कासगंज पर मुख्यमंत्री मौन क्यों?

भारत सिंह


लखनऊ ट्रिब्यून ब्यूरो: नौ माह छह दिनों तक रौब से भरपूर रही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के चेहरे पर सातवें दिन दंगे का दाग लग ही गया। यह दाग सूबे के कासगंज में ऐसे दिन लगा जब सारा देश गणतंत्र दिवस के हर्षोल्लास के बीच तिरंगा फहराने में मशगूल था। याद करें, साम्प्रदायिकता का दंश देश को न डसे, साम्प्रदायिक सौहार्द कायम हो, इसी खातिर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने वर्ष 1948 में पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर मौन व्रत रखा था। इस बाबत उन्होंने लिखा भी था, यह 26 जनवरी भारत के स्वतंत्रता दिवस की तरह है। ऐसे वक्त पर सोचता हूं, हम जिस आजादी के लिए लड़े, क्या वह आजादी मिली? देश में साम्प्रदायिक सद्भाव की उनकी कामना, तो पूरी नहीं हुई, अलबत्ता उनके कथन के चौथे दिन ही प्रार्थना स्थल पर उनकी जान ले ली गई थी।

योगी सरकार पर लगा यह दाग, तो कभी नहीं छूटेगा, लेकिन हैरत की बात यह है कि कृषि प्रधान क्षेत्र कासगंज में दंगा कैसे हो गया? यहां के बाशिंदे तो इस तरह तब नहीं उबले थे, जब अयोध्या में राम मंदिर का ताला खोलने का आदेश दिया गया था, या फिर जब बाबरी विध्वंस के बाद हालात बेहद खराब हुए थे। कुल आबादी पर नजर डालें, तो 1,०1,277 में हिन्दुओं की आबादी 76,3०3 के बाद सर्वाधिक 23,228 मुस्लिम हैं। दोनों के बीच जानलेवा, आगजनी, तोड़-फोड़ के ये हालात बन जाना, इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि यहां पर शिक्षा का स्तर भी बहुत ही अच्छा है। कुल औसत साक्षरता 77.36 फीसदी में पुरुष 82.63 फीसदी और महिलाएं 71.51 फीसदी शिक्षित हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखें, तो वहां भी कषैलापन नजर नहीं आता। पहली से लेकर मौजूदा 17वीं विधानसभा चुनाव तक आ जाइए, यहां के बाशिंदों ने किसी भी दल को मायूस नहीं किया है। पहली और दूसरी मर्तबा लगातार यहां की जनता ने कांग्रेस उम्मीदवार को सिर-माथे बिठाया, लेकिन तीसरी बार भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार को गले लगा लिया था। चौथी बार कांग्रेस को मौका दिया, लेकिन पांचवीं बार फिर जनसंघ प्रत्याशी इनके दिलों में समा गया। छठीं बार जनसंघ से किनारा कर लिया और फिर कांग्रेस में विश्वास जताया। सातवीं विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस को धक्का देकर जनता पार्टी को पसंद किया। आठवीं और नवीं में कांग्रेस को मौका दिया, तो दसवीं में नई पार्टी जनता दल में यकीन रोपा। फिर ग्यारहवीं से तेरहवीं तक भाजपा को छोड़ा ही नहीं। बारहवीं विधानसभा के लिए कल्याण सिंह यहीं से चुने गये थे। बाकी के चार चुनावों में बारी-बारी से सपा, बसपा, सपा और भाजपा के हो गये।

ओवर ऑल देखें, तो यहां के अवाम ने सबसे ज्यादा बार भाजपा को ही अपना रहनुमा बनाया है। चार बार सीधे-सीधे, तो दो बार जनसंघ व एक बार जनता पार्टी के तौर पर। और तो और, 2०17 के विधानसभा चुनाव में, तो पड़ोस की पटियाली और अमापुर सीट भी भाजपा की झोली में आयी थी। एटा सांसद राजवीर सिंह पुत्र कल्याण सिंह भी भाजपा के ही खाते में हैं। जब किसान लड़ता नहीं, पढ़े-लिखे भी लोग खूब हैं, राजनीतिक विषाक्तता है नहीं, तो फिर इतना बदनुमा दाग आखिर कैसे लग गया? क्या हिन्दू संगठनों से जुड़े युवाओं की तिरंगा मिश्रित भगवा यात्रा दंगे की जननी है? या फिर मुस्लिम पक्ष, जो स्वयं भी तिरंगा फहराने की तैयारी में था, उससे कुछ गड़बड़ हुई? या फिर जिस जगह पर मुस्लिम तिरंगा फहराना चाह रहे थे, वहां पर पहुंची तिरंगा यात्रा को लेकर रास्ते के लिए हुआ विवाद दंगा का कारण बना? वैसे तो दंगे के पीछे राजनीतिक विषाक्तता के कीटाणु की गुंजाइश कम ही है, फिर भी इस कोण से भी जांच होनी चाहिए कि कहीं कासगंज नगरपालिका चेयरमैन के चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी की हार में ये तो नहीं छिपे?

