कैसे हुई थी भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु, महाभारत काल से जुड़ा इसका रहस्य

नई दिल्ली, हर कोई जानता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कैसे हुआ, कैसे उन्होंने अपना जीवन जिया, कैसे मधुरा की नगरी के बाद उन्होंने द्वारिका नगरी बसाई, कैसे उन्होंने महाभारत में अर्जुन का साथ दिया, लेकिन आप ये नहीं जानते होंगे कि भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई। उनके शरीर का दाह संस्कार किसने किया। इस सवाल का जवाब हर कोई जानना चाहता है कि आखिर कैसे हुई थी भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु। चलिए आपको बताते हैं कि इसका रहस्य कैसे महाभारत काल से जुड़ा है। सबसे पहले जान लें कि जब भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई थी तब उनकी आयु 125 साल थी।

ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 3112 ईसा पूर्व में हुआ था। श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था, लेकिन उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगांव, बरसाना आदि जगहों पर रहे हैं। हिंदू ग्रंथों के अनुसार कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने कम से कम 36 सालों तक द्वारिका नगरी पर राज किया। इसके बाद उन्होंने अपना देह त्याग दिया और उनकी मृत्यु का ये महाभारत काल से जुड़ा है।

बताया जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद जब दुर्याोधन का अंत हुआ तो उनकी माता गांधारी बहुत दुखी हो गई थीं। वो अपने बेटे की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए रणभूमि में गई थी। उस वक्त उनके साथ भगवान श्रीकृष्ण और पांडव भी थे। उस वक्त गांधारी अपने बेटों की मृत्यु से इतनी दुखी हुईं थी कि उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को 36 सालों के बाद मृत्यु का शाप दे दिया था। गांधारी के मुंह से ये शाप सुनने के बाद पांडव चकित रह गए थे, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण जरा भी विचलित नहीं हुए और मुस्कुराते हुए अपने ऊपर लगे शाप को स्वीकार कर लिया और ठीक इसके 36 सालों के बाद उन्होंने अपना देह त्याग दिया।

बताया जाता है कि उनकी मृत्यु एक शिकारी के हाथों हो गई। दरअसल, भागवत पुराण के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण के पुत्र सांबा को एक शरारत सूझी। वो एक स्त्री का वेश धारण कर अपने दोस्तों के साथ ऋषि-मुनियों से मिलने गएं। स्त्री के वेश में सांबा ने ऋषियों से कहा कि वो गर्भवती है, जब उन यदुवंश कुमारों ने इस प्रकार ऋषियों को धोखा देना चाहा तो वो क्रोधित हो गए और उन्होंने स्त्री बने सांबा को शाप दिया कि तुम एक ऐसे लोहे के तीर को जन्म दोगी, जो तुम्हारे कुल और साम्राज्य का विनाश कर देगा। ऋषियों का शाप सुनकर सांबा बहुत डर गए।

उन्होंने तुरंत ये सारी घटना जाकर उग्रसेन को बताई, जिसके बाद उग्रसेन ने सांबा से कहा कि वे तीर का चूर्ण बनाकर प्रभास नदी में प्रवाहित कर दें। इस तरह उन्हें उस शाप से छुटकारा मिल जाएगा। सांबा ने सब कुछ उग्रसेन के कहे अनुसार ही किया। साथ ही उग्रसेन ने ये भी आदेश पारित कर दिया कि यादव राज्य में किसी भी प्रकार की नशीली सामग्रियों का ना तो उत्पादन किया जाएगा और ना ही वितरण होगा। कहा जाता है कि इस घटना के बाद द्वारका के लोगों ने कई अशुभ संकेतों का अनुभव किया, जिसमें सुदर्शन चक्र, श्रीकृष्ण का शंख, उनका रथ और बलराम के हल का अदृश्य हो जाना शामिल है।

इसके अलावा वहां अपराधों और पापों में बढ़ोतरी होने लगी। द्वारिका में चारों ओर अपराध और पाप का माहौल व्याप्त हो गया। ये देखकर श्रीकृष्ण बहुत दुखी हो गए और उन्होंने अपनी प्रजा से ये जगह छोड़कर प्रभास नदी के तट पर जाकर अपने पापों से मुक्ति पाने को कहा। उनकी बात को सबलोग मानकर प्रभास नदी के तट पर गए, लेकिन वहां जाकर सभी मदिरा के नशे में चूर हो गए और एक दूसरे से बहस करने लगे। इसके बाद उनकी बहस ने लड़ाई का रूप धारण कर लिया और वो आपस में ही लड़ने-मरने लगे। इस तरह आपस में ही लड़कर सभी लोग मारे गए।

भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण एक दिन एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे, तभी जरा नामक एक बहेलिए ने श्रीकृष्ण को हिरण समझकर दूर से उनपर तीर चला लिया, जो उनके पेर में जा लगा, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। बता दें कि ऋषि द्वारा कृष्ण के पुत्र सांब को दिए शाप के अनुसार श्रीकृष्ण को लगे तीर में उसी लोहे के अंश थे, जो सांब के पेट से निकला था और जिसे उग्रसेन ने चूर्ण बनवाकर नदी में प्रवाहित करा दिया था। इस तरह ऋषि के शाप के अनुसार समस्त यदुवंशियों का नाश भी हो गया था और गांधारी के शाप के अनुसार महाभारत के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण के 36 साल भी पूरे गए थे।

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