कोरोना काल में फिर ‘स्वदेशी’ और अपने हाथों पर भरोसे की बात…

कोरोना संकट में चीन से घटिया रैपिड टेस्ट किट्स की खरीदी, इस पर मचे बवाल के बाद मोदी सरकार द्वारा सौदा रद्द करने का ऐलान और फिर ऐसे ही किट्स भारत में सस्ती दर पर बनाने की बात ने देश में एक बार फिर स्वदेशी और ‘मेक इन इंडिया’ की बहस को गर्मा दिया है। सवाल यही उठ रहा है कि ऐसी वस्तुएं भी हम बाहर से क्यों मंगवा रहे हैं? इन्हें देश में ही क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सके? राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने वीडियो बौद्धिक वर्ग में कोरोना के संदर्भ में जो बातें कहीं थीं, उनमें एक अहम मुद्दा स्वदेशी और जैविक कृषि का भी था, लेकिन तब्लीगी जमात के हल्ले में उस पर चर्चा नहीं हुई। स्वदेशी और ग्रामोदय की बात सबसे पहले महात्मा गांधी ने की थी। क्योंकि वे भारत की आत्मा और उसकी तासीर को समझते थे। गांधीजी आत्म निर्भर ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के पक्षधर थे। क्योंकि वो जानते थे ‍कि गांव का व्यक्ति पारंपरिक अथवा कोई नया हुनर सीखकर गांव में ही काम करेगा तो उसे रोजगार की तलाश में दूसरी जगह भटकना नहीं पड़ेगा। हमारे देश में बहुत बड़ी तादाद ऐसे कारीगरों की है, जिनके पास पारंपरिक हुनर है लेकिन उसे कारोबार के रूप में विकसित करने के लिए वित्तीय संसाधन नहीं है। हैं तो उत्पादित वस्तुअों के लिए बाजार नहीं है। बाजार है तो सम्बन्धित कारीगरी में नए ट्रेंड्स और तकनीक की जानकारी उन्हें नहीं है। जाहिर है कि ऐसे लोगों को स्थानीय स्तर पर सही ढंग से आधुनिक तकनीक की मदद से आवश्यक ट्रेनिंग दी जाए तो ये अपना काम खुद कर सकते हैं। नौकरियों के पीछे भागने की उन्हें जरूरत नहीं होगी।

कोरोना काल का एक बड़ा सबक यह है कि अब केवल नौकरियों के भरोसे जिंदा नहीं रहा जा सकता। जिसके पास अपना थोड़ा बहुत हुनर होगा, वह किसी तरह इस आर्थिक संकट से पार पा सकता है। हमारे देश में कारीगरों को ट्रेंनिग, रोजगार, वित्तीय मदद और समुचित बाजार उपलब्ध कराने की बात काफी समय से होती रही है। इस दिशा में सरकारों ने कई कदम भी उठाए हैं। लेकिन अपेक्षित नतीजे अभी भी दूर हैं। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद अलग से कौशल विकास विभाग बनाया ताकि लोग कुछ न कुछ कौशल (स्किल) सीख कर स्वयं अपना रोजगार या छोटा-मोटा कारोबार शुरू करें। आंकड़ों के लिहाज से इस विभाग ने काफी काम किया, लेकिन उसका व्यावहारिक लाभ कितना हुआ, यह विवाद का विषय है। अगर हम प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के ताजा आंकड़ों को देखें तो बीते 6 साल में देश में 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को कौशल विकास का प्रशिक्षण देने का प्लान था। लेकिन इनमें से कितने लोग कुशल बने और कितने ने अपना काम शुरू किया, इसकी ज्यादा जानकारी नहीं है। गौरतलब बात यह है कि हमारे देश में विभिन्न ट्रेड्स के हुनरमंद कारीगरों की संख्या करीब 70 लाख है। इसका अर्थ यह है कि करीब साढ़े तीन करोड़ लोगों का पेट अलग अलग तरह की कारीगरी के भरोसे ही भरता है।

