कोरोना खौफ से बेअसर आला अफसर, भ्रष्ट कारोबारी व नेता

लॉकडाउन के इस कठिन दौर में देश का गरीब जीने के लिए संघर्ष कर रहा है, तब देश के रईस और आला अफसर क्या कर रहे हैं? महाराष्ट्र से जो खबर आई है, वह इस बात का प्रमाण है कि कई आर्थिक घोटालों का आरोपी वाधवान परिवार कोरोना समय में भी महाबलेश्वर में पिकनिक मनाने पहुंचा और राज्य के एक आला पुलिस अफसर ने इस ‘नेक’ काम में उसकी मदद की। यह मामला उजागर होने के बाद राज्य सरकार ने इसकी जांच के आदेश दिए तथा सम्बन्धित अफसर को जबरिया छुट्टी पर भेज दिया। उधर राज्य की कोरोना प्रभावित राजनीति को मानो नई ‘हाइड्रोक्लोरोक्वीन’ मिल गई। विपक्ष में बैठी भाजपा ने इसके लिए तत्काल उद्धव ठाकरे सरकार को घेरते हुए आरोप जड़ा कि वह गंभीर आर्थिक घोटालों के आरोपी वाधवान परिवार को बचा रही है। भाजपा ने ह मंत्री अनिल देशमुख से इस्तीफा मांगा है।

पहले ही मुख्‍यमंत्री की अपनी कुर्सी बचाने में लगे ठाकरे के लिए यह नई मुसीबत है। वैसे वाधवान प्रकरण की आड़ में भाजपा का असल निशाना दरअसल ठाकरे कम कांग्रेस और गांधी परिवार ज्यादा है क्योंकि वाधवान परिवार का नाम येस बैंक और डीएचफएल घोटाले से जुड़ा है। वाधवान के रिश्ते येस बैंक के पूर्व एमडी राणा कपूर से हैं और राणा कपूर ने प्रियंका गांधी से स्व. राजीव गांधी की एक पेंटिंग 2 करोड़ रू. में खरीदी थी, उसकी भी जांच चल रही है। इस बीच सतारा पुलिस ने कपिल वाधवान और उनके परिवार से जुड़े 22 लोगों के खिलाफ लॉकडाउन के नियम तोड़ने पर केस दर्ज किया है। उन्हें एक स्कूल में क्वारेंटाइन कर दिया गया है।

ये मामला एक भ्रष्ट कारोबारी, आला अफसर और राजनेताओं के गहरे गठजोड़ का एक सूत्र भर है। मीडिया जगत में खबरों के टोटे और टीवी चैनलों के जमाती अभियान से ऊबे लोगों के लिए यह मामला इसलिए भी दिलचस्पी का मुद्दा बना क्योंकि यह देश के एक बड़े आर्थिक घोटाले से जुड़ा अध्याय की वो कड़ी है, जो बीते एक माह में लगभग हाशिए पर चली गई थी। इसमें कोरोना कोण यह है कि तकरीबन हर घड़ी कोरोना से बचने के लिए सारे देश को घरों में रहने, बाहर न निकलने की ताकीद की जा रही हो, लाॅक डाउन तोड़ने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही हो, उस माहौल में एक बड़े और संदिग्ध कारोबारी का परिवार बड़े आराम से अपने लवाजमे के साथ महाबलेश्वर में अपने फार्म हाउस पर ऐश करने जा पहुंचता है। और दो-चार भी नहीं पूरे 23 आदमी पांच गाडि़यों में भरकर वहां पहुंचते हैं। जबकि आम आदमी के लिए इस वक्त जिला तो क्या शहर की सीमा लांघना भी दूभर है, वहीं इस वाधवान परिवार के लिए राज्य का प्रधान सचिव (विशेष) बाकायदा चिट्ठी जारी कर निर्देश देता है कि ये मेरे पारिवारिक मित्र हैं तथा इमर्जेंसी में खंडाला से महाबलेश्वर जा रहे हैं। इन्हें न रोका जाए। चिट्ठी जारी करने वाले अफसर का नाम अमिताभ गुप्ता है। गुप्ता सीनियर आईपीएस अफसर हैं और मुंबई में वाधवान परिवार के पड़ोसी बताए जाते हैं। पड़ोसी होने से गुप्ता की मुलाकात घोटालों से घिरी डीएचएफल कंपनी के प्रमोटर धीरज वाधवान तथा कपिल वाधवान से हुई। लेकिन गुप्ता ने कोरोना में भी पड़ोसी धर्म‍ निभाया। जब मामला सामने आया तो ठाकरे सरकार ने आनन फानन में अमिताभ गुप्ता को ज‍बरिया छुट्टी पर भेज दिया।

