनाव जीतती रही गयी। दंगे भारतीय राजनीति का पुराना हथियार रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के कासगंज में भी इस समय माहौल गर्माया हुआ है। ख़बरें आ रही हैं कि तिरंगा यात्रा निकालने के दौरान दो समुदायों के बीच हिंसा हो गई। बताते चलें कि इस समय उत्तरप्रदेश की योगी सरकार जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है। राज्य में अपराध की हालत पहले से भी खराब है। जबकि ये यूपी विधानसभा चुनाव का एक बड़ा मुद्दा था। अपराध की राजनीति से यूपी बेहाल है और आलू किसानो की हालत बद से बत्तर। किसान योगी सरकार को कोस रहे हैं।

ऐसे में कासगंज की याद आ रही है। राजनीति की मार कहाँ -कहाँ पड़ती है भला कौन जाने ! कुछ भी हो सकता है। कहते हैं कि कासगंज हिंसा में एक चंदन गुप्ता नाम के युवक की मौत हो गई थी। आरोप है कि एक विशेष समाज ने तिरंगा यात्रा को रोका और आरोप ये भी है कि यात्रा निकालने वालों ने हिन्दू राष्ट्र और भारत में रहना है तो जय श्री राम कहना होगा के नारे लगाए। किसने कहा और किसने नहीं सूना भला कौन बताये। अब हालत ये है कि दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे को ना सिर्फ शक की निगाह से देख रहे हैं वल्कि आरोप भी लगा रहे हैं। गजब का नजारा है। कासगंज जल रहा है।

उत्तर प्रदेश में इस तरह के हालत पहले भी मुज़फ्फरनगर दंगों के दौरान देखे जा चुके हैं। 2014 के आम चुनाव से कुछ महीने पहले दंगों में भी भाजपा के सांसद संगीत सोम पर संगीन आरोप लग चुके हैं। इस दंगे के बाद पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भाजपा का वोट बैंक भी बढ़ा है। जाट समुदाय ने उसे बड़ी तादाद में वोट दिये हैं।इधर राज्य में हिन्दू युवा वाहिनी और बजरंग दल की भी राज्य में पैठ बढ़ी है। पिछले दिनों इन संगठनों ने आगरा पुलिस स्टेशन में घुसकर पुलिस वालों को पीटा था और हाल ही में एक कोर्ट में जाकर लव जिहाद के नाम पर सबके सामने सामने मारपीट की। फिर भी उत्तरप्रदेश में जंगलराज नहीं है क्योंकि ये रामराज्य है।

जंगलराज तब होता जब सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदाय के लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते। अभी हाल ही में राज्य में ये जंगलराज आया था जब सहारनपुर में दलित विरोधी दंगों के विरोध में भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने आवाज़ बुलंद की थी। लेकिन राज्य सरकार ने भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद रावण पर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट लगाकर जेल में डाल दिया और जंगलराज को फिर से ‘रामराज्य’ में बदल दिया गया। उम्मीद है कि अब कासगंज के बाद राज्य सरकार से नाराज़ दलित भी योगी आदित्यनाथ की अगली सभा में जाकर अपने हिन्दू होने का सबूत देंगे। क्योंकि उन्हें भी तो सुरक्षा चाहिए।

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