अगर मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां भी कौशल विकास को बढ़ावा देने की बात काफी होती रही है। लेकिन इस दिशा में जितना काम होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। अपने पिछले कार्यकाल में शिवराज सरकार ने तीन साल पहले राज्य में कारीगर आयोग गठित करने का फैसला किया था। इस बाबत गजट अधिसूचना भी जारी हो गई थी। लेकिन आगे क्या हुआ, किसी को नहीं पता। अब उसी काम को आगे बढ़ाने पर विचार होना चाहिए। 29 जून 2017 को जारी इस अधिसूचना में कहा गया था कि राज्य में तीन सदस्यीय कारीगर आयोग गठित होगा। इसका मकसद कारीगरों के विकास के लिए संचालित योजनाअों का मूल्यांकन, उनकी समस्याअोंको चिन्हित करना, कारीगरों की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक समस्याअों से सम्बन्धित विषयों का अध्यजयन, अनुसंधान करना व सुधार के लिए सुझाव देना था।

यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रामोदय की इसी संकल्पना के संदर्भ में शिवराज सरकार को मप्र चर्मोद्योग संघ के तत्कालीन अध्यक्ष श्यामराव पेंढारकर ने एक पायलट प्रोजेक्ट भी सरकार को सौंपा था। इसमें कहा गया था कि कोई भी कार्य बिना‍ वित्तीय सहायता के संभव नहीं है। स्वरोजगार के क्षेत्र में नव उद्यमियों के पास तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान का अभाव तथा उनका वित्तीय संस्थाओं के मापदण्ड पर खरा न उतरना का एक मात्र कारण है। इसी कारण प्रदेश में लघु उद्योग स्थापित नहीं हो पा रहे हैं। प्रोजेक्ट में साफ तौर पर कहा गया था कि आज गांवों में ही पारंपरिक प़द्धति तथा आधुनिक तकनीकी की मदद से व्यवहारिक एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण की जरूरत है, जो कर्इ दृष्टिकोण से लाभकारी है। इसका उद्देश्य यही था कि युवाअोंको गांव में ही रोजगार ‍िमल सके। उनके द्वारा तैयार उत्पादों को स्थानीय रूप से बाजार मिल सके। प्रोजेक्ट में चर्मकारी, माटीशिल्प, बांस शिल्प, बुनकरी आदि चुनिंदा विधाअों में प्रशिक्षण देने का प्रावधान था। ये प्रशिक्षण अव्धि तीन माह की होती।

यहां मूल मुद्दा यही है कि कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार की बात तो बहुत होती है, लेकिन उस दिशा में अपेक्षित गंभीरता और संकल्पशक्ति के साथ काम नहीं हो पाता। छिंदवाड़ा में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कई नामी कंपनियों के सहयोग से स्थानीय स्तर पर युवाअो को उन ट्रेड्स में कौशल प्रशिक्षण देने का काम शुरू करवाया, जिनकी जरूरत उद्दयोगों को पड़ती है। इनमें से बहुत से काम अत्यधिक कौशल वाले भी हैं। लेकिन व्यापक पैमाने पर ऐसे कौशल प्रशिक्षण की जरूरत है, जिसे अर्जित करने पर स्थानीय स्तर ही आसानी से काम मिल सके, अपना काम किया जा सके।
आज कोरोना संकट के चलते स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर मास्क बनाने, सेनिटाइजर तैयार करने, सस्ते टेस्ट‍ किट्स बनाने, वाजिब कीमत और गुणवत्ता वाले पीपीई तैयार करने का काम हो रहा है। लेकिन इसे संस्थागत रूप देने की जरूरत है। क्योंकि इनमें से कुछ चीजें तो उत्तर कोरोना काल में भी जरूरी होंगी। एक सबक इस बात का भी लिया जाना चाहिए कि चीनी माल पर आंख मूंद कर भरोसा न किया जाए। वहां की कंपनियों ने घटिया माल भी हमे दोगुनी कीमत में थमाया। हालांकि सरकार कह रही है कि उसने कंपनी कोई भुगतान नहीं किया है, लेकिन लोगों का विश्वास तो डिगा ही है। कहने का आशय यह है कि स्वदेशी और स्थागनीयता को महत्व केवल जुमलेबाजी तक सीमित न रहे। जिन क्षेत्रों में हम इसे लागू कर सकते हैं, वहां यह पूरी ताकत से लागू किया जाना चाहिए। हमे अपने लोगों के हाथ और कौशल पर ज्यादा भरोसा करना चाहिए और इसके लिए जरूरी नीति तैयार कर उस पर अमल होना चाहिए। वैसे भी यह कोई राजनीतिक शोशेबाजी नहीं है। करोड़ों लोगों के पेट से जुड़ा मामला है।

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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