राज्य में विधानसभा चुनाव जीतकर भी शिवसेना के अलग होने से सरकार न बना पाने से कुंठित भाजपा के लिए ठाकरे सरकार पर हमले का सुनहरा मौका था, क्योंकि इसमें ठाकरे सरकार ही नहीं, कांग्रेस भी फंस रही है। राज्य के नेता प्रतिपक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने मामले की जांच की मांग की। भाजपा नेता किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि उद्धव ठाकरे सरकार वाधवान परिवार को वीआईपी ट्रीटमेंट दे रही है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कपिल और धीरज वाधवान येस बैंक में साढ़े 4 हजार करोड़ के घोटाले के मुख्‍य आरोपी हैं। आरोप है कि वाधवान परिवार ने बैंक के संचालक राणा कपूर परिवार को करोड़ों की घूस देकर भारी कर्जे लिए और डुबो दिए, जिससे बैंक डूबने की कगार पर पहुंच गई। इसी चक्कर में सीबीआई ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया था। लेकिन कोरोना का हवाला देकर दोनों ईडी के सामने पेश नहीं हुए। इन्हें मुंबई में सीबीआई के द्वारा गिरफ्‍तारी का डर था, इसलिए ये दोनो खंडाला के एक गेस्ट हाउस में छिपे हुए थे। लेकिन कोरोना के चलते गेस्ट हाउस मालिक ने इन पर छोड़ने के लिए दबाव बनाना शुरू किया तो इन लोगों ने महाबलेश्वर स्थित फार्म हाउस जाने का प्लान बनाया। सीबीआई और ईडी दोनों को ही इनकी तलाश थी। क्योंकि पिछले महिने राणा कपूर की गिरफ्‍तारी के बाद वाधवान बंधुओं का घोटाला सामने आया था।

अब भाजपा नेता देवेन्द्र फडणवीस ने सवाल किया कि वाधवान बंधु किसके आशीर्वाद से महाबलेश्वर तक जा सके? इस पूरे प्रकरण में आईपीएस अमिताभ गुप्ता की भूमिका संदिग्ध है। कारण वाधवान बंधु कोई सामान्य लोग नहीं हैं, सीबीआई और आईडी उन्हें तलाश रही है, यह जानकारी तो गुप्ता को होगी ही। और फिर लाॅक डाउन के दौरान कोरोना को छोड़ ऐसी कौन सी इमर्जेंसी हो सकती थी, जिसके कारण वाधवान परिवार को महाबलेश्वर जाना पड़ रहा था और आईपीएस गुप्ता उसे पारिवारिक मित्र बताकर पुलिस को उन्हें न रोकने का अधिकृत पत्र जारी कर रहे थे। गुप्ता की इस हरकत के पीछे किसी मंत्री का हाथ था या नहीं अभी उजागर होना है, लेकिन इससे यह खुलासा तो होता ही है कि नियम-कायदे केवल आम जनता के लिए हैं न कि नेताओं, आला अफसरों और अमीरों केलए। कुछ ऐसा ही हम मध्यप्रदेश में भी देख रहे हैं, जहां वरिष्ठ अधिकारी ‘कोरोना क्राइम’ से ‘अछूते’ हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कड़े कानूनों के उल्लंघन का नतीजा क्या होगा, यह जानते हुए भी इन आला अफसरों को किसी बात का कोई डर नहीं है। जिन आईपीएस गुप्ता को फरारी में चल रहे वाधवान परिवार की जानकारी सीबीआई और पुलिस को देनी चाहिए थी, वो ही महाबलेश्वर में उनकी पिकनिक का इंतजाम करवा रहे थे।

भाजपा और उसकी सरकारें अभी तक यही प्रोजेक्ट करने में लगी हैं कि देश में जमातियों की वजह से कोरोना फैल रहा है। इसमें एक हद तक सच्चाई भी है, लेकिन इस संदेह को बड़ी सफाई से एक अभियान में बदल दिया गया है। परंतु वाधवान जैसे लोगों के बारे में क्या कहा जाए, जो कोरोना की आड़ में कानून की बेड़ियों से बचने की कोशिश कर रहे हैं?

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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