कुर्सी छीनते ‘लिफाफे’ और ब्राउन एनवलप जर्नलिज्म…!

वजन में हल्के लिफाफे की ताकत इतनी है कि लिफाफे के साथ वीडियो वायरल होते ही मध्यप्रदेश में एक आला पुलिस अफसर की कुर्सी छिन गई। ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के पद पर तैनात इन जनाब का ‘लिफाफा लेते हुए’ चार साल पुराना एक वीडियो वायरल हो गया था। ‘लिफाफा लेना’ जुमले में ही इसकी मंशा और अमल भी छुपा है। हालां‍कि राज्य के परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने कहा है कि लिफाफे में क्या है, इसकी जांच कराई जाएगी। लेकिन यह सवाल भी वैसा ही मासूम है जितना कि फिल्म खलनायक का गीत कि ‘ चोली के पीछे क्या है ?’

लिफाफा अरबी भाषा का शब्द है, जो भारतीय संस्कृति में पूरी तरह रच बस गया है। संस्कृत में इसके लिए क्या शब्द है, कहना मुश्किल है, क्योंकि लिफाफे के साथ लेन-देन का जो व्यवहार जुड़ा है, वह इस देश में पहले ऐसा नहीं रहा होगा। लिफाफा शब्द का अर्थ ही है आवरण या खोल। यह इसलिए कि इसमें कुछ रखा या छिपाया जा सके। यूं कुछ साल पहले तक लिफाफे का इस्तेमाल पत्र और राखियां भेजने के लिए किया जाता था। लेकिन अब लिफाफों में सरकारी नोटिस ही ज्यादा आते हैं। अलबत्ता लोक व्यवहार में लिफाफों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल दो नंबर की अर्थव्यवस्था और कार्यव्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा भी है। लिफाफे नजराने के तौर पर दिए जाते हैं या फिर शुकराने के तौर पर। काम कराने के लिए दिया जाने वाला लिफाफा ‘नजराना’ तो काम हो जाने के बाद दिया जाने वाला ‍लिफाफा ‘शुकराने’ के रूप में होता है। पहले मामले में रकम एडवांस हो सकती है तो दूसरे में तयशुदा फुल पेमेंट।

लिफाफो का पत्रकारिता से भी करीबी रिश्ता रहा है। गंभीर और जिम्मेदार पत्रकारिता से इतर पत्रकारिता की दुनिया में आजकल दो शब्द चलन में हैं- रेड एनवलप जर्नलिज्म और ब्राउन एनवलप जर्नलिज्म। यानी लाल लिफाफा पत्रकारिता और ब्राउन ( भूरा) लिफाफा पत्रकारिता। दोनो का सम्बन्ध मन मुताबिक खबरें छपवाने, किसी को ब्लैकमेल करने लिफाफे में रखकर नकद नारायण भेंट करने से है। रेड लिफाफा जर्नलिज्म जैसा शब्द चीन और पूर्वी एशिया में ज्यादा प्रचलित है। कहते हैं कि चीन में भ्रष्ट पत्रकार लाल रंग के लिफाफे में ही नकदी लेना पसंद करते हैं। वैसे चीन में लाल लिफाफा विशेष अवसरों पर भेंट स्वरूप देने की परंपरा है। आम तौर पर इसमें रखी राशि पूर्णांकों में होती है, जो हमारी भारतीय परंपरा जैसे 51 या 101 रू. से थोड़ी हटकर है। विएतनाम में ‘लिफाफा संस्कृति’ का अलग महत्व है। वहां लिफाफों का इस्तेमाल चिट्ठियां भेजने से ज्यादा ‘लकी मनी’ के रूप में रिश्वत देने के लिए होता है। विएतनाम में तीन साल पहले एक अजब आर्थिक घटना घटी। देश के 90 हजार से ज्यादा कारोबारियों ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया। लेकिन उसी साल देश की जीडीपी 7 फीसदी बढ़ गई, जो तब तक दशक की सर्वाधिक वृद्धि थी। इसका अर्थ यही निकाला गया कि देश में बड़े पैमाने पर लेन देन ‘लिफाफा संस्कृति’ के तहत हुआ।