फिलहाल, पूरी सच्चाई, तो मजिस्टि्रयल जांच के बाद ही सामने आएगी, लेकिन एक युवक की गोली लगने से मौत और एक युवक का गोली से घायल होना, यह तो साफ ही बयां कर देता है कि दोनों तरफ से बांहें चढ़ी थीं। जांच के दौरान यह भी जांचा जाएगा कि पहल किस तरफ से हुई। घटना के दूसरे दिन की पहल पर से तकरीबन पर्दा उठ ही चुका है कि चंदन उर्फ अभिषेक गुप्ता की मौत के बाद आक्रोश में आये हिन्दू बेकाबू हो गये थे। संभवत: भगवा सरकार होने के ही कारण भय वश पुलिस प्रशासन इन्हें काबू करने में सख्त नहीं हो पाया। लिहाजा, हालात दो दिनों तक और बिगड़े रहे। वैसे सरकार ने, पहले की सरकारों की तरह, वहां के पुलिस अधीक्षक को हटाकर साफ कर दिया है कि वह कानून-व्यवस्था में ढिलाई कतई बर्दाश्त नहीं करेगी।

यूं तो मुख्यमंत्री कानून-व्यवस्था को लेकर 19 मार्च, 2०17 को पदारूढ़ होने के वक्त से ही सख्त दिखे हैं, लेकिन बीच-बीच में सुरक्षा व्यवस्था में झोल भी दिखी है। हाई सिक्योरिटी जोन में स्थित विधान भवन आदि के सामने सड़क पर आलू फेंके जाने की घटना हो, या लखनऊ के कुछ क्षेत्रों में ताबड़-तोड़ डकैतियां व कुछ अन्य जिलों में हिंसक वारदात हों, ने पुलिस प्रशासन की कलई खोली है। सुलखान सिंह के बाद डीजीपी पद पर तैनाती में तकरीबन तीन सप्ताह गुजर जाना भी सुरक्षा व्यवस्था की कसावट में कमी को ही दर्शाता है।

दंगों के परिप्रेक्ष्य में अगस्त 2०17 की आठ तारीख भी याद आती है। उस तारीख को लोकसभा में गृह मंत्रालय की तरफ से देशभर में हुए दंगों का आंकड़ा सामने आया था। इसमें उत्तर प्रदेश के भी आंकड़े थे। आंकड़े चार वर्षों 2०14, 2०15, 2०16 और मई 2०17 तक के थे। इन वर्षों में उत्तर प्रदेश में वर्षवार क्रमश: 133, 155, 162 और 6० घटनाओं का उल्लेख था। यह भी बताया गया था कि इन वर्षों में क्रमानुसार 26, 22, 29 और 16 लोगों की जानें गई थीं। तब मुख्यमंत्री ने कहा था कि उनके कार्यकाल में, तो दंगे हुए नहीं, ये तब की सरकार के समय के हैं। साथ ही दावा भी किया था कि उनकी सरकार दंगों से बेदाग रहेगी क्योंकि उनकी सरकार ने कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त कर रखा है। अब जबकि, उनके कार्यकाल के 1०वें महीने में सातवें दिन ही दंगा हो गया, मुख्यमंत्री का न केवल दावा टूटा है बल्कि इस दंगे ने उन्हें चुप भी करा दिया है। हालांकि गर्वनर राम नाईक ने कह ही दिया है कि जो कासगंज में हुआ वो किसी को भी शोभादायक नहीं है। वहां जो घटना हुई, वो यूपी के लिए कलंक के रूप में हुई है। सरकार उसकी जांच कर रही है। सरकार ऐसे कदम उठाये कि फिर से ऐसा न हो।

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