एक शब्द और है,- ब्राउन एनवलप जर्नलिज्म। इसे संक्षेप में बीइजे भी कहते हैं। हिंदी में कहें तो -भूरी लिफाफा पत्रकारिता। भारत में इसकी पुरानी परंपरा है। पत्रकारों और खासकर अंशकालिक पत्रकारों से मन मुताबिक खबर लिखने या रूकवाने के लिए लिफाफों में रखकर नोट बांटना कोई छुपा रहस्य नहीं है। कई ‘प्रोफेशनल’इसके बगैर खबर लिखने पर विचार भी नहीं होता। आजकल नकदी लेन- देन जरा कम हुआ है, बावजूद इसके जहां काम आवै नकद, कहा करे डिजी पेमेंट? पत्रकारिता में इसे ‘ब्राउन जर्नलिज्म’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह येलो जर्नलिज्म से ( पीत पत्रकारिता) से इस मायने में अलग है कि यहां लिफाफा एडवांस ही ले लिया जाता है, जबकि येलो जर्नलिज्म में खबर लिखकर ( या ‍दिखाकर भी) भी मुंहमांगी रकम मांगी जाती है। न देने पर सम्बन्धित व्यक्ति या संस्था को बदनाम करने का कोई एंगल नहीं छोड़ा जाता। हालां‍कि ‘येलो जर्नलिज्म’ की तरह ‘ब्राउन एनवलप जर्नलिज्म’ शब्द बहुत पुराना नहीं है। इस शब्द का पहला प्रयोग ब्रिटेन की संसद ‘हाउस आॅफ काॅमन्स’ में एक राजनीतिक घोटाले के संदर्भ में 1994 में वहां के नामी अखबार ‘गार्जियन’ ने किया था। दरअसल वहां एक मशहूर डिपार्टमेंटल स्टोर के मालिक ने ब्रिटिश सांसद मोहम्मद अल फायद को संसद में एक सवाल पूछने के लिए ‘माल’ जिस लिफाफे में दिया गया था, उसका रंग ‘ब्राउन’ था, तबसे ब्राउन जर्नलिज्म शब्द चलन में आया। भारत ही क्यों दुनिया के कई मुल्कों में यह संस्कृति काफी फल- फूल रही है। अफ्रीकी देश नाइजीरिया में यह संस्कृति इतनी ‘लोकप्रिय’ हुई कि इसको अनैतिक बताते हुए नाइजीरियन पत्रकार संघ को बाकायदा आचार‍ ‍संहिता बनानी पड़ी। वैसे कई देशों में ब्राउन जर्नलिज्म को ‘पब्लिक रिलेशन’ का जरूरी हिस्सा माना जाता है। मैसेज ये ‍कि ‘फोकट’ में कोई काम नहीं होता। लेकिन इस ब्राउन ‍िलफाफा जर्नलिज्म ने पत्रकारिता की चौथा स्तम्भ होने की परिभाषा को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसके तहत फर्जी, अपुष्ट खबरें छपवाई और चलवाई जाती हैं।

आजकल इस शब्द का स्थान अब एटीएम जर्नलिज्म भी लेता जा रहा है।
लिफाफा सिर्फ कुछ देने या भेजने के ही काम नहीं आता। पिछले साल दिल्ली में लुटेरों का एक ‘लिफाफा गैंग’ पकड़ा गया था। ये गैंग खुद को बैंक अधिकारी बताकर जिसको लूटना होता था, उससे पहले 2 रू. मांगकर उसे एक पीला लिफाफा थमा देता था। इसके बाद सम्बन्धित व्यक्ति से लूटा गया पैसा उसी लिफाफे में रखने को कहा जाता था।

वैसे लिफाफे प्रेम पत्र भेजने के लिए भी इस्तेमाल किए जाते रहे हैं। ‘गुलाबी ‍िलफाफा’ अपने रंग के कारण उसमें रखे पत्र में ‍निहित प्रेम भावना को भी प्रतिबिम्बित करता है। शायद इसीलिए मुहावरा चलन में आया कि ‘लिफाफा देखकर मजमून भांप लेना।‘ पारखी आंखें बंद लिफाफे के वजन, जज्बे और रकम को भी ठीक से भांप लेती हैं। लेकिन ‘लिफाफा खुल जाने’ का मतलब सम्बन्‍धित व्यक्ति की कलई खुल जाने से है।

ट्रांसपोर्ट ‍कमिश्नर मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ है। वहां लिफाफा देने के हाव-भाव से ही समझ लिया गया है ‍कि लिफाफे में क्या दिया जाना होगा और क्या दिया गया है। चूंकि मामला परिवहन विभाग का है, इसलिए बंद लिफाफे में इश्किया शायरी तो लिखकर नहीं ही दी गई होगी। यहां लिफाफा देना शुद्ध रूप से एक सांसारिक कर्म है, जिसका साक्षात स्वरूप नगद नारायण हैं। वो ही ट्रांसपोर्ट जैसे विभागों में पोस्टिंग और ट्रांसफर के नियंता भी हैं। चूंकि लक्ष्मी को चंचला भी कहा जाता है, इसलिए वह बंद लिफाफों के माध्यम से सतत प्रवहमान और हस्तांतरित होती रहती है। इस हिसाब से आला पुलिस अफसर ने जो किया, वो लिफाफा संस्कृति के अनुरूप ही था। क्योंकि ‍िबना ‘मनी’ के एनवलप की हैसियत ‘आॅफ लाइन’ गेम खेलने की है।
आजकल डिजीटल पेमेंट के जमाने में लिफाफों की अहमियत जरा घट गई है। लेकिन रिश्वत और मोहब्बत दो ऐसे डोमेन बचे हैं, जहां लिफाफे अभी भी थोड़ी बहुत प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। इसलिए भी कि जो माल लिफाफों में बंद होकर आता है, उसका जलवा और अहसास ही कुछ और ही है। इसे समझने और देखने के लिए सौदेबाज ‍जिगर और शायर की नजर चाहिए। शायर मोहम्मद अल्वी ने शायद यही सोच कर ये शेर लिखा होगा- अंधेरा है कैसे तिरा ख़त पढ़ूं,
लिफाफे में कुछ रोशनी भेज दे… ।

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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